VIDEO : प्रकाश पर्व : ‘अकाल पुरुष’ का ‘पता’ बताने वाले ‘गुरु’ ही ‘ईश्वर’ हैं…

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 12 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत की भूमि को ईश्वर का वरदान है, जहाँ समय-समय पर अनेक प्रभु प्रकाशक अवतरित होते रहे हैं। ऐसा ही एक दिन 550 वर्ष पूर्व भी आया था, जब ईश्वर ने अपने प्रकाशक के रूप में एक युग पुरुष को अवतरित किया था। वर्ष 1469 में कार्तिकी पूर्णिमा के दिन पंजाब के तलवंडी में कालूचंद खत्री के घर तृप्ता खत्री की कोख से एक शिशु ने जन्म लिया। उस समय कोई नहीं जानता था कि यह शिशु कोई साधारण बालक नहीं, अपितु एक अवतारी पुरुष है। उस शिशु का नाम नानक रखा गया। भारतीय सनातन अध्यात्म परम्परा कहती है कि समग्र ब्रह्मांड में विचरण करने वाली 84 लाख योनियों में से एकमात्र मानव योनि को ही यह विवेकपूर्ण अधिकार है कि वह स्वयं को नर से नारायण में रूपांतरित कर सकती है और बालक नानक को यह बात अल्पायु में ही अच्छी तरह समझ में आ गई थी। यही कारण है कि यह बालक आज गुरु नानक देव के रूप में मानव जाति को उस ईश्वर को प्राप्त करने का संदेश दे रहे हैं, जो ‘अकाल पुरुष’ है अर्थात् कालातीत है। इतना ही नहीं, गुरु नानक देव के समग्र जीवन और उनके पश्चात् हुए शेष सभी 9 गुरुओं ने एक ही संदेश दिया, ‘इस संसार में अकाल पुरुष का पता और प्रमाण केवल और केवल गुरु ही दे सकते हैं और गुरु ही ईश्वर हैं, क्योंकि कोई भी गुरु अकाल पुरुष का पता-प्रमाण तभी दे सकता है, जब वह स्वयं अकाल पुरुष यानी ईश्वर का रूप बन चुका होता है।’

क्यों है आज प्रकाश पर्व ?

साधारणत: किसी महापुरुष की जयंती या पुण्यितिथि मनाई जाती है और कोई संत पुरुष हो, तो उसका अवतरण दिवस या अंतर्ध्यान-निर्वाण दिवस मनाया जाता है, परंतु गुरु नानक के जन्म दिवस को जयंती के रूप में नहीं, अपितु प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिए, क्योंकि गुरु नानक ने अपने जीवन में भारतीय अध्यात्म की उस गूढ़ विद्या का गूढ़ अध्ययन किया था, जिसका पूर्ण और एकमात्र सार था, ‘ईश्वर एक है और उसका प्रकाशक गुरु है।’ गुरु नानक भी ईश्वर के प्रकाशक के रूप में अवतरित हुए थे। इसीलिए वे न केवल गुरु कहलाए, अपितु ईश्वर के प्रकाशक होने के कारण उनके जन्म दिवस को प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। यहाँ प्रकाश से तात्पर्य सूर्य या बिजली के बल्ब से होने वाला प्रकाश नहीं है। प्रकाश को भले ही हम साधारण भाषा में रोशनी, लाइट या उजाला जैसे शब्दों से संबोधित करते हैं, परंतु भारतीय सनातन धर्म परम्परा के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए सबसे बड़ा प्रकाश वह है, जिसके फैलने से वह अपने स्व-रूप यानी उस अकाल पुरुष का साक्षात्कार कर सकता है। जब तक जीवन में यह उजियारा नहीं होता, जब तक जीवन सूर्य और बिजली आधारित प्रकाश पर निर्भर है, जब तक जीवन देह रूपी अंधकार में डूबा हुआ है, तब तक उस ‘अकाल पुरुष’ अर्थात् एकेश्वर से साक्षात्कार संभव नहीं है। यही गुरु नानक देव की सबसे बड़ी शिक्षा है।

जब कर्मकांड छूटा, तब अकाल पुरुष को परखा

बात नवंबर-1504 से अक्टूबर-1507 के मध्य की है, जब गुरु नानक 35 से 38 वर्ष की युवावस्था में थे। गुरु नानक देव की बाल्यावस्था गाँव में व्यतीत हुई। बाल्यावस्था से ही उनमें असाधारणता और विचित्रता थी। उनके साथी बालक जब खेल-कूद में अपना समय व्यतीत करते थे, तब वे नेत्र बंद कर आत्म-चिन्तन में निमग्न हो जाते थे। इनकी इस प्रवृत्ति से उनके पिता कालू चिंतित रहते थे। यहाँ तक कि गुरु नानक को विक्षिप्त तक समझ कर पिता ने भैंसें चराने का काम दिया, परंतु नानक ध्यान में निमग्न हो जाते और भैंसें दूसरों के खेतों में जाकर फसलें बिगाड़ आतीं। जब 9 वर्ष की आयु में यज्ञोपवित संस्कार का अवसर आया, तो गुरु नानक ने पंडित से कहा, ‘दया कपास हो, संतोष सूत हो, संयम गाँठ हो, (और) सत्य उस जनेउ की पूरन हो। यही जीव के लिए (आध्यात्मिक) जनेऊ है। ऐ पाण्डे (पंडित) यदि इस प्रकार का जनेऊ तुम्हारे पास हो, तो मेरे गले में पहना दो, यह जनेऊ न तो टूटता है, न इसमें मैल लगता है, न यह जलता है और न यह खोता ही है।’ 1485 में गुरु नानक का बटाला निवासी मूला की पुत्री सुलक्खनी से विवाह हुआ, जिनसे इनके दो पुत्र श्रीचंद और लक्ष्मीदास (लक्ष्मीचंद) उत्पन्न हुए। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु उनके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए। घोड़े के व्यापार के निमित्त दिये हुए रुपयों को गुरु नानक ने साधुसेवा में लगा दिया और अपने पिताजी से कहा, ‘यही सच्चा व्यापार (सच्चा सौदा) है।’

जल बिच उपजा ज्ञान

बचपन से ध्यान और अध्यात्म में रुचि रखने वाले गुरु नानक तत्कालीन हिन्दू समाज की बहुदेवोपासक, कर्मकांड, पूजा-पाठ, विधि-विधान से स्वयं को मुक्त कर चुके थे और उनमें यह विवेक जाग चुका था कि ईश्वर किसी क्रिया से सुलभ नहीं हो सकता। यही कारण है कि पिता ने गुरु नानक को नवंबर-1504 में अपनी पुत्री नानकी जयराम के घर सुलतानपुर भेज दिया। यहाँ नवम्बर, 1504 ई. से अक्टूबर 1507 ई. तक वे सुल्तानपुर में ही रहें अपने बहनोई जयराम के प्रयास से वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत ख़ाँ के यहाँ मादी रख लिये गये। उन्होंने अपना कार्य अत्यन्त ईमानदारी से पूरा किया। वहाँ की जनता तथा वहाँ के शासक दौलत ख़ाँ नानक के कार्य से बहुत सन्तुष्ट हुए। वे अपनी आय का अधिकांश भाग ग़रीबों और साधुओं को दे देते थे। कभी-कभी वे पूरी रात परमात्मा के भजन में व्यतीत कर देते थे। मरदाना तलवण्डी से आकर यहीं गुरु नानक का सेवक बन गया था और अंक तक उनके साथ रहा। गुरु नानक देव अपने पद गाते थे और मरदाना रवाब बजाता था। गुरु नानक नित्य प्रात: बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। कहते हैं कि एक दिन वे स्नान करने के पश्चात् वन में अन्तर्धान हो गये। उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने गुरु नानक को अमृत पिलाया और कहा, ‘मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ, मैंने तुम्हें आनंदित किया है। जो तुम्हारे सम्पर्क में आएँगे, वे भी आनंदित होगें। जाओ नाम में रहो, दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओं।’ इस घटना के पश्चात् वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर मूला को सौंप कर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। मरदाना उनकी यात्रा में बराबर उनके साथ रहा।

बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो मिलाय…

महान संत कबीरदास की एक वाणी है, ‘गुरु-गोविंद दोऊ खडे, काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो मिलाय’। गुरु नानक ने इस कबीर वाणी को सार्थक किया। उन्होंने तत्कालीन मुग़ल साम्राज्य के अत्याचारों के विरुद्ध और मानवता की रक्षा के लिए एक ऐसी सेना तैयार की, जो आज सिख धर्म के रूप में जानी जाती है। सिख का अर्थ शिष्य होता है, जो अपने गुरु के बताए मार्ग पर चलते हैं। गुरु नानक सिख धर्म के प्रवर्तक थे। गुरु नानक ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर पुरजोर बल दिया और तत्कालीन मुग़ल सम्राट बाबर को भी यह अनुभूति कराई कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। गुरु नानक देव के जीवन का सबसे बड़ा सार यही है कि व्यक्ति के जीवन में ईश्वर से भी ऊँचा पद गुरु का होना चाहिए, क्योंकि पृथ्वी पर एकमात्र गुरु ही ऐसा प्रकाशक (PUBLISHER) है, जो ईश्वर से साक्षात्कार करा सकता है। यही कारण है कि गुरु नानक देव ने अनेक यात्राएँ कीं और हजारों लोगों का हृदय परिवर्तन किया। ठगों को साधु बनाया, वेश्याओं का अंत:करण शुद्ध कर नाम का दान किया। कर्मकांडियों को बाह्याडंबरों से निकाल कर रागात्मिकता भक्ति में लगाया, अहंकारियों को अहंकार से मुक्त कर मानवता का पाठ पढ़ाया। अंतत: गुरु नानक ने श्री गुरु ग्रंथ साहब की रचना की, जिसका मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनंत, सर्वशक्तिमान, सत्य, कर्ता, निर्भय, निर्वर, अयोनि, स्वयंभू, निराकार है और इसीलिए सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति-पूजा आदि निरर्थक है। परमात्मा अकाल पुरुष है। गुरु नानक देव ने ‘अकाल पुरुष’ का जैसा स्वरूप प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार अकाल पुरुष एक है। उस जैसा कोई नहीं है। वह सबमें एक समान रूप से बसा हुआ है। उस अकाल पुरुष का नाम अटल है। सृष्टि निर्माता वह अकाल पुरुष ही संसार की हर छोटी-बड़ी वस्तु को बनाने वाला है। वह अकाल पुरुष ही सब कुछ बनाता है तथा बनाई हुई हर एक चीज़ में उसका वास भी रहता है अर्थात् वह कण-कण में अदृश्य रूप से निवास करता है। वह सर्वशक्तिमान है तथा उसे किसी का डर नहीं है। उसका किसी के साथ विरोध, मनमुटाव एवं शत्रुता नहीं है। अकाल पुरुष का अस्तित्व समय के बंधन से मुक्त है। भूतकाल, वर्तमान काल एवं भविष्य काल जैसा काल विभाजन उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। बचपन, यौवन, बुढ़ापा और मृत्यु का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उस अकाल पुरुष को विभिन्न योनियों में भटकने की आवश्यकता नहीं है, अर्थात् वह अजन्मा है। उसे किसी ने नहीं बनाया और न ही उसे किसी ने जन्म दिया है। वह स्वयं प्रकाशित है। इस स्वयं प्रकाशित को प्रकाशित करने का सामर्थ्य केवल उस ज्ञानी पुरुष अर्थात् गुरु में है, जिसने उस स्वयं प्रकाशित की अनुभूति की है और जो उसमें तद्रूप हो चुका है।

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