आ अब लौट चलें : पूरे विश्व में कोई भी वस्तु ‘मौलिक-यूनिक़’ नहीं, हर वस्तु अनादि-अनंत है…

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 1 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। साधारण, परंतु मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार से भरा हुआ मनुष्य सामान्यत: आजीवन इस भ्रम में रहता है, ‘मेरे जैसा कोई नहीं, मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरी तरह कोई गीत नहीं गा सकता, मेरी तरह कोई लिख नहीं सकता, यह आविष्कार मेरा है, मुझसे बढ़ कर कोई नहीं’, परंतु क्या आप जानते हैं कि इस पूरे विश्व ही नहीं, अपितु समग्र ब्रह्मांड में ‘मौलिक या यूनिक़ (अद्वितीय)’ कुछ भी नहीं है ? अपने मन, उसमें उपजने वाले नित-नए विचारों, कुशाग्र बुद्धि से दुनिया को जीतने का व्यर्थ प्रयास करने वाले व्यक्ति के गले कदाचित यह बात नहीं उतरेगी, परंतु वास्तविकता यही है कि इस पूरे संसार में ऐसा कोई नहीं, कुछ भी नहीं, कोई वस्तु नहीं है, जो मौलिक हो।

स्वयं भगवान श्री कृष्ण परमात्मा ईश्वर होने के बावज़ूद कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के आरंभ होने से पहले जब शिष्य अर्जुन को गीता का महान उपदेश दे रहे थे, तब उन्होंने भी यही कहा था, ‘हे अर्जुन ! मैंने इस अविनाशी योग (ज्ञान) को, कल्प के आदि में विवस्वान अर्थात सूर्य के प्रति कहा था और सूर्य ने अपने पुत्र मनु के प्रति कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु के प्रति कहा। इस प्रकार यह ज्ञान अनादि है और मैं इसे तेरे समक्ष दोहरा रहा हूँ।’ स्वयं भगवान श्री कृष्ण ईश्वर होकर भी-गीता के महान उपदेशक होकर भी इस ‘मैं’ और ‘मैंने’ के अहंकार के बोझ से मुक्त रहे, परंतु आज पूरे विश्व में हर व्यक्ति ‘मैं, मेरा, मुझ, मैंने’ के अहंकार में उलझा हुआ है।

वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS के ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ के भाग 7 में आज हम एक ऐसे ही निरंकार (नि:+अहंकार) अर्थात् अहंकार से मुक्त महापुरुष रामकिंकर उपाध्याय के विषय में बताने जा रहे हैं, क्योंकि आज उनका 95वाँ अवतरण दिवस है। 1 नवम्बर, 1924 को मध्य प्रदेश के जबलपुर में जन्मे रामकिंकर उपाध्याय ने भारत के महान महाकाव्य रामायण की ‘अद्वितीय’ यानी यूनिक़ मीमांसा की थी। इसके बावज़ूद यदि रामकिंकर उपाध्याय अपनी इस अद्वितीय मीमांसा के विषय में कहते थे, ‘मौलिक कोई वस्तु नहीं होती है। भगवान जिससे जो सेवा लेना चाहते हैं, वह ले लेते हैं। वस्तु या ज्ञान, जो पहले से होता है, व्यक्ति को केवल उसका सीमित प्रकाशक दिखाई देता है, दिखाई वही वस्तु देती है, जो होती है, जो नहीं थी, वह नहीं दिखाई जा सकती है। रामायण में वे सूत्र पहले से थे, जो लोगों को लगते हैं कि मैंने दिखाए या बोले, पर यह सत्य नहीं है।’ रामकिंकर उपाध्याय की यह विचारधारा उन्हें एक सिद्ध संत सिद्ध करती है, साथ ही उनकी और ईश्वर की व्यापकता को भी सिद्ध करती है।

कौन और क्यों महान संत थे रामकिंकर उपाध्याय ?

भारत के मानस मर्मज्ञ, रामायण कथा वाचक और हिन्दी साहित्यकार रामकिंकर उपाध्याय का जन्म 1 नवम्बर, 1924 को मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ था। बाल्यावस्था से ही प्रखर बुद्धि के स्वामी रामकिंकर की शिक्षा-दीक्षा जबलपुर और काशी में हुई। स्वभाव से अत्यंत संकोची व शांत प्रकृति के रामकिंकर बचपन से ही अपनी आयु के बच्चों की तुलना में अधिक गंभीर हुआ करते थे। इनकी मेधाशक्ति बाल्यावस्था में ही इतनी विकसित थी कि क्लिष्ट व गंभीर लेखन, देश-विदेश का विशद साहित्य अल्पकालीन अध्ययन (शॉर्ट टाइम रीडिंग) में ही स्मृति पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जाता था। माता-पिता के धार्मिक विचारों और संस्कारों का रामकिंकर उपाध्याय पर गहरा प्रभाव था। यद्यपि रामकिंकर का जन्म जबलपुर में हुआ था, परंतु इनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के बरैनी गाँव के थे। इसीलिए पूरे परिवार की भगवान श्री राम और रामायण में गूढ़ आस्था थी। रामकिंकर ने मात्र 19 वर्ष की आयु में लेखन कार्य आरंभ कर दिया था। भगवान श्री राम का इनके जीवन पर इतना प्रभाव था कि वे आगे चल कर रामायण कथा वाचक बन गए। रामकिंकर उपाध्याय आचार्य कोटि के संत थे। उन्होंने रामायण की मीमांसा जिस रूप में की, वह अद्वितीय थी, परंतु स्वयं रामकिंकरजी अपने ग्रंथों, प्रवचनों या बातचीत में कभी यह स्वीकार नहीं करते थे कि उन्होंने कोई मौलिक कार्य किया है। अपने 78 वर्ष के जीवनकाल में रामकिंकर उपाध्याय ने 92 पुस्तकों की रचना की, जो मुख्यत: रामचरितमानस और रामकथा से संबंधित हैं।

ईश्वर को साक्षात् होने पर विवश कर देता है निष्काम भाव

‘आ अब लौट चलें’ के इस सातवें भाग में हम आपको संत रामकिंकर उपाध्याय के जीवन से जुड़े अलौकिक घटनाक्रम भी बताएँगे। ये घटनाक्रम सिद्ध करते हैं कि कोई भी भक्त यदि निष्काम भाव से किसी भी इष्ट की भक्ति करे, तो वह उस इष्ट यानी ईश्वर को उसके समक्ष प्रकट होने पर विवश कर सकता है। वर्तमान भौतिक सुखों की कामनाओं से भरी भक्ति करने वाले भक्तों को भी ईश्वर मिलते हैं, परंतु उस रूप में, जिस रूप में वे उसे भजते हैं। जो गाड़ी चाहता है, उसे गाड़ी मिलती है, जो बंगले की कामना से ईश्वर की भक्ति करता है, उसे बंगले के रूप में वही एक तत्व मिलता है, परंतु भौतिक साधनों के रूप में मिलने वाला ईश्वर किसी को भी शाश्वत और सनातन शांति नहीं दे सकता। बात रामकिंकर उपाध्याय की करें, तो उन्होंने आजीवन निष्काम भाव से भक्ति की। निष्काम भाव अर्थात् किसी भी प्रकार की मांग, डिमांड, शर्त, कामना से रहित भक्ति। ऐसी भक्ति, जिसमें यह मांग या कामना भी न हो, ‘हे ईश्वर, मुझे तू चाहिए, तेरे अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए।’ ऐसी निष्काम भावना से की गई भक्ति के समक्ष ईश्वर नतमस्तक हो जाते हैं। संकोची स्वभाव के होने के कारण रामकिंकर उपाध्याय अपने जीवन में निष्काम भाव की भक्ति से हुई अनुभूतियाँ लोगों के साथ साझा नहीं करते थे और एक उच्च कोटि के संत के लक्षण भी यही होते हैं। यद्यपि रामकिंकर उपाध्याय के अत्यंत निकटस्थ और अनुयायी अक्सर अपने श्रद्धेय संत रामकिंकर उपाध्या के जीवन में हुई ईश्वरानुभूति की कई घटनाओं का वर्णन करते थे। ऐसी ही एक घटना घटी थी उत्तराखंड की दिव्य भूमि ऋषिकेश में, जहाँ रामकिंकर उपाध्याय ने निष्काम भाव से एक छोटा-सा अनुष्ठान कराया था। इस अनुष्ठान के फलस्वरूप रामकिंकर उपाध्याय के समक्ष साक्षात् हनुमान जी प्रत्यक्ष हुए थे। यद्यपि स्वयं रामकिंकर उपाध्याय ने अपने जीवन की कई अलौकिक घटनाओं को लेकर कभी मौन नहीं तोड़ा। वे 78 वर्ष के जीवनकाल में 49 वर्षों तक कथावाचन के माध्यम से लोगों को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाते रहे।

भजन झंझट लगे तो छोड़ दो, परंतु झंझटें भजन न बन जाएँ

रामकिंकर उपाध्याय सत्य सनातन मार्ग के पथिक थे। ऐसा पथिक कभी किसी को बंधन में डाल ही नहीं सकता। अन्यथा जो लोग आश्रम-पंथ-बाड़े खोल कर बैठे हैं, वे तो शिष्यों की संख्या बढ़ाने, आवक के संसाधन एकत्र करने में व्यस्त रहते हैं, परंतु रामकिंकर उपाध्याय सच्चे संत थे। यही कारण है कि वे किसी भी अनुयायी को भजन न करने की सलाह देने का साहस कर सकते थे। वास्तव में एक शिष्य ने संत रामकिंकर जी से कहा, ‘महाराज ! मुझे यह भजन करना झंझट-सा लगता है। मैं छोड़ना चाहता हूँ इसे !’ उदार और सहज कृपालु महाराज रामकिंकर उपाध्याय उस शिष्य की ओर करुणामय होकर बोले, ‘छोड़ दो भजन ! मैं तुमसे सहमत हूँ। स्वाभाविक है कि झंझट न तो करनी चाहिए और न ही उसमें पड़ना चाहिए, परंतु मेरा एक सुझाव है, जिसे ध्यान रखना कि फिर जीवन में कोई और झंझट भी मत पालना, क्योंकि तुम झंझट से बचने की इच्छा रखते हो। कहीं भजन छोड़ कर सारी झंझटों में पड़ गए, तो जीवन में भजन छूट जायेगा और झंझट में फँस जाओगे और यदि भजन नहीं छूटा, तो झंझट भी भजन हो जाएगा, तो अधिक अच्छा यह है कि इतनी झंझटें जब हैं ही, तो भजन की झंझट भी होती रहे।’ ऐसे महान संत रामकिंकर उपाध्याय को भारत सरकार ने भी वर्ष 1999 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था। रामकिंकर उपाध्याय ने 9 अगस्त, 2002 को अपना पंच भौतिक देह त्याग दिया।

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