क्यों मनाया जाता है बुजुर्ग दिवस : बुजुर्गों को कितना मिला अधिकार ?

आलेख : तुहिना चौबे

अहमदाबाद 1 अक्टूबर 2019 (युवाPRESS)। एक अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस मनाया गया। समाज और नई पीढ़ी को सही दिशा दिखाने और उसे मार्गदर्शन के लिए वरिष्ठ नागरिकों के योगदान को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 1990 में बुजुर्ग दिवस मनाने का फ़ैसला किया था। आज का वृद्ध, समाज से कटा रहता है और सामान्यत: इस बात से अधिक दु:खी है कि, जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को कोई महत्व देता है। वृद्ध समाज को इस दुःख और कष्ट से छुटकारा दिलाना आज की सबसे बड़ी जरुरत है।

बुजुर्गों को कितना मिला अधिकार ?

संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार और अन्याय को समाप्त करने के लिए और लोगों में जागरुकता फैलाने के लिए 14 दिसम्बर, 1990 को यह निर्णय किया था कि हर साल 1 अक्टूबर’ को अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मना कर बुजुर्गों को उनका सही स्थान दिलाने का प्रयास किया जाए। उम्मीद की गई थी कि हम वरिष्ठ नागरिक दिवस मना कर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के साथ-साथ समाज में उनको उचित स्थान देने की कोशिस करेंगे, ताकि उम्र के इस पड़ाव पर जब उन्हें प्यार और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत है तब वो जिंदगी का पूरा आनंद ले सकें।

एकल परिवार में बढ़ोतरी

विगत दशकों में संयुक्त परिवारों का स्थान बड़े पैमाने पर एकल परिवारों ने ले लिया है, जिससे ना केवल सामाजिक तानाबाना बिखर गया, बल्कि पीढ़ियों से जो संस्कार आसानी से अगली पीढ़ी तक पहुँचते थे, उसमें भी कमी आई। अब शहरों में बच्चे क्रेच में पलने और बुजुर्ग ओल्ड एज़ होम्स या वृद्धाश्रम में रहने को विवश हैं। पहले जमाने में बच्चे नाना-नानी और दादा-दादी के सुरक्षित हाथों में संस्कारों के साथ बड़े होते थे, परंतु अब बच्चे डे केयर या नैनी के साथ बड़े होते हैं। क्योंकि आज हमें अपनों से ज्यादा परायों पर भरोसा है। यही कारण है कि बड़े शहरों में विगत एक दशक में ओल्ड एज़ होम्स की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। केवल पिछले एक दशक में हैदराबाद शहर में ही 500 से ज्यादा ओल्ड एज़ होम खोले गए हैं, जो हमारे देश, समाज और संस्कृति के लिए निंदनीय और अहितकारी है। मौजूदा पीढ़ी अपने निर्माताओं के योगदान को नजरअंदाज करते हुए उन्हें अकेलेपन, असहाय की स्थिति में धकेल रही है।

बुजुर्गों को नजरअंदाज किया जा रहा

परिवार की शान कहे जाने वाले हमारे बुजुर्ग आज परिवार में अपने ही अस्तित्व को तलाशते नजर आ रहे हैं। वरिष्ठ नागरिक समाज की अमूल्य विरासत होते हैं, जिसने देश और समाज को बहुत कुछ दिया होता है। आज का युवा वर्ग राष्ट्र को ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए उनके अनुभव का लाभ उठा सकता है, फिर क्यों उनका तिरस्कार किया जा रहा है। बुजुर्ग पेड़ विनम्र फल देने वाला होता है और यह समाज के साथ भी लागू होता है।  वैज्ञानिक नजरिये से देखें तो बुढ़ापा एक अनिवार्य शारीरिक आवस्था है, ऐसे में युवाओं को एक बात बड़ी गहराई से दिमाग में बैठा लेनी चाहिये कि उन्हें भी समय के इस चक्र से गुजरना होगा। ऐसे में युवा पीढ़ी के सामने सामाजिक व्यवस्था को बरकरार रखने की बड़ी चुनौती है। युवाओं को बुजुर्गों की सेवा के संस्कार को बनाए रखना होगा। साथ ही आने वाली पीढ़ी को बताना होगा कि बुजुर्ग बोझ नहीं हैं। आदर, सम्मान और सेवा उनका अधिकार है, इससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता है। नई पीढ़ी को यह भी समझाना होगा कि बुजुर्गों का तिरस्कार एक अपराध है। आजकल जहाँ युवा स्ट्रेस, टेंशन और डिप्रेशन के शिकंजे में फँसते जा रहे हैं, वहीं कई बुजुर्ग ऐसे हैं जो सभी के लिए मिशाल कायम कर रहे हैं।

बुजुर्गों का हौसला बुलंद

कर्नाटक सरकार ने पिछले दिनों वयोवृद्धों के लिए एक स्पोर्ट्स मीट का आयोजन किया था। बेंगलुरु के कांतिवारा स्टेडियम में आयोजित इस स्पोर्ट्स मीट में 250 वयोवृद्ध महिलाओं ने भाग लिया था। 250 वयोवृद्ध महिलाओं में से तीन महिलाओं ने शानदार प्रदर्शन किया था और सबका दिल जीत लिया था, परंतु आप सोच भी नहीं सकते कि सबका दिल जीतने वाली इन अम्माओं के दिल में कितनी पीड़ा थी। इन तीन अम्माओं की कहानी सुन कर किसी का भी हृदय भर आ सकता है। ये तीनों अम्माएँ ऐसी हैं, जिन्हें उनके अपनों से न केवल घृणा मिली, अपितु उन्हें उनके अपनों ने ही जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनका साथ छोड़ दिया, परंतु वे हारी नहीं। अपनों की घृणा को पीछे छोड़ ये अम्माएँ चट्टान बन गईं और स्पोर्ट्स मीट में चीते की तरह चलती नज़र आईं। स्पोर्ट्स मीट में सबसे बड़ा कारनामा कर दिखाया 72 वर्षीय ललितम्मा ने। उन्होंने 200 मीटर की दौड़ जीती, तो 81 साल की सरोजम्मा 100 मीटर की दौड़ स्पर्धा में पहले स्थान पर रहीं। 200 मीटर की वॉक जीतने वाली ललितम्मा ने बताया कि वह खुद को फिट रखने के लिए रोज वॉक करती हैं। ललितम्मा 71 से 80 वर्ष की उम्र वाली सीनियर सिटीजन वॉक में सबसे आगे रहीं। ललितम्मा ने बताया कि परिवार के साथ उन्हें इतने कड़वे अनुभव हुए हैं कि उन्हें अज्जी शब्द से ही नफ़रत हो गई है। ललितम्मा वैसे तो अपने और अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं कहना चाहतीं, परंतु कुछ नहीं कहते हुए भी वो बहुत कुछ कह जाती हैं। परिवार के बारे में बात करने से इनकार करने के बावजूद ललितम्मा ने अपने भावों से इतना अवश्य बता दिया कि उन्हें परिवार ने कितनी तकलीफ़ें दी, परंतु अब वे अकेले रह कर खुश हैं। ललितम्मा की तरह ही 81 वर्षीय सरोजम्मा ने अपने घुटने में बँधी पट्टी दिखा कर कहा कि मेरी बहू से पूछो, जिसने मेरे पैर तोड़ कर मुझे लावारिसों की तरह सड़क पर छोड़ दिया और मेरी सारी संपत्ति हड़प ली। सरोजम्मा ने अपने घुटने में पट्टी बांध कर इस वॉक में हिस्सा लिया था। उनके इस जज़्बे को देख कर सभी हैरान रह गए। उनके परिवार वाले उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे, परंतु अब वे इन सब बातों से ऊपर उठ कर अपनी ज़िंदगी जीना चाहती हैं। इस स्पोर्ट्स् मीट में भाग लेने वाली एक अन्य महिला 65 वर्षीय रतनम्मा की भी इसी तरह की कहानी है। रतनम्मा के बच्चों ने उन्हें छोड़ दिया। रतनम्मा को अपने बच्चों के बारे में कुछ भी पता नहीं है। वो कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं ? न कभी रतनम्मा को वो अपने साथ ले गए और न ही रतनम्मा से मिलने आए। रतनम्मा अपनी आजीविका चलाने के लिए कुली का काम करतीं हैं।

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