‘संस्कृत’ है सबसे प्राचीन और अत्याधुनिक भी, प्रयास करें तो बन सकती है वैश्विक-वैज्ञानिक भाषा

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 18 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। एक तरफ देश के स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य रूप से पढ़ाने की बात की जाए तो विवाद पैदा किया जाता है, वहीं राजस्थान में एक स्कूल के 80 प्रतिशत बच्चों ने देश और दुनिया के समक्ष एक ऐसी नज़ीर पेश की है, जो विवाद पैदा करने वालों के लिये करारा जवाब है। यह विडंबना ही है कि हमें कोई भी शुरुआत करनी हो तो हम अमेरिका और यूरोप की तरफ देखते हैं कि वो क्या प्रतिक्रिया देंगे। यदि विदेशी प्रतिक्रिया की भी बात की जाए तो वर्तमान में विश्व की सबसे बड़ी और आधुनिक अंतरिक्ष शोध संस्था नासा ने भी माना है कि संस्कृत एक अदभुत और खगोलीय भाषा है। इसके बाद देश में ही कुछ मुस्लिम धर्मगुरु, राजनेता और समाज के ठेकेदार बने मुट्ठी भर लोग संस्कृत पढ़ने का विरोध करते हैं। उनकी मानसिकता ऐसी हो गई है कि हिन्दुओं के वेद-उपनिषद, रामायण और भगवद गीता आदि संस्कृत भाषा में हैं, इसलिये यह हिंदू संप्रदाय की भाषा है, जबकि ऐसा नहीं है। संस्कृत भाषा सबसे प्राचीन है। सभी भाषाओं की जननी है। इसीलिये वैदिक साहित्य इस भाषा में मिलता है। इस तथ्य को यदि समझ जाएँ और स्वीकार कर लें तो देश में संस्कृत भाषा के पठन-पाठन का मार्ग प्रशस्त हो जाए और अधिकांश वैज्ञानिकों के मतानुसार संस्कृत में आधुनिक, वैश्विक और वैज्ञानिक भाषा बनने के सभी गुण निहित हैं।

यहाँ के 80 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे पढ़ते हैं संस्कृत

राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थित राजकीय ठाकुर हरि सिंह शेखावत मंडावा प्रवेशिका संस्कृत विद्यालय में 80 प्रतिशत बच्चे मुस्लिम हैं। इस स्कूल में छात्रों की कुल संख्या लगभग 277 है, जिनमें से 222 छात्र मुस्लिम हैं। इन सभी छात्रों (मुस्लिम समेत) के लिये संस्कृत उनके जीवन जीने की शैली बन गई है। कई छात्रों का तो संस्कृत ही सपना है, वे संस्कृत पढ़ाने को अपना करियर बनाना चाहते हैं। एक नौ साल की छात्रा से जब उसका नाम पूछा गया तो उसने संस्कृत में जवाब देते हुए बताया ‘मम नाम इल्मा कुरैशी।’ इतना ही नहीं, इस छात्रा ने अपने कई सहपाठियों के साथ मिल कर संस्कृत के कई श्लोक भी सुनाए। इल्मा कक्षा 4 की छात्रा है। उसका परिवार एक किराये के मकान में रहता है। परिवार जिस मकान में रहता है वह हनुमान मंदिर की बाउण्ड्री से सटा हुआ है। मंदिर में प्रति दिन हनुमान चालीसा का पाठ होता है और इल्मा को चालीसा भी पूरा याद हो गया है। इसी स्कूल में इल्मा का भाई रेहान भी पढ़ता है। रेहान भी संस्कृत के कठिन से कठिन वाक्यों को कुछ ही मिनटों में याद कर लेता है। भाई-बहन दोनों का ही कहना है कि उन्हें संस्कृत अच्छी लगती है, संस्कृत पढ़ना उन्हें पसंद है। दोनों कहते हैं कि वे अपने परिवार के सभी बच्चों, रिश्तेदारों और हर व्यक्ति को संस्कृत पढ़ाना चाहते हैं।

इल्मा संस्कृत ही नहीं, हिंदी, उर्दू और अरबी भी पढ़ती है

इल्मा केवल एक मासूम छात्रा ही नहीं है, वह अपने समाज के लिये एक नज़ीर है। क्योंकि इल्मा केवल संस्कृत ही नहीं, उर्दू, अरबी और हिन्दी भाषा पर भी अच्छा नियंत्रण रखती है। इल्मा प्रति दिन शाम को एक मदरसे में धार्मिक शिक्षा हासिल करने के लिये भी जाती है, जहाँ उसे अरबी और उर्दू में रचित धार्मिक ग्रंथों की शिक्षा मिलती है। इस प्रकार देखा जाए तो यदि किसी को आधुनिक भाषा के तौर पर यदि अंग्रेजी, हिंदी, प्रादेशिक भाषा के तौर पर गुजराती, मराठी आदि और मातृभाषा के रूप में हिंदी उर्दू आदि भाषाएँ पढ़ने से कोई गुरेज़ नहीं होता है, तो सवाल उठता है कि संस्कृत भाषा को लेकर इतना विरोध क्यों किया जाता है ?

दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है संस्कृत

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि भारत में कुछ लोग जर्मन भाषा पढ़ाने को तरजीह दे रहे हैं, जबकि उसी जर्मनी में वैदिक भाषा संस्कृत पर शोध हो रहे हैं और वहाँ के विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। इतना ही नहीं, संस्कृत भाषा कई यूरोपीय विश्व विद्यालयों और अमेरिकी विश्व विद्यालयों में भी पढ़ाई जा रही है। 2014 में भारत के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद जब पीएम नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहला विदेश दौरा स्विटजरलैंड से शुरू किया था, तो वहाँ स्विट्ज विद्यार्थियों ने संस्कृत में श्लोक पढ़ कर उनका स्वागत किया था। यदि हिंदी भारत माता के मस्तक की बिंदी है तो संस्कृत उसी मस्तक का ताज़ है।

संस्कृत को वैश्विक भाषा के रूप में प्रस्तुत करने की जरूरत

जर्मनी की शोधकर्ता डॉ. एनेटी सच्मीडेसेन को भारत संस्कृत में शोध के लिये देश का नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित कर सकता है तो भारत के लोगों को संस्कृत जैसी वैज्ञानिक भाषा को छोड़कर अंग्रेज़ी व अन्य भाषाओं के पीछे नहीं भागना चाहिये। डॉ. एनेटी शोध के लिये खुद भी भारत में रहती हैं और उनके पति कोलकाता में जर्मन वाणिज्य दूतावास के काउंसल जनरल हैं। पुरस्कार प्राप्त करने के बाद डॉ. एनेटी ने कहा कि वे इस पुरस्कार से खुद को गौरवान्वित अनुभव करती हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की पहली पुस्तक की भाषा होने के कारण संस्कृत भाषा को विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई संशय नहीं होना चाहिये। फिर क्यों कुछ मुट्ठी भर लोगों के विरोध के चलते संस्कृत को वैश्विक भाषा बनने की ओर कदम आगे बढ़ाने से रोका जा रहा है ? कुछ लोग यह कहते हुए अंग्रेजी भाषा पढ़ने पर ज़ोर देते हैं कि अंग्रेजी इंटरनेशनल लैंगवेज़ है, जबकि इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। इंग्लिश भाषा खुद अपने यूरोप में भी इंग्लैंड सहित यूके तक ही सीमित है। स्पेन में स्पेनिश सहित इटली, रोम, फ्रांस सहित विभिन्न यूरोपीय देशों की अपनी भाषा है। एशिया की बात की जाए तो चीन और जापान में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा स्वदेशी भाषाओं में दी जाती है। दुर्भाग्य है कि भारत में स्वदेशी भाषाओं की कमी न होने के बावजूद उच्च एवं तकनीकी शिक्षा का साहित्य अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होता है।

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