एक ऐसा IAS OFFICER, जिसके दफ्तर में दाखिल नहीं होता कोई सफाई कर्मी : जानिये क्यों ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 16 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2 अक्टूबर-2014 को स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत अभियान की शुरुआत की थी। इसके बाद कई नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में हाथ में झाड़ू पकड़कर स्वच्छता अभियान के नाम पर खुद की पब्लिसिटी की, जबकि गंदगी की सेहत पर इस अभियान का कोई असर देखने को नहीं मिला और हर जगह उसका साम्राज्य बरकरार है। जहाँ स्वच्छता दिखाई देती भी है, वहाँ स्वच्छता अभियान की शुरुआत से भी काफी समय पहले से ही सफाई का ध्यान रखा जाता है। सफाई की बात आती है तो सरकारी दफ्तरों की हालत भी नज़र के सामने उभर आती है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के एक IAS OFFICER देश के सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिये मिसाल बन गये हैं। यदि अन्य सरकारी मुलाजिम भी इन आईएएस ऑफीसर का अनुकरण करें तो सरकारी दफ्तर भी प्राइवेट ऑफिस-दफ्तरों की तरह ही साफ-सुथरे देखने को मिल सकते हैं।

गाजियाबाद के जिलाधिकारी हैं डॉ. अजयशंकर पांडेय

उत्तर प्रदेश निवासी और गाजियाबाद के जिलाधिकारी डॉ. अजयशंकर पांडेय के ऑफिस के बाहर आपको झाड़ू, वाइपर और बड़ा-सा डस्टबिन रखा मिलता है और एक बोर्ड लगा मिलता है, जिस पर लिखा है कि ‘मैंने यह ऑफिस खुद साफ किया है। गंदगी फैलाकर मेरा काम ना बढ़ाएँ।’ डॉ. अजयशंकर के ऑफिस बदलते रहे हैं, परंतु यह बोर्ड कभी नहीं बदला। क्योंकि यह सच है कि वह अपने ऑफिस या केबिन की सफाई और देखभाल खुद करते हैं और उनके केबिन में किसी भी सफाई कर्मचारी को प्रवेश नहीं करने दिया जाता है। यह उच्च अधिकारी अपने दफ्तर की सफाई करने के लिये 10 मिनट पहले ही ऑफिस पहुँच जाते हैं और झाड़ू पोंछा लगाने के बाद अपना कामकाज शुरू करते हैं। जब उनसे पूछा गया कि साफ-सफाई के लिये सफाई कर्मचारी होने के बावजूद वह ये काम खुद क्यों करते हैं ? तो जवाब मिला कि इसकी शुरुआत 1993 में हुई थी, जब वह आगरा के एत्मादपुर में सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट (SDM) थे। उन्होंने बताया कि अपने कुछ मुद्दों को लेकर सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले गये थे। उन्होंने हस्तक्षेप करके उनके मुद्दे सुलझाने का प्रयास किया और उन्हें काम पर लौटने के लिये मनाया, परंतु वह नहीं माने और जिद पर अड़े रहे। इसलिये उन्होंने अपने सहयोगी अधिकारियों-कर्मचारियों से अपने ऑफिस-दफ्तर की सफाई खुद करने की अपील की, तो वह सफाई का काम करने से हिचकिचाते दिखे। इसलिये अगले दिन वह स्वयं अपने घर से झाड़ू लेकर आए और अपने ऑफिस की सफाई करने लगे। यह देखकर पहले तो कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों ने उनकी हँसी भी उड़ाई, परंतु देखते ही देखते वह अधिकारियों-कर्मचारियों के लिये आदर्श बन गये। सब अधिकारी-कर्मचारी उनका अनुकरण करने लगे। देखते ही देखते यह खबर शहर में फैल गई और लोग भी स्वच्छता के लिये सड़कों पर उतर आए। परिणामतः सफाईकर्मियों की हड़ताल के कारण शहर में कई दिनों से जमा हुआ कचरा 5 से 6 घण्टे में ही साफ कर लिया गया। 3 से 4 दिन तक यह अभियान चला तो सफाई कर्मियों की भी आँखें खुल गईं और वह चुपचाप काम पर लौट आए। डॉ. अजयशंकर पांडेय बताते हैं कि इस घटना ने उन्हें अपने ऑफिस-दफ्तर की सफाई खुद करने के लिये प्रेरित किया और इसके बाद से यह उनका रुटीन काम बन गया। वह म्युनिसिपल कमिश्नर के पद पर भी काम कर चुके हैं। उनका कहना है कि एक शहर में 2 से 6 हजार सफाईकर्मी होते हैं, जो म्युनिसिपल कमिश्नर के अण्डर काम करते हैं, परंतु उन्हें इसके बाद सफाई कर्मचारी की कभी आवश्यकता महसूस नहीं हुई।

हर शहर का अधिकारी ऐसा हो तो शहर आदर्श बन जाए

डॉ. पांडेय का कहना है कि लोगों की ऐसी मान्यता है कि घर में सफाई करने का काम महिलाओं का और ऑफिस-दफ्तर में यह काम सफाई कर्मी का है, जो कि बिल्कुल गलत मान्यता है। इस मान्यता के बावजूद घर में फिर भी लोग सफाई के काम में महिलाओं का हाथ बँटा लेते हैं, परंतु जब ऑफिस में यह काम करने की बात आती है तो लोग यह काम करने से हिचकिचाते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिये। घर हो या दफ्तर, सफाई रखना हर किसी की जिम्मेदारी है। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि वह भले ही अपने ऑफिस की साफ-सफाई का ध्यान खुद रखते हैं, परंतु उन्होंने अपने सहयोगी अधिकारियों-कर्मचारियों को ऐसा करने के लिये बाध्य नहीं किया है, उन पर कोई बंदिशें नहीं लगाई हैं, फिर भी अपने उच्च अधिकारी को यह काम करते हुए देखकर उनकी हिचकिचाहट भी दूर हो गई है, जो अच्छी बात है। काश, डॉ. अजयशंकर पांडेय जैसा आदर्श अधिकारी हर गाँव-शहर को प्राप्त हो जाए तो हर गाँव और शहर के साथ ही पूरा देश सफाई के मामले में आदर्श बन जाए।

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