विजया दशमी और रावण दहन : क्या आप जानते हैं, पैदा ही क्यों हुआ था रावण ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 8 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। नवरात्रि के बाद दसवें दिन विजया दशमी का पर्व मनाया जाता है,जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व माना जाता है। नवरात्रि के दौरान जगह-जगह रामलीला का आयोजन किया जाता है और विजया दशमी के दिन रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। यह तो सब जानते हैं कि भगवान राम ने रावण का वध किया था, परंतु बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि आखिरकार रावण का जन्म ही क्यों हुआ था ?

कौन है रावण ?

यह कहानी शुरू होती है ब्रह्मा पुत्र महर्षि कश्यप की दो पत्नियों से जन्मे दो पुत्रों से। महर्षि कश्यप की एक पत्नी अदिति से देवताओं का जन्म हुआ है और दूसरी पत्नी दिति से दैत्यों का जन्म हुआ। इस प्रकार देव और दैत्य दोनों सौतेले भाई हैं। दोनों संतानों के बीच एक-दूसरे से बड़ा और महान बनने की होड़ लगी। इसी होड़ में दैत्यों ने देवताओं को परास्त करने के लिये गलत साम, दाम, दंड, भेद अपनाए, जिससे वे दिशा भटक गये। देवों और दैत्यों के बीच बार-बार लड़ाई हुई और वे एक-दूसरे के कट्टर शत्रु बन गये। दोनों ही ब्रह्मा और महादेव को कड़ी तपस्या से प्रसन्न करके वर प्राप्त करते थे और एक-दूसरे पर चढ़ाई करते थे। कभी देवों का पलड़ा भारी रहता तो कभी दानवों का। एक बार देवों ने ब्रह्मा से पूछा कि उन्हें दैत्यों पर विजय प्राप्त करने के लिये क्या करना चाहिये, तो उन्होंने बताया कि उन्हें समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्त करना होगा, परंतु यह काम वे दैत्यों से छुप कर भी नहीं कर सकते और उनकी मदद के बिना भी नहीं कर सकते। इसलिये उन्हें मना कर उनके सहयोग से मंथन करें और अमृत प्राप्त कर लेने से उसका पान करने पर दैत्य उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे। देवों ने वैसा ही किया और दैत्यों को मना लिया। जब अमृत प्राप्त हुआ तो उसके लिये उनके बीच लड़ाई हुई। भगवान विष्णु के सहयोग से देवों ने अमृत प्राप्त किया और वे दैत्यों पर भारी पड़ने लगे।

इसके बाद दैत्यों ने अपने गुरु शुक्राचार्य से पूछा कि वे देवताओं पर विजय प्राप्त करने के लिये क्या करें ? तब उन्होंने बताया कि किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण का तेजस्वी पुत्र उनकी मदद करे तो वे देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इससे दैत्य चिंता में पड़ गये कि कौन ब्राह्मण पुत्र उनकी मदद करेगा और क्यों ? तेजस्वी ब्राह्मण दैत्यों की मदद क्यों करेगा और करेगा तो कहीं वही दैत्यों पर भी हावी नहीं हो जाएगा ? कमजोर ब्राह्मण को पकड़ते हैं तो उनका उद्देश्य पूरा नहीं होगा और देवता भी उनकी हँसी उड़ाएँगे। दैत्यों की कीर्ति पर भी धब्बा लग जाएगा। चिंतन करने के बाद दैत्य इस नतीजे पर पहुँचे कि कोई श्रेष्ठ दैत्य कन्या का विवाह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण से करवा दिया जाए, उसका जो पुत्र होगा वह ब्राह्मण भी होगा और दैत्यों का भांजा भी। उसे हम अपनी शरण में ले लेंगे और उसे अपनी शिक्षा-दीक्षा देकर पालेंगे, जिससे वह हमारे अनुसार ही चलेगा। हम जब चाहेंगे उसे देवताओं से भिड़ा देंगे। इसमें भी एक बाधा थी कि कन्यादान करना देवताओं की परंपरा थी और दैत्य देवों की परंपराओं से भिन्न करने के लिये जाने जाते हैं। इसलिये दानव चिंतित थे कि क्या मार्ग निकाला जाए, तभी एक दैत्य की पुत्री केशिनी ने पिता की चिंता का कारण पूछा और उसे मार्ग भी बताया, जिसे सुनकर सभी दैत्य खुश हुए। दैत्यों की अनुमति लेकर केशिनी ने स्वयं ही ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। केशिनी ने वर्षों तक विश्रवा की सेवा की जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने केशिनी से वर माँगने को कहा। केशिनी ने माँगा कि वह अद्भुत और तेजस्वी पुत्रों की माता बनने का गौरव प्राप्त करना चाहती है, जो देवताओं को भी पराजित करने की शक्ति रखते हों। इस प्रकार केशिनी पुत्री, पत्नी और माता के रूप में अपनी मर्यादाओं का पालन करने में पूर्ण रूप से सफल रही। समय आने पर उसने तेजस्वी बालक को जन्म दिया। केशिनी के पिता ने ग्यारहवें दिन उस अद्भुत बालक का नामकरण किया और नाम रखा रावण। इस प्रकार रावण का जन्म हुआ था। बाद में रावण के भाई कुंभकर्ण तथा बहन सूर्पनखा का जन्म हुआ।

क्यों हुआ था रावण का जन्म ?

रावण के जन्म का कारण वैकुंठ लोक में घटी एक घटना से जुड़ा है। वैकुंठ लोक में जय-विजय नामक दो द्वारपाल थे। एक बार उन्होंने शौनकादि बाल ऋषियों को वैकुंठ लोक में प्रवेश करने से रोका था। उन्हें लगा कि भला बालकों का वैकुंठ लोक में क्या काम है। तब शौनकादि ऋषि बालकों में से एक ने जय-विजय को श्राप दे दिया, ‘तुमने वैकुंठ लोक में मृत्यु लोक जैसे नियमों का पालन किया है, स्वयं श्री हरि के द्वार पर सेवा देने के बावजूद तुम्हें इतना भी ज्ञान नहीं है कि किसी को भी श्री हरि से मिलने से नहीं रोका जा सकता। अतः तुम मृत्यु लोक को प्राप्त हो जाओगे। बहस सुन कर स्वयं श्री हरि वहाँ आये और शौनकादि ऋषि बालकों को अपने साथ ले गये। तब जय-विजय ने शौनकादि ऋषि बालकों से क्षमा याचना की, तब उन्होंने कहा कि श्राप तो वापस नहीं लिया जा सकता। समय आने पर तुम्हें मृत्यु लोक तो जाना ही पड़ेगा, परंतु जैसे स्वयं श्री हरि हमें लेने आये हैं, उसी प्रकार तुम्हें भी वैकुंठ लोक लाने के लिये वे स्वयं भी मृत्यु लोक पर आएँगे।’ वही जय-विजय रावण और कुंभकर्ण के रूप में पृथ्वी लोक पर जन्मे थे। इसके अलावा रावण के जन्म की कथा भगवान श्री हरि के सबसे बड़े भक्त कहलाने वाले ब्रह्मर्षि नारदजी द्वारा भगवान नारायण को ही दिये गये पत्नी वियोग के श्राप और चक्रवर्ती राजा बनने के महत्वाकांक्षी प्रतापी राजा प्रतापभानु से भी जोड़ी जाती है, जो चक्रवर्ती राजा बनने के लालच में ब्राह्मणों के श्राप का शिकार हो जाता है, परंतु यह कथाएँ विशेष प्रचलित नहीं हैं।

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