आ अब लौट चलें : 22 फरवरी 1838 को ऐसा क्या हुआ, जिसने 14 वर्ष के मूलशंकर को ‘मूल शंकर’ तक पहुँचा दिया ?

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 30 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS का ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ आज भाग 6 की ओर अग्रसर है। ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ हमारे सुधि पाठकों और वर्तमान युवा पीढ़ी को भारत की प्राचीन-पुरातन मूल संस्कृति की ओर ले जाने का प्रयास है और इस स्तंभ के छठे भाग में हम एक ऐसे संन्यासी योद्धा से आपका परिचय कराने जा रहे हैं, जिन्होंने भारत की वैदिक संस्कृति का पूरी दुनिया में डंका बजाया। वर्तमान आधुनिक पीढ़ी जिस आधुनिकता की बात करती है, ठीक वैसी ही आधुनिकता की बात इस संन्यासी योद्धा ने अपने जीवनकाल में न केवल की, अपितु अपने आचरण से भी आत्मसात की थी। यद्यपि इस संन्यासी योद्धा की आधुनिकता की जड़ में सत्य-सनातन धर्म था। उन्होंने सत्य-सनातन धर्म के माध्यम से समाज को कर्मकांड से परे वास्तविक ईश्वर की पहचान कराने का प्रयास किया और लोगों को कुरीतियों के मुक्त होकर निर्भय-अमर पद प्राप्त करने का मार्ग दिखाया।

जी हाँ। इस संन्यासी योद्धा का नाम है स्वामी दयानंद सरस्वती। आज उनका 136वाँ निर्वाण (अंतर्ध्यान) दिवस है। आज जब पूरे देश में दीपावली का उमंग अभी भी बना हुआ है, परंतु 30 अक्टूबर, 1883 को एक दीपावली ऐसी भी आई, जब अंग्रेजों के षड्यंत्र ने भारत से इस महान संन्यासी योद्धा को छीन लिया। क्रांतिकारी धार्मिक विचारों के प्रणेता, सत्य-सनातन धर्म के सूत्रधार, भारतीय वैदिक संस्कृति के द्योतक और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती को अंग्रेजों ने एक षड्यंत्र के माध्यम से निर्वाण (वाणी रहित) कर दिया, परंतु एक सच्चे ज्ञानी महापुरुष होने के नाते स्वामी दयानंद सरस्वती ने षड्यंत्रकारियों को न केवल भाग जाने की सलाह दी, अपितु उन्हें भागने के लिए 500 रुपए किराया और भोजन-पानी की भी व्यवस्था करके दी।

उस शिवरात्रि ने जगा दिया मूलशंकर को, हम कब जागेंगे ?

हम हर वर्ष फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान शिव का पर्व महाशिवरात्रि मनाते हैं। इस दिन भगवान शिव के मंदिरों में शिवालयों पर करोड़ों लीटर दूध चढ़ाते हैं, जो अंतत: मिट्टी में मिल जाता है, न कि किसी भूखे के पेट में जाता है। आज से 181 वर्ष पहले भी ऐसी ही एक शिवरात्रि तत्कालीन मुंबई राज्य की मोरबी रियासत (अब गुजरात) के टंकारा गाँव मं मूलशंकर के घर में भी मनाई गई थी। 12 फरवरी, 1824 को जन्मे दयानंद सरस्वती का वास्तविक नाम मूलशंकर ही था। ब्राह्मण परिवार में पिता करशनजी लालजी तिवारी और माँ यशोदाबाई के घर जन्मे मूल शंकर का आरंभिक जीवन बहुत ही आराम से बीत रहा था, क्योंकि पिता करशनजी कर कलेक्टर थे। बालक मूलशंकर बड़े होकर संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए, परंतु फाल्गुन कृष्ण संवत् 1895 यानी 22 फरवरी, 1838 को उनके घर में मनाई गई महाशिवरात्रि पर घटी एक घटना ने मूलशंकर को भीतर से जागृत कर दिया। मूलशंकर उस समय 14 वर्ष के थे। शिवरात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मंदिर में ही रुका हुआ था। पूरा परिवार कुछ देर बाद सो गया, परंतु बालक मूलशंकर जागते रहे, यह सोच कर कि भगवान शिव आएँगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित् हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाए गए प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता, वह मानवता की रक्षा क्या करेगा ? इस एक बात ने मूलशंकर की आत्मा को जगा दिया कि असली ईश्वर केवल मूर्ति में नहीं है। यदि होता, तो वह स्वयं को चढ़ाए गए प्रसाद की रक्षा करता। इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए। इसके बाद अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे, जिनसे उनके माता पिता चिंति रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (१९वीं सदी के आर्यावर्त (भारत) में यह आम प्रथा थी), परंतु बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे 1846 में सत्य ईश्वर की खोज में निकल पड़े। प्रश्न यह उठता है कि मूलशंकर तो मूल शंकर की खोज में घर छोड़ कर निकल पड़े, परंतु हम कब जागेंगे ?

ऋषिकृत ग्रंथ ही मूल ईश्वर

जब मूलशंकर ने छोटी-सी आयु यानी 14 वर्ष की आयु में यह समझ लिया कि मूर्ति पूजा मूल शंकर यानी परम तत्व की ओर नहीं ले जा सकती, तो उन्होंने मूल ईश्वर की खोज आरंभ की और यात्रा करते हुए संत विराजनंद के पास पहुँचे। मूलशंकर ने विरजानंद को गुरु बनाया। गुरु विरजानंद ने मूलशंकर को पाणिनी व्याकरण, पातंजल-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग और वेदांत की शिक्षा दी। जब गुरु दक्षिण की बारी आई, तो गुरु विरजानंद ने मूलशंकर ने गुरु दक्षिणा मांगी, ‘विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है। मेरा आशीर्वाद है कि ईश्वर तुम्हारे पुरुषार्थ को सफल करे।’ गुरुवार ने अंतिम शिक्षा दी, ‘मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है, ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं। वेद प्रमाण हैं। इस कसौटी को हाथ से न छोड़ना।’ महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर ‘पाखण्ड खण्डिनी पताका’ फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। यहीं से उन्होंने पूरे वस्त्र पहनना तथा हिन्दी में बोलना व लिखना प्रारंभ किया। यहीं उन्होंने तत्कालीन वाइसराय को कहा था, ‘मैं चाहता हूँ कि विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है, परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का व्यवहार पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है।’ महर्षि दयानन्द सरस्वती ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् १९३२(सन् १८७५) को गिरगांव मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है। संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

वेद ही सत्य परमेश्वर के सबसे सटीक प्रमाण

‘वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रंथ प्रमाण नहीं है।’ इस सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामीजी ने सारे देश का भ्रमण आरंभ किया। वे जहाँ-जहाँ गए प्राचीन परंपरा के पंडित और विद्वान उनसे हार मानते गये। संस्कृत भाषा का उन्हें अगाध ज्ञान था। संस्कृत में वे धाराप्रवाह बोलते थे। साथ ही वे प्रचंड तार्किक थे। उन्होंने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रन्थों का भली-भांति अध्ययन-मन्थन किया था। अतएव अकेले ही उन्होंने तीन-तीन मोर्चों पर संघर्ष आरंभ कर दिया। दो मोर्चे तो ईसाइयत और इस्लाम के थे किंतु तीसरा मोर्चा सनातनधर्मी हिंदुओं का था, जिनसे जूझने में स्वामी जी को अनेक अपमान, कलंक और कष्ट झेलने पड़े। दयानन्द ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलायी थी, उसका कोई जवाब नहीं था। वे जो कुछ कह रहे थे, उसका उत्तर न तो मुसलमान दे सकते थे, न ईसाई, न पुराणों पर पलने वाले हिन्दू पण्डित और विद्वान। हिन्दू नवोत्थान अब पूरे प्रकाश में आ गया था और अनेक समझदार लोग मन ही मन अनुभव करने लगे थे कि वास्तव में पौराणिक धर्म की पोंगापंथी में कोई सार नहीं है। स्वामीजी प्रचलित धर्मों में व्याप्त बुराइयों का कड़ा खण्डन करते थे चाहे वह सनातन धर्म हो या इस्लाम हो या ईसाई धर्म हो। अपने महाग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में स्वामीजी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है। उनके समकालीन सुधारकों से अलग, स्वामीजी का मत शिक्षित वर्ग तक ही सीमित नहीं था अपितु आर्य समाज ने आर्यावर्त (भारत) के साधारण जनमानस को भी अपनी ओर आकर्षित किया। वर्ष 1872 ई. में स्वामी जी कलकत्ता पधारे। वहां देवेन्द्रनाथ ठाकुर और केशवचन्द्र सेन ने उनका बड़ा सत्कार किया। ब्राह्मो समाजियों से उनका विचार-विमर्श भी हुआ किन्तु ईसाइयत से प्रभावित ब्राह्मो समाजी विद्वान पुनर्जन्म और वेद की प्रामाणिकता के विषय में स्वामी से एकमत नहीं हो सके। कहते हैं कलकत्ते में ही केशवचन्द्र सेन ने स्वामी जी को यह सलाह दे डाली कि यदि आप संस्कृत छोड़ कर आर्यभाषा (हिन्दी) में बोलना आरम्भ करें, तो देश का असीम उपकार हो सकता है। तभी से स्वामी जी के व्याख्यानों की भाषा आर्यभाषा (हिन्दी) हो गयी और आर्यभाषी (हिन्दी) प्रान्तों में उन्हे अगणित अनुयायी मिलने लगे। कलकत्ता से स्वामी जी मुम्बई पधारे और वहीं 10 अप्रैल, 1875 को उन्होने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। मुम्बई में उनके साथ प्रार्थना समाज वालों ने भी विचार-विमर्श किया, किंतु यह समाज तो ब्राह्मो समाज का ही मुम्बई संस्करण था। अतएव स्वामी जी से इस समाज के लोग भी एकमत नहीं हो सके। मुम्बई से लौट कर स्वामी जी इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) आए। वहां उन्होंने सत्यानुसन्धान के लिए ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलायी। किन्तु दो दिनों के विचार-विमर्श के बाद भी लोग किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से स्वामी जी पंजाब गए। पंजाब में उनके प्रति बहुत उत्साह जागृत हुआ और सारे प्रान्त में आर्यसमाज की शाखाएं खुलने लगीं। तभी से पंजाब आर्यसमाजियों का प्रधान गढ़ रहा है।

कुरीतियों के विरुद्ध छेड़ा विद्रोह और बन गए संन्यासी योद्धा

महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों और रूढियों-बुराइयों को दूर करने के लिए, निर्भय होकर उन पर आक्रमण किया। वे ‘संन्यासी योद्धा’ कहलाए। उन्होंने ‘जन्मना जाति’ का विरोध किया तथा कर्म के आधार वेदानुकूल वर्ण-निर्धारण की बात कही। वे दलितोद्धार के पक्षधर थे। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा के लिए प्रबल आन्दोलन चलाया। उन्होंने बाल विवाह तथा सती प्रथा का निषेध किया तथा विधवा विवाह का समर्थन किया। उन्होंने ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण तथा प्रकृति को अनादि तथा शाश्वत माना। वे तैत्रवाद के समर्थक थे। उनके दार्शनिक विचार वेदानुकूल थे। उन्होंने यह भी माना कि जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं तथा फल भोगने में परतन्त्र हैं। महर्षि दयानन्द सभी धर्मानुयायियों को एक मंच पर लाकर एकता स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) दरबार के समय 1878 में ऐसा प्रयास किया था। उनके अमर ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’, ‘संस्कार विधि’ और ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’ में उनके मौलिक विचार सुस्पष्ट रूप में प्राप्य हैं। वे योगी थे तथा प्राणायाम पर उनका विशेष बल था। वे सामाजिक पुनर्गठन में सभी वर्णों तथा स्त्रियों की भागीदारी के पक्षधर थे। राष्ट्रीय जागरण की दिशा में उन्होंने सामाजिक क्रांति तथा आध्यात्मिक पुनरुत्थान के मार्ग को अपनाया। उनकी शिक्षा सम्बन्धी धारणाओं में प्रदर्शित दूरदर्शिता, देशभक्ति तथा व्यवहारिकता पूर्णतया प्रासंगिक तथा युगानुकूल है। महर्षि दयानन्द समाज सुधारक तथा धार्मिक पुनर्जागरण के प्रवर्तक तो थे ही, वे प्रचण्ड राष्ट्रवादी तथा राजनैतिक आदर्शवादी भी थे। विदेशियों के आर्यावर्त में राज्य होने के कारण आपस की फूट, मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विधान पढना-पढाना व बाल्यावस्था में अस्वयंवरविवाह, विषयासक्ति, मिथ्या भाषावादि, कुलक्षण, वेद-विद्या का प्रचार आदि कुकर्म हैं, जब आपस में भाई-भाई लडते हैं और तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है। उन्होंने राज्याध्यक्ष तथा शासन की विभिन्न परिषदों एवं समितियों के लिए आवश्यक योग्यताओं को भी गिनाया है। उन्होंने न्याय की व्यवस्था ऋषि प्रणीत ग्रन्थों के आधार पर किए जाने का पक्ष लिया।

राष्ट्र धर्म भी निभाया और बने 1857 की क्रांति के सूत्रपाती

स्वामी दयानन्द सरस्वती को सामान्यत: केवल आर्य समाज के संस्थापक तथा समाज-सुधारक के रूप में ही जाना जाता है। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए किये गए प्रयत्नों में उनकी उल्लेखनीय भूमिका की जानकारी बहुत कम लोगों को है। वस्तुस्थिति यह है कि पराधीन आर्यावर्त (भारत) में यह कहने का साहस सम्भवत: सर्वप्रथम स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ही किया था, ‘आर्यावर्त (भारत), आर्यावर्तियों (भारतीयों) का है।’ हमारे प्रथम स्वतन्त्रता समर यानी 1857 की क्रांति की सम्पूर्ण योजना भी स्वामी जी के नेतृत्व में ही तैयार की गई थी और वही उसके प्रमुख सूत्रधार भी थे। वे अपने प्रवचनों में श्रोताओं को प्राय: राष्ट्रवाद का उपदेश देते और देश के लिए मर मिटने की भावना भरते थे। 1855 में हरिद्वार में जब कुम्भ मेला लगा था, तो उसमें शामिल होने के लिए स्वामी जी ने आबू पर्वत से हरिद्वार तक पैदल यात्रा की थी। रास्ते में उन्होंने स्थान-स्थान पर प्रवचन किए तथा देशवासियों की नब्ज़ टटोली। उन्होंने यह अनुभव किया कि लोग अब अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आ चुके हैं और देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने को आतुर हो उठे हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हरिद्वार पहुँच कर वहाँ एक पहाड़ी के एकान्त स्थान पर अपना डेरा जमाया। वहीं पर उन्होंने पाँच ऐसे व्यक्तियों से भेंट की, जो आगे चलकर सन् 1857 की क्रांति के कर्णधार बने। ये पांच व्यक्ति थे नाना साहेब, अजीमुल्ला खाँ, बाला साहब, तात्या टोपे तथा बाबू कुँवर सिंह। बातचीत काफी लम्बी चली और यहीं पर यह तय किया गया कि फिरंगी सरकार के विरुद्ध सम्पूर्ण देश में सशस्त्र क्रांति के लिए आधारभूमि तैयार की जाए और उसके बाद एक निश्चित दिन सम्पूर्ण देश में एक साथ क्रांति का बिगुल बजा दिया जाए। जनसाधारण तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) सैनिकों में इस क्रांति की आवाज़ को पहुँचाने के लिए ‘रोटी तथा कमल’ की भी योजना यहीं तैयार की गई। इस सम्पूर्ण विचार विमर्श में प्रमुख भूमिका स्वामी दयानन्द सरस्वती की ही थी। विचार विमर्श तथा योजना-निर्धारण के उपरान्त स्वामी जी तो हरिद्वार में ही रुक गए तथा अन्य पांचों राष्ट्रीय नेता योजना को यथार्थ रूप देने के लिए अपने-अपने स्थानों पर चले गए। उनके जाने के बाद स्वामी जी ने अपने कुछ विश्वस्त साधु संन्यासियों से सम्पर्क स्थापित किया और उनका एक गुप्त संगठन बनाया। इस संगठन का मुख्यालय इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) में महरौली स्थित योगमाया मन्दिर में बनाया गया। इस मुख्यालय ने स्वाधीनता समर में उल्लेखनीय भूमिका निभायी। स्वामी जी के नेतृत्व में साधुओं ने भी सम्पूर्ण देश में क्रान्ति का अलख जगाया। वे क्रान्तिकारियों के सन्देश एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाते, उन्हें प्रोत्साहित करते और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं भी हथियार उठाकर अंग्रेजों से संघर्ष करते। सन् १८५७ की क्रान्ति की सम्पूर्ण अवधि में राष्ट्रीय नेता, स्वामी दयानन्द सरस्वती के निरंतर सम्पर्क में रहे।

भारत की स्वतंत्रता को लेकर की सटीक भविष्यवाणी

स्वतन्त्रता-संघर्ष की असफलता पर भी स्वामी जी निराश नहीं थे। उन्हें तो इस बात का पहले से ही आभास था कि केवल एक बार प्रयत्न करने से ही स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती। इसके लिए तो संघर्ष की लम्बी प्रक्रिया चलानी होगी। हरिद्वार में ही 1855 की बैठक में बाबू कुँवर सिंह ने जब अपने इस संघर्ष में सफलता की संभावना के बारे में स्वामी जी से पूछा तो उनका बेबाक उत्तर था, ‘स्वतंत्रता संघर्ष कभी असफल नहीं होता। भारत धीरे-धीरे एक सौ वर्ष में परतंत्र बना है। अब इसको स्वतंत्र होने में भी एक सौ वर्ष लग जाएँगे। इस स्वतंत्रता प्राप्ति में बहुत से अनमोल प्राणों की आहुतियाँ डाली जाएँगी।’ स्वामी जी की यह भविष्यवाणी कितनी सही निकली, इसे बाद की घटनाओं ने प्रमाणित कर दिया। स्वतन्त्रता-संघर्ष की असफलता के बाद जब तात्या टोपे, नाना साहब तथा अन्य राष्ट्रीय नेता स्वामी जी से मिले तो उन्हें भी उन्होंने निराश न होने तथा उचित समय की प्रतीक्षा करने की ही सलाह दी। 1857 की क्रान्ति के दो वर्ष बाद स्वामी जी ने स्वामी विरजानन्द को अपना गुरु बनाया और उनसे दीक्षा ली। स्वामी विरजानन्द के आश्रम में रहकर उन्होंने वेदों का अध्ययन किया, उन पर चिन्तन किया और उसके बाद अपने गुरु के निर्देशानुसार वे वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार में जुट गए। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने आर्य समाज की भी स्थापना की और उसके माध्यम से समाज-सुधार के अनेक कार्य किए। छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि, धार्मिक संकीर्णता तथा अन्धविश्वासों के विरुद्ध उन्होंने जमकर प्रचार किया और विधवा विवाह, धार्मिक उदारता तथा आपसी भाईचारे का उन्होंने समर्थन किया। इन सबके साथ स्वामी जी लोगों में देशभक्ति की भावना भरने से भी कभी नहीं चूकते थे।

जब अंग्रेज भी घबराने लगे

प्रारम्भ में अनेक व्यक्तियों ने स्वामी जी के समाज सुधार के कार्यों में विभिन्न प्रकार के विघ्न डाले और उनका विरोध किया। धीरे-धीरे उनके तर्क लोगों की समझ में आने लगे और विरोध कम हुआ। उनकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ने लगी। इससे अंग्रेज अधिकारियों के मन में यह इच्छा उठी कि अगर इन्हें अंग्रेजी सरकार के पक्ष में कर लिया जाए तो सहज ही उनके माध्यम से जनसाधारण में अंग्रेजों को लोकप्रिय बनाया जा सकता है। इससे पूर्व अंग्रेज अधिकारी इसी प्रकार से अन्य कुछ धर्मोपदेशकों तथा धर्माधिकारियों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर अपनी तरफ मिला चुके थे। उन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती को भी उन्हीं के समान समझा। तद्नुसार एक ईसाई पादरी के माध्यम से स्वामी जी की तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड नार्थब्रुक से मुलाकात करवायी गई। यह मुलाकात मार्च १८७३ में कलकत्ता में हुई। इधर-उधर की कुछ औपचारिक बातों के उपरान्त लॉर्ड नार्थब्रुक ने विनम्रता से अपनी बात स्वामी जी के सामने रखी, ‘अपने व्याख्यान के प्रारम्भ में आप जो ईश्वर की प्रार्थना करते हैं, क्या उसमें आप अंग्रेजी सरकार के कल्याण की भी प्रार्थना कर सकेंगे।’गर्वनर जनरल की बात सुन कर स्वामी जी सहज ही सब कुछ समझ गए। उन्हें अंग्रेजी सरकार की बुद्धि पर तरस भी आया, जो उन्हें ठीक तरह नहीं समझ सकी थी। उन्होंने निर्भीकता और दृढ़ता से गवर्नर जनरल को उत्तर दिया, ‘मैं ऐसी किसी भी बात को स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी यह स्पष्ट मान्यता है कि राजनीतिक स्तर पर मेरे देशवासियों की निर्बाध प्रगति के लिए तथा संसार की सभ्य जातियों के समुदाय में आर्यावर्त (भारत) को सम्माननीय स्थान प्रदान करने के लिए यह अनिवार्य है कि मेरे देशवासियों को पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो। सर्वशक्तिशाली परमात्मा के समक्ष प्रतिदिन मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरे देशवासी विदेशी सत्ता के जुए से शीघ्रातिशीघ्र मुक्त हों।’ गवर्नर जनरल को स्वामी जी से इस प्रकार के तीखे उत्तर की आशा नहीं थी। मुलाकात तत्काल समाप्त कर दी गई और स्वामी जी वहाँ से लौट आए।

अपने हत्यारों को क्षमा किया और सहायता भी दी

महर्षि दयानंद सरस्वती के तीखे तेवरों के देखते हुए अंग्रेज सरकार के गुप्तचर विभाग की स्वामी जी पर तथा उनकी संस्था आर्य-समाज पर गहरी दृष्टि रही। उनकी प्रत्येक गतिविधि और उनके द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का रिकॉर्ड रखा जाने लगा। आम जनता पर उनके प्रभाव से सरकार को अहसास होने लगा कि यह बागी फकीर और आर्यसमाज किसी भी दिन सरकार के लिए खतरा बन सकते हैं। इसलिए स्वामी जी को समाप्त करने के लिए भी तरह-तरह के षड्यन्त्र रचे जाने लगे। स्वामी जी की मृत्यु जिन परिस्थितियों में हुई, उससे भी यही आभास मिलता है कि उसमें निश्चित ही अग्रेजी सरकार का कोई षड्यन्त्र था। स्वामी जी की मृत्यु 30 अक्टूबर, 1883को दीपावली के दिन संध्या के समय हुई थी। उन दिनों वे जोधपुर नरेश महाराज जसवन्त सिंह के निमन्त्रण पर जोधपुर गये हुए थे। वहाँ उनके नित्य ही प्रवचन होते थे। यदाकदा महाराज जसवन्त सिंह भी उनके चरणों में बैठकर वहाँ उनके प्रवचन सुनते। दो-चार बार स्वामी जी भी राज्य महलों में गए। वहाँ पर उन्होंने नन्हीं नामक वेश्या का अनावश्यक हस्तक्षेप और महाराज जसवन्त सिंह पर उसका अत्यधिक प्रभाव देखा। स्वामी जी को यह बहुत बुरा लगा। उन्होंने महाराज को इस बारे में समझाया, तो उन्होंने विनम्रता से उनकी बात स्वीकार कर ली और नन्हीं से सम्बन्ध तोड़ लिए। इससे नन्हीं स्वामी जी के बहुत अधिक विरुद्ध हो गई। उसने स्वामी जी के रसोइए कलिया उर्फ जगन्नाथ को अपनी तरफ मिला कर उनके दूध में पिसा हुआ काँच डलवा दिया। थोड़ी ही देर बाद स्वामी जी के पास आकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया और उसके लिए क्षमा मांगी। उदार-हृदय स्वामी जी ने उसे राह-खर्च और जीवन-यापन के लिए 500 रुपए देकर वहां से विदा कर दिया, ताकि पुलिस उसे पकड़ न सके।। बाद में जब स्वामी जी को जोधपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया, तो वहाँ सम्बन्धित चिकित्सक भी संदेह के दायरे में रहा। उस पर आरोप था कि वह औषधि के नाम पर स्वामी जी को हल्का विष पिलाता रहा। बाद में जब स्वामी जी की तबियत बहुत खराब होने लगी, तो उन्हें अजमेर के अस्पताल में लाया गया, परंतु तब तक काफी विलम्ब हो चुका था। स्वामी जी को बचाया नहीं जा सका। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में आशंका यही है कि वेश्या को उभारने तथा चिकित्सक को बरगलाने का कार्य अंग्रेजी सरकार के इशारे पर किसी अंग्रेज अधिकारी ने ही किया। अन्यथा एक साधारण वेश्या के लिए यह सम्भव नहीं था कि केवल अपने बलबूते पर स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा षड्यन्त्र कर सके। बिना किसी प्रोत्साहन और संरक्षण के चिकित्सक भी ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता था।

यह थे महर्षि दयानंद सरस्वती के अंतिम शब्द

स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृति और स्वदेशोन्नति के अग्रदूत स्वामी दयानन्द जी का शरीर सन् 1883 में दीपावली के दिन पंचतत्व में विलीन हो गया और वे अपने पीछे छोड़ गए एक सिद्धान्त, ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ अर्थात सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ। उनके अन्तिम शब्द थे, ‘प्रभु ! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।’

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