VIDEO : हे ईश्वर ! हमारे देश में दिव्यांशियों की बहे धारा, जो धरा को कर दे हरा-भरा

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 18 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत की कुल जनसंख्या यानी लगभग 136 करोड लोगों में 47 करोड़ नागरिक 18 वर्ष से कम आयु के हैं। 0 से 18 वर्ष के मध्य वाले जीवन की यह एक ऐसी अवस्था है, जहाँ व्यक्ति जीवन के आगामी चरणों की सीख ले रहा होता है, परंतु आज के आधुनिक युग में इस अवस्था काल के लोग, जिन्हें हम बच्चे ही कहेंगे, अधिकांशत: स्कूली पुस्तकों के बोझ और उस बोझ से थोड़ा-सा भी समय मिलते ही मोबाइल गेम्स में मग्न रहते हैं। मोबाइल गेम का भूत तो हमारी इस भावी पीढ़ी से ऐसे लिपट पड़ा है कि 2 वर्ष के बच्चे के लिए भले वास्तविक प्लेन उड़ाना असंभव हो, परंतु वह मोबाइल गेम में आराम से प्लेन उड़ा सकता है। यह चित्ताकर्षक मोबाइल गेम्स हमारे बच्चों के मानसिक विकास को इतना ग्रंथित कर रही हैं कि वे उस दुनिया से बाहर परिवार के बारे में सोच भी नहीं सकते, विश्व की चिंता की तो कल्पना ही कैसे की जा सकती है ?

हम यह नहीं कह रहे कि देश में 18 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चे मोबाइल गेम के दीवाने हैं, परंतु हर बच्चा समय और मोबाइल मिलने पर मोबाइल गेम अवश्य खेलता ही है। इन सबके बीच एक 7 वर्षीय बच्ची बड़ी प्रेरणा बन कर उभरी है। इसका नाम है दिव्यांशी। दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली दिव्यांशी भी कदाचित मोबाइल गेम खेलती होगी, परंतु साथ ही उसने ऐसी दिव्य दृष्टि भी पाई है, जो पूरे विश्व का कल्याण चाहती है। साधारणत: 5 से 10 वर्ष का बच्चा कितना सोच सकता है ? परंतु 7 वर्षीय दिव्यांशी कोई साधारण बच्ची नहीं है और यह बात उसने गूगल डूडल इंडिया प्रतियोगिता (GOOGLE DOODLE INDIA COMPETITION) जीत कर सिद्ध कर दिखाई है। यह प्रतियोगिता ही महान नहीं थी, अपितु इसकी थीम भी महान थी और यही कारण है कि दिव्यांशी की जीत भी महान है।

जब दिव्यांशी को विचार आया, ‘काश ! पेड़ों के पाँव होते’

हरियाणा के गुरुग्राम की निवासी दिव्यांशी सिंघल ने गूगल डूडल इंडिया प्रतियोगिता 1 लाख से अधिक प्रतिभागियों को मात देकर जीती है। दिव्यांशी ने अपने डूडल में यह कल्पना की थी कि भविष्य में ऐसे पेड़-पौधे हों, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकें। दिव्यांशी के इस डूडल के पीछे एक कहानी है। वास्तव में दिव्यांशी जब पिछली गर्मी की छुट्टियों में अपने दादा-दादी के यहाँ गई थी, तो वहाँ उसने देखा कि पेड़ काटे जा रहे हैं। दिव्यांशी को बहुत बुरा लगा और उसके मन में एक विचार स्फुरित हुआ, ‘काश ! इन पेड़ों के भी पाँव होते, तो वे यहाँ से कहीं और चले जाते और कटने से बच जाते।’ इसी स्फुरण को दिव्यांशी ने गूगल डूडल इंडिया प्रतियोगिता में उकेरा और प्रतियोगिता में जीत हासिल की। गत 14 नवंबर को भारत में मनाए गए बाल दिवस के दिन गूगल ने दिव्यांशी का बनाया हुआ डूडल जारी किया था। गूगल ने दिव्यांशी के डूडल का उपयोग कर इसका शीर्षक दिया था, ‘द वॉकिंग ट्री’, जो हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए वनों की कटाई से बचाने को पेड़ों की रक्षा करने का संदेश देता है। गूगल ने इस प्रतियोगिता के लिए पूरे देश के बच्चों से पेंटिंग्स आमंत्रित की थीं और थीम दी थी, ‘जब मैं बड़ा होता हूँ, मुझे आशा…’

काश ! देश में ‘दिव्यांशियों’ की धारा बहे

दिव्यांशी की यह दिव्य और दीर्घ दृष्टि देश के सभी बच्चों के लिए प्रेरणास्पद है। जिस तरह से भारत सहित पूरे विश्व में प्रकृति का दोहन हो रहा है, पेड़ों-जंगलों की कटाई हो रही है, उसे देखते हुए हमें ईश्वर यही प्रार्थना करनी चाहिए कि देश में दिव्यांशी जैसी बच्चियों की धारा बहे, जो आने वाली पीढ़ियों को एक हरा-भरा भारत दे सके। मोबाइल गेम के चक्रव्यूह में फँसा बचपन दिव्यांशी की तरह सोचने लगे और 47 करोड़ बच्चे यदि दिव्यांशी की धारा में बहने लगें, तो हमारे देश में पेड़ों का घनघोर जंगल खड़ा हो सकता है। बस, आवश्यकता है तो दिव्यांशी की तरह दिव्य और दीर्घ दृष्टि की।

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