वाल्मीकि जयंती : जानिए कौन हैं वाल्मीकि और दुनिया में कितनी हैं रामायण ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 13 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। रविवार को अश्विन माह शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है और आज ही के दिन महर्षि वाल्मीकि की जयंती भी है। महर्षि वाल्मीकि को 24वें त्रेतायुग में भगवान राम की जीवनी लिखने के लिये जाना जाता है, जिसे ‘रामायण’ कहा जाता है। उन्होंने इसे संस्कृत में लिखा है और 24,000 श्लोकों में राम की पूरी जीवन कथा का वर्णन किया है। वैसे तो दुनिया भर में 300 से भी अधिक रामायण ग्रंथ प्रचलित हैं, परंतु महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को ही सर्वाधिक प्रमाणभूत माना जाता है, क्योंकि उन्होंने इसे तब लिखा था जब भगवान राम मानवावतार में धरती पर मौजूद थे। इतना ही नहीं, वनवास काल में स्वयं भगवान राम उनके आश्रम में गये थे। उन्होंने भगवान राम द्वारा त्यकित माता सीता को अपने आश्रम में आश्रय भी दिया था और राम के दोनों पुत्रों लव और कुश का जन्म भी उन्हीं के आश्रम में हुआ था, जिन्हें महर्षि वाल्मीकि ने ही धर्म शास्त्रों और युद्ध कला-कौशल की शिक्षा-दीक्षा दी थी।

कौन हैं महर्षि वाल्मीकि ?

महर्षि वाल्मीकि की गणना प्राचीन काल के महानतम ऋषियों में की जाती है। पुराणों में वर्णन है कि उन्होंने अपनी कठिन तपस्या से महर्षि की उपाधि प्राप्त की थी। उन्हें आदि कवि भी कहा जाता है। आदि का अर्थ प्रथम और कवि इसलिये कि उन्होंने प्रथम संस्कृत महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना की थी। रामायण को दुनिया के सबसे प्राचीन संस्कृत महाकाव्य का दर्जा दिया गया है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे महर्षि बनने से पहले चोर थे और भील थे, जबकि यह सत्य नहीं है। उन्होंने स्वयं रामायण में इस बात का खुलासा किया है कि वे किसी दस्यु कुल में पैदा नहीं हुए थे, अपितु वे ब्रह्मर्षि भृगु के वंश में जन्मे ब्राह्मण थे। भार्गव वंश में भी एक लोहजंघ नामक ब्राह्मण प्रजाति थी, जिसका दूसरा नाम ऋक्ष था। यह प्रजाति ब्राह्मण होकर भी चौर्य आदि कर्म करती थी। वाल्मीकि भी इसीलिये यह कर्म करते थे और ब्रह्मर्षि नारद की प्रेरणा से वे यह कर्म छोड़ कर कठोर तप करने चले गये थे। वे वर्षों तक तपस्या में ऐसे लीन रहे कि चीटियों ने उनके शरीर पर वाम्बी बना ली थी, इसलिये ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उन्हें वाल्मीकि नाम और महर्षि की उपाधि दी थी। इससे पहले उनका नाम रत्नाकर हुआ करता था।

इतना ही नहीं, विष्णु पुराण में महर्षि वाल्मीकि को ही 24वें द्वापर युग में संपूर्ण वेद से 4 वेदों ऋग्वेद, सामवेद, यथर्ववेद और यजुर्वेद का विस्तार करने वाले व्यासजी बताया गया है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि भार्गव ऋभु ही 24वें व्यासजी के रूप में पुनः ब्रह्माजी के पुत्र प्राचेतस वाल्मीकि हुए। रामायण में वाल्मीकि भगवान राम को अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि वे प्रचेता के दसवें पुत्र हैं। मनु स्मृति में उल्लेख है कि कल्पांतर में नवीन सृष्टि के सृजन के लिये ब्रह्मा के चेतस से प्रचेता आदि दस पुत्र उत्पन्न हुए। शिव पुराण में उल्लेख मिलता है कि प्राचेतस वाल्मीकि ब्रह्मा के पुत्र ने श्रीमद् रामायण की रचना की।

धर्म ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि नारदजी के श्राप और रावण वध के लिये रामावतार लेने से पहले भगवान विष्णु शिवजी को इस अवतार की कथा सुना रहे थे, तब यह कथा विष्णुजी के वाहन गरुड़जी ने सुनी थी, उन्होंने यह कथा अपने सहयोगी पक्षी कागभुसुंडजी यानी कौए को सुनाई थी। कागभुसुंडजी ने यह कथा नारदजी को सुनाई थी और नारद ने वाल्मीकि को सुनाई थी। भगवान शिव भी यह कथा माता पार्वती को सुनाते हैं। इसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने यह कथा लिखना आरंभ किया था।

सतयुग, त्रेता युग और द्वापर युग तीनों कालों में वाल्मीकि का उल्लेख मिलता है। वह भी वाल्मीकि के ही नाम से। जब राम ने उनके आश्रम में आकर उन्हें दण्डवत प्रणाम किया था तो स्वयं राम ने उनके बारे में कहा था कि आप त्रिकालदर्शी मुनि हो, संसार आपके हाथ में एक बेर के समान प्रतीत होता है। महाभारत काल में युद्ध जीतने के बाद जब द्रौपदी यज्ञ रखती हैं तो शंख बजाने का अवसर आता है, परंतु श्रीकृष्ण सहित सभी के प्रयास करने पर भी शंख नहीं बजता है, तब श्रीकृष्ण के कहने पर सब मिल कर वाल्मीकि से प्रार्थना करते हैं और वे प्रकट होते हैं तो शंख स्वयं बज उठता है। इस घटना का कबीर ने भी अपने एक दोहे में उल्लेख किया है कि ‘सुपच रूप धार सतगुरु आये। पांडों के यज्ञ में शंख बजाये।’

राम भारत में ही नहीं, दुनिया के देवता

फिलीपींस में रामायण पर आधारित प्रसिद्ध नृत्य सिंगकिल

भारत में सामान्यतः भगवान राम के जीवन पर लिखे गये दो ग्रंथ अधिक प्रचलित हैं। वाल्मीकि रचित ‘रामायण’ और ई. स. 1554 में हुए राम भक्त तुलसीदास कृत ‘श्री रामचरित मानस।’ तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अवधि भाषा में की है। इन दोनों के अलावा हनुमद रामायण भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि हनुमानजी ने वाल्मिकी रामायण से भी पूर्व हनुमद रामायण की रचना कर दी थी। इसके अलावा अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण भी देश में चर्चित हैं। पूरे देश की बात करें तो तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया भाषा में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण, जैनों में जैन रामायण आदि उपलब्ध हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के रामपुर की रजा लाइब्रेरी में फारसी भाषा में लिखी गई रामायण उपलब्ध है। इस रामायण को लगभग 300 वर्ष पूर्व 1713 में मुगल शासक फर्रुखसियर के शासनकाल में सुमेर चंद नामक एक लेखक ने संस्कृत से फारसी में अनुवादित किया था। यह रामायण मुगल शैली की 258 रंगीन तस्वीरों वाली पहली रामायण है। इसके ऊपरी भाग को सोने के पानी और कीमती पत्थरों के रंगों से गुलबूटे और नक्शो-निगार से सजाया गया है। इसकी तस्वीरों में रावण के दस सिरों के ऊपर गधे के सिर की तस्वीर बनाई गई है, क्योंकि उसने सीता का हरण किया था।

कई देशों में है रामायण और राम के शिलालेख

कंबोडियन रामायण रिआमकेर

दुनिया की बात करें तो कंबोडिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम यानी रामजातक, मलेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलित ग्रंथ हैं। इनके अलावा भी कई देशों में वहाँ की भाषा में भगवान राम के चरित्र पर रामायण लिखी गई हैं। इसके अलावा कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा, मंगोलिया, जापान, चीन, तिब्बत, तुर्किस्तान और बर्मा (म्यांमार) आदि देशों की लोक संस्कृति व ग्रंथों में भी भगवान राम के किस्से मिलते हैं। शिलालेख, भित्तिचित्र, सिक्के, रामसेतु व अन्य पुरातात्विक अवशेष भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक व अन्य देशों सीरिया, ईराक, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया, सुमात्रा, जावा, इंडोनेशिया, बाली, फिलीपींस, श्रीलंका, मालदीव, मारिशस आदि तक फैले हुए हैं। इनसे भी सिद्ध हुआ है कि राम की कीर्ति दुनिया के कई हिस्सों तक फैली है, जो राम के होने और उनके दुनिया पर प्रभाव की पुष्टि करते हैं।

हिंदोशिया बना इंडोनेशिया

म्यांमार की प्राचीनतम गद्यकृति रामवत्थु है। लाओस में रामजातक के अलावा ख्वाय थोरफी, पोम्मचक (ब्रह्मचक्र) और लंका नाई के नाम से उपलब्ध ग्रंथों में राम के चरित्र का वर्णन है। हालाँकि विभिन्न देशों में उपलब्ध राम के चरित्रों में थोड़ा-बहुत परिवर्तन देखने को मिलता है। इंडोनेशिया-जावा और मलेशिया में पहले हिंदुओं के रहने के अवशेष मंदिर आदि के रूप में आज भी उपलब्ध हैं, परंतु फिलीपींस में हिंदुओं के कत्लेआम के बाद वहाँ भी सभी ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया। वहाँ भी रामकथा प्रचलित थी, जिसे अब तोड़-मरोड़कर एक काल्पनिक कथा का रूप दे दिया गया है। इंडोनेशिया के जावा में प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’ है। काकावीन की रचना कावी भाषा में हुई है, यह जावा की प्राचीन शास्त्रीय भाषा है। जबकि डॉ. जॉन आर. फ्रुकैसिस्को ने फिलीपींस की मारनव भाषा में संकलित एक विकृत रामकथा की खोज की है, जिसका नाम ‘मसलादिया लाबन’ है। मलेशिया का इस्लामीकरण 13वीं शताब्दी में हुआ। यहाँ की मलय रामायण की प्राचीनतम पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में 1633 ई. में जमा की गई थी। यहाँ की हिकायत सेरीराम विचित्रताओं का अजायबघर है। इसका आरंभ रावण की जन्मकथा से होता है। मलेशिया मूलतः रावण के नाना का आधिपत्य में था।

चीन में भी है रामायण और दशरथ कथा

चीनी रामायण से प्राप्त एक सांकेतिक चित्र

चीनी रामायण को अनामकं जातकम् और दशरथ कथानम् के नाम से जाना जाता है। इसमें रामायण के पात्रों के नाम अलग हैं और वहाँ रामायण के मायने भी अलग हैं। अनामकं जातकम् और दशरथ कथानम् के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट थे और उनके पहले पुत्र का नाम लोमो था। चीनी कथा के अनुसार 7,323 ईसा पूर्व में राम का जन्म हुआ था। जापान के एक लोकप्रिय कथा संग्रह होबुत्सुशु में भी संक्षिप्त राम कथा संकलित है, जो चीनी रामायण पर आधारित है, किंतु फिर भी कुछ अंतर भी हैं। तुर्किस्तान के पूर्वी भाग को खोतान कहा जाता है, जिसकी भाषा भी खोतानी है। एचडब्ल्यू बेली ने पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से खोतानी रामायण को खोजकर दुनिया के सामने रखा है।

तिब्बत में रामकथा को किंरस-पुंस-पा कहा जाता है। तिब्बती रामायण की 6 प्रतियाँ तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई हैं। मंगोलिया में रामकथा की लोगों को विस्तृत जानकारी है। वहाँ के लामाओं के निवास स्थल से वानर-पूजा की पुस्तकें और प्रतिमाएँ भी मिली हैं। इसके अलावा रामकथा से जुड़े काष्ठ चित्र और पांडुलिपियाँ भी मिली हैं। दम्दिन सुरेन ने मंगोलियाई भाषा में लिखित चार रामकथाओं की खोज की है। इनमें राजा जीवक की कथा सविशेष उल्लेखनीय है जिसकी पांडुलिपि लेलिनगार्द में सुरक्षित है।

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