#LeftKillingJNU : हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान से नफ़रत ही वामपंथ की परिभाषा क्यों बन गया ?

* तथाकथित बौद्धिकों का पशु बाड़ा बन कर रह गया ऐतिहासिक जेएनयू

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 19 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। वर्ष 1798 से पहले तक वामपंथ शब्द की उत्पत्ति नहीं हुई थी। इसकी उत्पत्ति हुई 1798-99 के दौरान हुई फ्रांसिसी क्रांति के दौरान। फ्रांस में तत्कालीन सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए एक क्रांति हुई थी। फ्रांस की संसद एस्टेट जनरल (Estates General) तत्कालीन सम्राट को हटा कर गणतंत्र लाना चाहने वाले और धर्मनिरपेक्षता चाहने वाले सांसद अक्सर बाईं तरफ़ (Left Side) बैठते थे। आधुनिक काल में समाजवाद (Socialism) और साम्यवाद (Communism) से सम्बंधित विचारधाराओं को बाईं राजनीति (left Politics) में डाला जाता है। फ्रांसीसी क्रांतिकारी चूंकि संसद में बाईं ओर बैठते थे और गणतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर थे। इसीलिए उन्हें वामपंथी कहा जाने लगा और यही वामपंथ एक विचारधारा बन गया, परंतु कालांतर में यह वामपंथी विचारधारा समाज में समानता के नाम पर ‘असमान’ लोगों के लिए पीड़ादायक बनती गई और भारत में तो इस विचारधारा ने हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान विरोध को ही अपना मूलमंत्र बना लिया।

यहाँ हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान से तात्पर्य यही है कि ये तीनों शब्द भारत की मूल भावना के सुदृढ़ स्तंभ हैं, परंतु वामपंथ ने बौद्धिकता और बुद्धिजीविता का चोला पहन कर हिन्दी (केवल भाषा नहीं, अपितु हिन्दुस्तानी जनता), हिन्दू (केवल धर्म नहीं, अपितु भारतीय जीवनशैली) और हिन्दुस्तान (भारतीय विविधतापूर्ण सनातन संस्कृति) में व्याप्त कुरीतियों को आधार बना कर भारत के इन तीनों स्तंभों को खोखला करने का अभियान छेड़ दिया। आज हम वामपंथ के बौद्धिक उजले चेहरे के पीछे छिपे काले इतिहास को इसलिए याद करने पर विवश हुए हैं, क्योंकि इस विचारधारा के नाम पर हमारी युवा पीढ़ी को निरंतर गुमराह किया जाता रहा है और किया जा रहा है।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (जो वामपंथी नहीं थे, परंतु वामपंथियों के निकट अवश्य थे) के नाम पर बने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के विद्यार्थियों में इन दिनों सरकार विरोधी उबाल सवार है। जब से केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) की सरकार आई है, तब से जेएनयू में विद्यार्थियों का आवेग कुछ अधिक ही ज़ोर कर रहा है। क्या यह केवल संयोग हो सकता है ? बिल्कुल नहीं, यह संयोग नहीं है, अपितु वामपंथी विचारधारा से प्रभावित विद्यार्थियों के गुट का एक दक्षिण पंथी पार्टी भाजपा के हर कार्य का विरोध करने के षड्यंत्र का एक हिस्सा है। ऐसा नहीं है कि देश में सहस्त्रों विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि नहीं होती और विद्यार्थी सड़क पर नहीं उतरते। उन्हें भी न्याय मिलता है, परंतु जेएनयू के विद्यार्थियों के विरोध में अक्सर ‘विद्रोह’ की दुर्गंध घुल जाती है और इसके पीछे कारण है वही वामपंथी विचारधारा, जिसने हमेशा हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान के लिए बुरा ही सोचा।

राष्ट्र विरोधी नारों से लेकर कश्मीर पर मातम तक

नि:संदेह जेएनयू ने देश को कई बड़े-बड़े नेता और महानुभाव दिए होंगे, परंतु पिछले कुछ समय में जेएनयू वामपंथी विचारधारा से प्रभावित बौद्धिकों का पशु बाड़ा बन गया है। जेएनयू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के नाम पर स्थापित संस्थान है, तो उसके राष्ट्रवाद पर प्रश्न नहीं उठना चाहिए, परंतु वामपंथ प्रभावित जेएनयू परिसर में 5 अगस्त, 2019 को मातम छाया हुआ था, जब पूरा देश जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने का जश्न मना रहा था। जेनएयू में सक्रिय वामपंथी विचारधारा के लोगों के समक्ष जब राष्ट्रीय एकता, हिन्दू हित की बात की जाए, तो उनके मुख से तत्क्षण निकल आता है, ‘राष्ट्रीय एकता सो व्हॉट ? हिन्दू हित सो व्हॉट ?’ कहने को वामपंथ का मूलमंत्र और मूलतंत्र वंचितों, पीड़ितों के हित पर आधारित है, परंतु वास्तविक धरातल पर वामपंथ सदा-सदा से भारत की महान सनातन संस्कृति, सनातन धर्म (जिसे आज हिन्दू धर्म कह कर संकीर्ण बना दिया गया है), हिन्दू समाज, उसकी परम्पराओं का उपहास करने और भारत को विखंडित करने को ही अपना सबसे बड़ा धर्म और कर्म मानता है। शोषितों-वंचितों के हामी होने की बौद्धिक लफ्फाज़ी करने वाले वामपंथी प्रोफेसरों और छात्र नेताओं को इस्लाम परस्ती से कोई परहेज नहीं। हिन्दुओं की वैज्ञानिक परम्पराओं से आपत्ति है, परंतु इस्लाम और मुस्लिमों की हर गतिविधि उन्हें उचित लगती है। यदि जेएनयू में राष्ट्रवाद की जड़ होती, तो भारत और जेएनयू के भव्य इतिहास को कभी भी ‘अफज़ल हम शर्मिंदा हैं-तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इन्शाअल्लाह !’ जैसे लज्जापूर्ण नारों से कलंकित होने पर विवश नहीं होना पड़ता।

पूर्वाग्रह से ग्रस्त वामपंथी तथ्यों से मुँह छिपाते हैं

देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगों और जातिय संघर्षों का सदियों पुराना इतिहास है, परंतु वामपंथी बौद्धिक महानुभाव किसी भी घटना की जड़ में जाना नहीं चाहते। उनका सीधा उद्देश्य अपने मनमाने ढंग से निष्कर्ष पर पहुँच कर निंदा-भर्त्सना करना ही होता है। समानता की नींव पर रखी गई वामपंथी विचारधारा ने भारत में कभी भी बहुसंख्यक हिन्दुओं के हितों की बात नहीं की। यहाँ तक कि भारत की महान सांस्कृतिक विरासत वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ चलने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के विरोध को ही वामपंथी विचारधारा की नींव बना डाला और अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। पूरे विश्वास के साथ राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वालों का बचाव करने वाले और राष्ट्रीय अखंडता चाहने वाले देश के दुश्मन से कम नहीं हैं। जेएनयू विद्यार्थियों को ऐसे लोगों के हाथों का खिलौना नहीं बनना चाहिए, परंतु जेएनयू में यही सब हो रहा है। इसीलिए जेएनयू जॉर्ज ऑरवेल के ‘एनिमल फार्म’ सा दृश्य उपस्थित करता है। कम्युनिस्ट रूस में समानता, स्वतंत्रता, न्याय, शांति, युद्ध, आदि धारणाओं की वही दुर्गति हुई थी, जैसी यहाँ आज़ादी, सेक्यूलर, कम्युनल, इन्क्लूसिव, दलित, हिन्दुत्व, आदि की हो रही है। इन धारणाओं की जेएनयू में विचित्र समझ उसे वैसा ही ‘पशु-बाड़ा’ दिखाती है, जहां दुनिया का वास्तविक बोध नहीं है। इसीलिए वे सहजता से, यहाँ तक कि गर्व से मुहम्मद अफज़ल, याकूब मेमन या अजमल कसाब का उल्लेख करते हैं। वहाँ के अनेक प्रोफेसर, छात्र मानो विदेशियों की तरह आम भारतीयों को मूढ़ (बेवकूफ) समझते हैं, अन्यथा अदालत से दंडित आतंकियों को ‘उत्पीड़ित’ बताने का दुस्साहस नहीं किया जाता। जेएनयू की प्रभावी बौद्धिकता देशवासियों से ही नहीं, सामान्य बुद्धि से भी दूर रही है। सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली का ऐसा विचित्र अर्थ कर लिया गया है. जो मानक शास्त्र के विपरीत और अपने देश-समाज के प्रति लापरवाह है।

शिक्षा के नाम पर छात्रों का ब्रेनवॉश

जेएनयू में इतिहास, साहित्य, राजनीति, आदि में शिक्षा नहीं, इंडॉक्ट्रीनेशन होता रहा है यानी किसी मतवाद का आग्रही बनाने का कार्य। यह भोले छात्रों के साथ विश्वासघात है। जेएनयू में यह सब दशकों से हो रहा है। इस के बिना स्थाई वामपंथी दबदबा बना रहना असंभव होता। यह सब जेएनयू में इतने खुले रूप में होता रहा है कि बहुतों को विश्वास नहीं होगा कि ऐसा घात भी संभव है, परंतु इस बिन्दु पर तमाम रेडिकलों के प्रिय नोआम चोमस्की के विचार देखें – ‘मतवादीकरण की प्रक्रिया और गतिविधि को ठीक से समझना सब से ज़रूरी कर्तव्य है। तानाशाही शासन वाले देशों में इसे देख पाना बड़ा आसान है, किन्तु ‘स्वतंत्रता में मगज़धुलाई (ब्रेन वॉशिंग)’ की व्यवस्था देख पाना बड़ा कठिन है, जिसमें हम मजबूर किए जाते हैं और जिसके कई बार हम अनजाने उपादान बन जाते हैं।’यह बात चोमस्की ने लोकतांत्रिक सरकारों के लिए कही थी, किंतु यह जेएनयू जैसे स्वायत्त अकादमिक टापू पर भी सही उतरती है, जहाँ विविध कम्युनिस्टों, माओवादियों, जिहादियों ने अपने अड्डे बना लिए हैं। इन्होंने अपने मतवाद को ‘शिक्षा’ का जामा पहनाने में स्वतंत्रता का वही दुरूपयोग किया, जो चोम्सकी का आशय है।

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