गोपाष्टमी : ‘कनिष्ठा’ हो जाइए, आप भी उठा सकेंगे ‘गोवर्धन’ पर्वत…

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 4 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। आज कार्तिक शुक्ल अष्टमी (गुजराती कैलेंडर के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी) है। यही वह दिन था, जब द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने पूरे विश्व को यह संदेश दिया था कि अहंकार केवल और केवल पतन का कारण होता है। यह अहंकार केवल रावण या दुर्योधन को ही नहीं था। हम भी अहंकारों से पूर्णत: परिपूर्ण हैं। भगवान कृष्ण ने कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा कर देवताओं के राजा इंद्र के अहंकार को चूर-चूर किया था, परंतु आप कल्पना कीजिए कि कोई भी देहधारी व्यक्ति (फिर वह स्वयं ईश्वर ही क्यों न हों) कनिष्ठा (हाथ की सबसे छोटी उंगली) पर गोवर्धन पर्वत तो क्या, राई भी उठा सकता है ? आप श्रद्धा और आस्था के साथ भले ही यह कह देंगे कि चूँकि कृष्ण ईश्वर का अवतार थे, इसीलिए उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था, परंतु कभी आपने इस दृष्टिकोण से सोचा है कि कृष्ण ने एक साधारण देह धारण किया था, इसके बावज़ूद उन्होंने कनिष्ठा उंगली पर पर्वत कैसे उठा लिया ? इसका आध्यात्मिक उत्तर और सार यही है कि कृष्ण अहंकार से रहित थे। कृष्ण चाहते, तो हनुमान की तरह पूरी हथेली पर पहाड़ उठा सकते थे, परंतु उन्होंने कनिष्ठा उंगली का चयन करके पूरे विश्व को अहंकार से रहित कनिष्ठा बनने का संदेश दिया। यदि आप भी देहाभिमान, मैं, मेरा, मुझ, मैंने जैसे कर्ता रूपी अहंकारों को त्याग दें और निष्काम कर्म करें, तो आप पूरे के पूरे कनिष्ठा बन जाएँगे, जिसमें गोवर्धन क्या, दुनिया का बड़े से बड़ा बोझ उठाने का सामर्थ्य भर जाएगा।

आपका निरंकारी होने का दावा क्यों है भ्रम ?

अक्सर लोग स्वयं को अहंकार से मुक्त यानी निरंकारी (नि:+अहंकारी) समझते-बताते हैं। जो अहंकारी हैं, वे तो भ्रम में हैं ही, परंतु उससे भी बड़ा भ्रम स्वयं को निरंकारी मानने-समझने-बताने वालों को है, क्योंकि निरंकार एक अवस्था का नाम है, जो कथन में नहीं, वचन और आचरण में दिखाई देती है। यदि आपका आचरण स्वार्थवृत्ति, अपना-पराया, भेद, भ्रांति और भय से युक्त है, तो आप लाख दावा करें कि आपको न धन-दौलत का घमंड है और न ही पद-प्रतिष्ठा का, आपका दावा आपको एक और अहंकार में डालता है। यह अहंकार है निरंकारी होने का अहंकार। पुराण-इतिहास के पन्नों से अपूर्ण सार लेकर हम अक्सर अहंकार को बहुत सीमित कर देते हैं और स्वयं को अहंकार से मुक्त मानने-बताने-समझने लगते हैं, परंतु वास्तविकता यह है कि आप अपने शरीर को ‘मैं’ मानते हैं, यही आपका सबसे बड़ा अहंकार है। ज्ञानी ऋषि-मुनियों और महापुरुषों के वाणी, व्यवहार और आचरण को देखने से पता चलता है कि अहंकार शून्यता क्या होती है ? जब तक पंचमहाभूतों से बना यह शरीर आपकी ‘पहचान’ है, तब तक आप क्या, कोई भी व्यक्ति अहंकार से मुक्त नहीं है। देहभाव ही सबसे बड़ा अहंकार है। यदि यह अहंकार दूर हो जाए, तो सभी अहंकारों की जड़ ही समाप्त हो जाएगी। अहंकार मुक्ति आपको इतना हल्का-फुल्का बना देगी कि आपके आगे गोवर्धन पर्वत भी पुष्प की पंखुड़ी जितना हल्का हो जाएगा।

जिसने देहाभिमानी ‘मैं’ त्यागा, उसी ने ‘स्वयं’ को जाना

जब कोई शिशु अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है, तब वह पूर्णत: निर्लेप होता है। उस पर कोई आवरण नहीं होता। वह शिशु पूर्णत: प्रकृति के आधीन होता है। वह शिशु पूर्णत: निर्दोष होता है। वह देह को ‘मैं’ मानने की स्थिति में नहीं होता। नवजात शिशु केवल आत्मारूपी ‘मैं’ अर्थात् स्व-रूप में स्थित होता है। यह स्व-रूप स्थिति होने के कारण है नवजात शिशु को ईश्वर का रूप माना जाता है, परंतु जैसे-जैसे वह जगत के सम्पर्क में आता है, वैसे-वैसे संसर्ग दोष का भागी बनता जाता है। सबसे पहले तो उस अनामी ईश्वर स्वरूप शिशु का नामकरण किया जाता है और यहीं से आरंभ होती है अहंकार की यात्रा। बड़ा होकर व्यक्ति अपने नामधारी देह को ही ‘मैं’ मान बैठता है। वह कभी इस देहाभिमानी ‘मैं’ से परे देख ही नहीं पाता, क्योंकि ईश्वर के माया स्वरूप जगत में उसे इतने आकर्षण दिखते हैं, जिसके चलते वह ‘मैं’ रूपी देह और उससे जुड़े संबंधों, भौतिक सुख-संसाधनों, अर्थ-काम आदि वासनाओं और इच्छाओं से लबालब हो जाता है। इस तरह सबसे बड़े देहरूपी अहंकार में जाति-धर्म-संबंधी, पद-प्रतिष्ठा-मान-सम्मान जैसी उपाधियों के नए-नए अहंकार जुड़ते जाते हैं और व्यक्ति आत्मा रूपी ‘मैं’ अर्थात् ‘स्वयं’ से निरंतर दूर होता जाता है। अहंकारों से भरे ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली, सर्वसमर्थ और हर असंभव को संभव बनाने का दम भरता है, परंतु वह यह भूल जाता है कि जिस देह के बल पर वह कुछ भी कर लेने की चाहत रखता है, उस देह को संचालित कौन कर रहा है ? उसकी तरफ कभी उसका ध्यान ही नहीं जाता। यदि इतना ही विवेक जागृत हो जाए, तो कोई भी मनुष्य तत्क्षण यह समझ लेगा कि वास्तव में वह ‘वह’ नहीं है, जो दिखाई देता है, वह ‘वह’ है, जो दिखाई नहीं देता। यह विवेक जागते ही मनुष्य वास्तविक ‘मैं’ यानी ‘स्वयं’ को परखने के लिए पुरुषार्थ आरंभ करता है। भारत में ऐसे कई महापुरुष हुए, जिनके मन में जीवन के किसी न किसी मोड़ पर जाकर यह प्रश्न उठा, ‘मैं कौन हूँ ?’ नरसिंह मेहता, मीराबाई, कबीर जैसे महापुरुषों का विवेक जागा, तो उन्होंने प्रकट सद्गुरु की शरण ली और अपने वास्तविक स्वरूप को जाना। इतना ही नहीं, भगवान विष्णु ने भी जब स्वयं देहावतार लिया, तो वे सबसे पहले गुरु की शरण में गए। भगवान राम ने गुरु वशिष्ठ और भगवान कृष्ण ने गुरु सांदिपनी से आत्म-विद्या जानी। आत्म-ज्ञानी होने के कारण ही राम और कृष्ण ने अपनी अहंकार से मुक्त होकर अपनी लीलाएँ कीं और पूरे विश्व को अहंकार से मुक्त होने का संदेश दिया।

कुछ नहीं ‘बन’ कर तो देखिए !

आज दुनिया में हर व्यक्ति कुछ ‘बनना’ चाहता है। यह चाहत ही अहंकार का स्रोत है। कृष्ण परमात्मा ने अपने पूरे जीवनकाल में केवल और केवल त्याग के दृष्टांत प्रस्तुत किए। वे कुछ ‘बने’ नहीं। हर कार्य, हर लीला में उन्होंने स्वयं को ‘मिटाया’। कुछ बनने की चाह इंसान को अच्छे-बुरे कर्मों के लिए प्रेरित करती है। इसका यह अर्थ नहीं है कि आप कुछ करें ही नहीं, परंतु संतों की प्रकट वाणी का स्पष्ट संदेश है कि हर प्रारब्ध कर्म कीजिए, हर कर्तव्य कर्म कीजिए, किसी कर्म से भागिए नहीं, परंतु यह कर्म भक्ति बन जाना चाहिए और यह कर्म भक्ति तभी बन सकता है, जब उसमें निष्काम भाव हो। स्वार्थ, इच्छा और कामना से परिपूर्ण कर्म कभी भी भक्ति नहीं बन सकता, भले ही आप तीर्थस्थानों, धर्मस्थानों, मंदिरों के फेरे लगाएँ। दूसरी तरफ कामना रहित हर कर्म भक्ति होता है, भले ही उन कार्यों में न तीर्थयात्रा हो, न मंदिरों के फेरे। निष्काम भाव से किया जाने वाला कर्म आपको कुछ ‘बनाता’ नहीं है अर्थात् आपको कोई उपाधि नहीं देता, अपितु देहरूपी ‘आप’ को मिटा कर आत्मारूपी ‘आप’ से साक्षात्कार कराता है। आवश्यकता है कनिष्ठा बन कर किसी संत पुरुष-प्रज्ज्वलित दीप के प्रति शरणागति स्वीकार करने की। बस, जीवन में इतना कर लीजिए, आपको कुछ ‘बने’ बिना ही सब कुछ क्या, वह मिल जाएगा, जिसके लिए ईश्वर ने आपको मानव योनि में जन्म दिया है।

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