सनातन संक्रांति : ताड़ तुल्य ‘तत्व’ को हमने तिल तुल्य ‘तुच्छ’ बना दिया..!

* आधुनिक शिक्षा पद्धति में रसायन शास्त्र का Element बन कर रह गया ‘तत्व’

* अमाप ‘तत्व’ का स्वामी मनुष्य केवल 5 फीट की देह तक सीमित होकर रह गया

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 31 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। तत्व या तत्व शब्द आते ही हमारे मनो-मस्तिष्क में रसायन विज्ञान घूमने लगता है या फिर जीवन व्यवहार में उपयोग किए जाने वाले अच्छे-बुरे लोगों (तत्वों) के चेहरे उभर आते हैं। इतना ही नहीं, आधुनिक अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी बोलने वाली युवा पीढ़ी तो अधिकांशत: एलिमेंट शब्द का ही उपयोग करती है, जो कई बार भाव शून्य लगता है, परंतु क्या आप जानते हैं कि तत्व अपने आपमें एक शब्द नहीं, अपितु सार, यथार्थ, सत्य और मूल है ? तत्व शब्द का उपयोग एलिमेंट, एसेंस आदि शब्दों के साथ करने वाली युवा पीढ़ी यदि थोड़ा पीछे मुड़ कर देखे, तो उसे पता चलेगा कि ताड़ तुल्य तत्व को हमने तिल तुल्य तुच्छ बना दिया है।

वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS के ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ के आज भाग 7 में हम आपके समक्ष दो अक्षरों से बने तत्व शब्द का विशाल-विराट सारगर्भ से परिचित कराएँगे। सबसे पहले तो यह समझिए कि तत्व शब्द की रचना कैसे हुई है ? यह शब्द त+त्व अक्षरों से मिल कर बना है। इसमें ‘त’ का अर्थ है ‘वह’ और ‘त्व’ का अर्थ है ‘तू’। इस तरह तत्व का अर्थ हुआ ‘वह तू’। भारत के प्राचीन-पुरातन चार वेदों के चार महावाक्यों में एक महावाक्य ‘तत्वमसि’ का भी यही उद्घोष है। ‘तत्वमसि’ महावाक्य सामवेद का है, जो छान्दोग्य उपनिषद 6/7/8 से लिया गया है। ‘तत्वमसि’ का अक्षरश: अर्थ समझें, तो त यानी वह, त्व यानी तू और असि यानी है अर्थात् ‘वह (ब्रह्म) तू है।’ सामवेद के इस महावाक्य में भी तत्व शब्द की विशालता का दर्शन कराता है।

क्या और कौन है वह ‘तत्व’ ?

गूगल पर सर्च करते ही परिणामों में तत्व शब्द की ढेरों व्याख्याएँ आँखों के सामने आ जाती हैं। वे सारी व्याख्याएँ यही कहती हैं कि इस समग्र सृष्टि का आधार तत्व (वह तू) अर्थात् आप और हम ही हैं। कोई आपसे आकर पूछे कि ईश्वर है या नहीं ? आप यदि ईश्वर में आस्था रखते होंगे, तो उत्तर देंगे ‘हाँ, ईश्वर है’ और यदि आपकी ईश्वर में आस्था नहीं होगी, तो आपका उत्तर होगा, ‘नहीं, ईश्वर नहीं है’, परंतु यह तो आस्था आधारित उत्तर हुए। वास्तविकता प्रश्न तो यह है कि ईश्वर है, तो कहाँ और ईश्वर नहीं है, तो कहाँ नहीं है ? अब इस प्रश्न में शामिल कॉमन शब्दों ईश्वर, कहाँ, नहीं और है में से केवल ‘है’ पर विचार कीजिए। इस प्रश्न में दो वाक्य हैं, परंतु दोनों ही वाक्यों का अंत ‘है’ से होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह ‘है’ ही ईश्वर का प्रमाण है। जो आस्थावादी कहता है कि ईश्वर है, वह भी इस ‘है’ अर्थात् उसके जीवित (अस्तित्व में) होने के कारण ही कहता है और जो अनास्थावादी कहता है कि ईश्वर नहीं है, तो वह भी इस ‘है’ अर्थात् उसके जीवित (अस्तित्व में) होने के कारण ही कह पाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि ‘ईश्वर है या नहीं है’ का तर्क करने वाला हर व्यक्ति ‘है’ रूपी अस्तित्व के कारण ही इस तरह के तर्क कर सकता है। व्यक्ति को ईश्वर के होने या न होने की उलझन में पड़ने की बजाए उस ‘है’ को परखने का पुरुषार्थ करना होगा, जो ‘है’ वह स्वयं है। वही एक तत्व प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान है, जिसकी उपस्थिति से हर व्यक्ति जीवित है। उसी को तत्व कहते हैं।

भौतिकता की अंधी दौड़ में 5 फीट का हो गया ‘तत्व’ ?

आधुनिक विज्ञान, आधुनिक युग और विशेषकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मनुष्य को दीर्घायु बनाने के लिए कई उपाय खोज निकाले हैं। सुख-सुविधा के अनेक साधन उपलब्ध कराए हैं। हर व्यक्ति वस्तुओं और पदार्थों में सुख की तलाश कर रहा है। हर व्यक्ति केवल पाँच तत्वों से बने शरीर के सुख के लिए दिन-रात परिश्रम करता है। भौतिकता की अंधी दौड़ में व्यक्ति शरीर को ही सब कुछ मान बैठा है। हर व्यक्ति अपने औसत 5 फीट के शरीर को ही आजीवन ‘मैं’ समझता है। सुख-सुविधा-समृद्धि पाने की होड़ में आज का हर व्यक्ति जान कर भी अनजान बना हुआ है कि जिस शरीर व उसकी सुख-सुविधा के लिए वह इतना पुरुषार्थ कर रहा है, अंतत: वह एक दिन नष्ट हो जाएगा। तथाकथित शिक्षित और बुद्धिशाली युग के लोग कभी इस बात की ओर ध्यान ही नहीं देते कि जिस देह के लिए वे इतना कुछ कर रहे हैं, उस देह का चालक कौन है ? इस प्रश्न का उत्तर हमारे वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों, श्रीमद् भगवद् गीता सहित अनेक धर्म ग्रंथों में लिखा व प्रमाणित है, ‘पाँच तत्वों पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि और आकाश से बना शरीर केवल पूर्व जन्म की अपूर्ण वासनाओं के कारण जन्मा है, परंतु वास्तव में कोई भी व्यक्ति शरीर नहीं है। हर व्यक्ति उस मूल परम तत्व के कारण संचालित है।’ इस मूल तत्व को कोई ईश्वर कहता है, कोई तत्व कहता है, कोई परम पद कहता है, कोई इस तत्व को जान लेने के बाद मुक्ति पद को प्राप्त करता है। यह तत्व उस अमाप धागे की तरह है, जिसमें असंख्य मोती पिरोए जाते रहे हैं और जाते रहेंगे। हमारा शरीर भी उस धागे में पिरोया हुआ एक मोती ही है। यह मोती एक दिन नष्ट हो जाएगा, परंतु जिस दिन हमें यह पता चल जाएगा कि हम तो उस तत्व रूपी धागे का अंश हैं, उस दिन हमारा इस नश्वर देह से संबंध टूट जाएगा और हम देह की मृत्यु के बावज़ूद अमरत्व को प्राप्त हो जाएँगे। यह उदाहरण हमें बोध देता है कि हम वह नहीं हैं, जो देह के रूप में दिखाई देते हैं, अपितु हम वह हैं, जिसका कोई शरीर नहीं है। हम अधिष्ठान हैं और शरीर इस अधिष्ठान पर आरोप है। जिस प्रकार किसी घाट पर भाँति-भाँति के और अलग-अलग आकार-प्रकार के सोने के आभूषण तैयार होते है, परंतु घाट में कोई परिवर्तन नहीं आता। उसी प्रकार हम भी वही घाट रूपी तत्व के शरीर रूपी अंश हैं। हमारा मूल तत्व है। हम तत्व हैं, न कि शरीर।

कैसे पहचानें स्वयं रूपी तत्व को ?

भारत में अनेक महापुरुषों ने उस परम तत्व को पहचाना है और स्वयं को देह से परे जाना है। जब हमें ईश्वर दर्शन की इच्छा होती है, तो हम मंदिरों और धर्म स्थानों की दौड़ लगाते हैं, परंतु यदि आपसे कहा जाए कि आपको आपसे मिलने जाना है, तो आपको किस प्लेन, ट्रेन या बस में बैठने की आवश्यकता होगी ? स्वयं रूपी तत्व से साक्षात्कार के लिए आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। यह तत्व घट-घट में विद्यमान है, तो आपका अंतर भी रिक्त नहीं हो सकता। आपके भीतर और बाहर हर जगह यह एकमात्र तत्व ही है, जिसके कारण आप सहित पूरा ब्रह्मांड सक्रिय है, परंतु व्यक्ति को यदि इस तत्व की परख करनी है, तो उसे बाहर नहीं, अपितु भीतर की यात्रा करनी होगी, क्योंकि यह तत्व भले ही विद्यमान सर्वत्र हो, परंतु उसका सबसे पहला परिचय व्यक्ति के भीतर ही होता है। इसी को स्वयं से मिलना कहते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जब यह तत्व व्यक्ति के भीतर ही है, तो दिखाई क्यों नहीं देता ? इसका उत्तर यह है कि इस तत्व से आपकी मुलाक़ात वही व्यक्ति करा सकता है, जो स्वयं मुलाक़ात कर चुका है और ऐसे व्यक्ति को ज्ञानी संत या सद्गुरु भी कहते हैं। उपनिषदों और गीता का सार है कि जिस व्यक्ति के मन में स्वयं से मिलने की अभिलाषा जागे, उसे किसी ज्ञानी सद्गुरु की शरण में चले जाना चाहिए। वह ज्ञानी पुरुष आपकी आपसे भेंट कराने के अनेक मार्गों में से आपके लिए उपयुक्त मार्ग बताएगा। ये मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं, परंतु सारे मार्गों का एकमात्र उद्देश्य होता है तत्व के निवास स्थान चित्त की शुद्धि का। यह तत्व हमारे चित्त में विद्यमान है, बस आवश्यकता है इस चित्त को सभी प्रकार के विकारों और द्वंद्वों से मुक्त कर शुद्ध करने की। चित्त शुद्ध होते ही हमें उस तत्व की अनुभूति हो जाएगी, जो वास्तव में हम हैं। उसी दिन आपको यह भी अनुभूति हो जाएगी कि आप यह 5 फीट का शरीर नहीं हो सकते, जो नष्ट हो जाएगा। आप वह हैं, जिसका न कोई आरंभ है और न ही कोई अंत है।

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