सनातन संक्रांति : महान कृष्ण भक्त प्रभुपाद, जिन्होंने लाखों लोगों को ‘WORST’ से वैष्णव बनाया…

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 14 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS का आधारभूत स्तंभ ‘सनातन संक्रांति’ आज भाग 9 में प्रवेश कर रहा है। भारत सहित समग्र विश्व को स्व-यात्रा पर ले जाने के उद्देश्य से आरंभ किया गया यह स्तंभ आशानुरूप अपने उद्देश्य की ओर निरंतर अग्रसर है और हमें विश्वास है कि हमारे सुधि पाठक प्रति गुरुवार को इस स्तंभ के प्रकाशन की आतुरतापूर्वक प्रतीक्षा करते होंगे। इस स्तंभ की 9वीं कड़ी में भी हम विज्ञान से परिपूर्ण भारतीय ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाने का ही प्रयास करने जा रहे हैं। संयोग से आज एक महान और अविस्मरणीय दिवस है, क्योंकि 42 वर्ष पूर्व आज ही के दिन महान संत और कृष्ण भक्त अभयाचरणाविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (स्वामी श्रील भक्तिवेदांत प्रभुपाद या श्रील प्रभुपाद) अपने जीवन के परम उद्देश्य व लक्ष्य ‘कृष्ण भक्ति’ को भारत सहित समग्र विश्व में पराकाष्ठा पर पहुँचाने का कार्य पूर्ण कर अंतर्ध्यान हुए थे।

‘सनातन संक्रांति’ की इस 9वीं कड़ी में आज हम इन्हीं महान कृष्ण भक्त श्रील प्रभुपाद का स्मरण करेंगे, जिन्होंने अपनी भक्ति से पूरी दुनिया के समक्ष यह सिद्ध कर दिखाया कि शुद्ध भक्ति करने वाले शुद्ध भक्त के आगे कृष्ण परमात्मा भी विवश हो जाते हैं। वेदांत मार्ग में दिखाए गए ज्ञान मार्ग को भक्ति के माध्यम से सरल और सुगम करने का महान यज्ञ करने वाले श्रील प्रभुपाद ने अपना पूरा जीवन कृष्ण भक्ति को समर्पित किया और अनेक महान ग्रंथों की रचना कर अपनी दैहिक अनुपस्थिति में भी आज ज्ञान के प्रकाश के रूप में कृष्ण भक्त के रूप में सभी कृष्ण भक्तों के समक्ष साक्षात् होने की अनुभूति करा रहे हैं।

प्रत्येक मानव का जन्म महान उद्देश्य के लिए

भारतीय पुराण सिद्ध मान्यता के अनुसार सृष्टि में 84 लाख योनियाँ हैं, परंतु इनमें से एकमात्र मानव योनि ही ऐसी है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। इसीलिए हर व्यक्ति को अपने मानव जन्म के लिए ईश्वर के प्रति न केवल कृतज्ञ होना चाहिए, अपितु इस बात का विवेक भी होना चाहिए कि उसे यह चामत्कारिक देह ईश्वरीय उपहार के रूप में मिला है। कहते हैं कि हर व्यक्ति जन्म से महान नहीं होता, परंतु इतना निश्चित है कि ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को एक महान कार्य के लिए भेजा होता है। जो लोग इस ईश्वरीय संकेत को समझ जाते हैं, वे वास्तव में महान बन जाते हैं और जो नहीं समझ पाते, वे एक दिवस मृत्यु को प्राप्त होकर लख चौरासी के चक्रव्यूह की ओर चले जाते हैं। श्रील प्रभुपाद की गणना विवेकपूर्ण महापुरुषों में की जा सकती है, क्योंकि उन्हें अपने साधारण जन्म को असाधारण अवतार में परिवर्तित किया। 1 सितंबर, 1896 को ब्रिटिश भारत में बंगाल (अब पश्चिम बंगाल) के कोलकाता में गौड़ीय वैष्णव गौड़ मोहन डे के घर माता रजनी डे ने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम अभयचरण रखा गया। मोहन डे कपड़ा व्यापारी थे। इसके बावजूद यह पूर्व जन्म के संस्कारों का ही प्रताप था कि पिता ने पुत्र अभय चरण का पालन-पोषण कृष्ण भक्त के रूप में किया। यही संयोग तो संकेत देते हैं कि गौड़ मोहन डे व रजनी डे ने किसी साधारण बालक को जन्म नहीं दिया था।

गूढ़ वेदांत को भक्ति के माध्यम से सरल बनाया

कृष्ण भक्ति के रंग में डूबे अभय चरण ने 1922 में जब अपने गुरु महाराज श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती (ठाकुर) गोस्वामी से भेंट की, तब इनके जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आया। 11 वर्षों के बाद उन्होंने 1933 में प्रयाग (प्रयागराज-उत्तर प्रदेश) में गुरु के समक्ष विधिवत् दीक्षा ग्रहण की और उनके शिष्य बन गए। यहीं से उन्होंने भगवान श्री कृष्ण और उनके द्वारा कुरुक्षेत्र में दिए गए गीता के महान उपदेशों का गूढ़ अध्ययन आरंभ किया। दीक्षा लेने के बाद अभय चरण कृष्ण भक्ति में आकंठ डूब गए और उन्होंने गुरु के मार्गदर्शन में श्रीमद् भगवद् गीता पर टिप्पणी लिकी। साधारण अभय चरण डे अब स्वामी श्रील भक्तिवेदांत प्रभुपाद बन चुके थे। यह प्रभुपाद का आधुनिक मानव जाति के लिए सबसे बड़ा वरदान है कि उन्होंने वेदांत के गूढ़ आत्म-ज्ञान को भक्ति के माध्यम से सरलता से हृदयंगम करने का एक परम्परागत मार्ग पुन:स्थापित किया, जो भुलाया जा चुका था। इसी महान कार्य के लिए वर्ष 1947 में गौड़ीय वैष्णव समाज ने श्रील प्रभुपाद को भक्तिवेदांत की उपाधि दी। वास्तव में वेदांत अर्थात् वेदों का अंतिम भाग, जहाँ आत्म-ज्ञान उपलब्ध होता है, परंतु श्रील प्रभुपाद ने इस गूढ़ मार्ग को भक्ति के माध्यम से सरल बनाने की राह दिखाई।

जब ‘इस्कॉन’ के माध्यम से गोरों को रंगा श्याम के रंग में

गुरु श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने प्रभुपाद को भारतीय सनातन धर्म और ज्ञान का पूरे विश्व में प्रचार-प्रसार करने का चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपा, जिसके लिए आवश्यकता थी भारतीय भाषाओं में लिखित धर्मग्रंथों का अंग्रेजी अनुवाद। श्रील प्रभुपाद ने गुरु की आज्ञा से सबसे पहले श्रीमद् भगवद् गीता पर एक टीका लिखी, जो मानव को गीता के गूढ़ ज्ञान को सरल भाषा में समझा सके। 1944 में उन्होंने बिना किसी की सहायता से एक अंग्रेजी पात्रिक पत्रिका आरंभ किया। आर्थिक अभावों सहित कई बाधाओं के बीच भी प्रभुपाद ने यह पत्रिका बंद नहीं होने दी और आज भी ‘बैक टू गॉडहैड’ नाम से यह पत्रिका पश्चिमी देशों में चल रही है, जिसका तीस से अधिक भाषाओं में प्रकाशन होता है। गुरु का आदेश था कि भारतीय सनातन धर्म का पश्चिमी देशों में प्रचार-प्रसार किया जाए। इसीलिए 1959 में श्रील प्रभुपाद ने संन्यास ग्रहण करने के बाद वृंदावन-मथुरा में श्रीमद् भागवत् पुराण का अनेक खंडों में अंग्रेजी अनुवाद किया, जिसके चलते पश्चिमी देशों को कृष्ण की आत्म-ज्ञान की बात उनकी भाषा में समझाई जा सके। 1965 में प्रभुपाद अपने गुरु के अनुष्ठान को सम्पन्न करने के लिए अमेरिका रवाना हुए। जब वे मालवाहक जलयान द्वारा पहली बार न्यूयॉर्क पहुँचे, तो उनके पास एक पैसा भी नहीं था। अत्यंत कठिनाई में लगभग एक वर्ष व्यतीत करने के बाद जुलाई-1966 में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (International Society for Krishna Consciousness) अर्थात् इस्कॉन-ISKCON की स्थापना की और इसके माध्यम से गोरों को श्याम (कृष्ण भक्ति) रंग में रंग दिया। सन 1968 में प्रयोग के तौर पर उन्होंने अमेरिका में वर्जीनिया की पहाड़ियों में नव-वृन्दावन की स्थापना की। दो हज़ार एकड़ के इस समृद्ध कृषि क्षेत्र से प्रभावित होकर उनके शिष्यों ने अन्य जगहों पर भी ऐसे समुदायों की स्थापना की। 1972 में टेक्सस के डलास में गुरुकुल की स्थापना कर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की वैदिक प्रणाली का सूत्रपात किया। 14 नवंबर, 1977 ईं को ‘कृष्ण-बलराम मंदिर’, वृन्दावन धाम में अप्रकट होने के पूर्व तक श्रील प्रभुपाल ने अपने कुशल मार्ग निर्देशन के कारण ‘इस्कॉन’ को विश्व भर में 100 से अधिक मंदिरों के रूप में विद्यालयों, मंदिरों, संस्थानों और कृषि समुदायों का वृहद संगठन बना दिया। उन्होंने इस्कॉन की स्थापना कर संसार को कृष्ण भक्ति का अनुपम उपचार प्रदान किया। आज विश्व भर में इस्कॉन के 800 से अधिक केंद्र, मंदिर, गुरुकुल एवं अस्पताल आदि प्रभुपाद की दूरदर्शिता और अद्वितीय प्रबंधन क्षमता के जीते जागते साक्ष्य हैं।

‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के सूत्रपाती प्रभुपाद

श्रील प्रभुपाद के ग्रंथों की प्रामाणिकता, गहराई और उनमें झलकता उनका अध्ययन अत्यंत मान्य, प्रामाणिक व वैज्ञानिक है। कृष्ण को सृष्टि के सर्वेसर्वा के रूप में स्थापित करना और अनुयायियों के मुख पर ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ का उच्चारण सदैव रखने की प्रथा श्रील प्रभुपाद ने ही स्थापित की, जो भारत सहित समग्र पश्चिमी देशों व विश्व में ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ मंत्र के रूप में आज भी गूंजती है । 1950 में श्रील प्रभुपाद ने गृहस्थ जीवन से अवकाश लिया और फिर वानप्रस्थ जीवन व्यतीत करने लगे, जिससे वे अपने अध्ययन और लेखन के लिए अधिक समय दे सके। वे वृन्दावन धाम आकर बड़ी ही सात्विक परिस्थितियों में मध्यकालीन ऐतिहासिक श्रीराधा दामोदर मंदिर में रहे। वहाँ वे अनेक वर्षों तक गंभीर अध्ययन एवं लेखन में संलग्न रहे। 1959 में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था। श्रीराधा दामोदर मन्दिर में श्रील प्रभुपाद ने अपने जीवन के सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण ग्रंथ का आरंभ किया। यह ग्रंथ था- ‘अठारह हज़ार श्लोक संख्या के श्रीमद्भागवत पुराण का अनेक खण्डों में अंग्रेज़ी में अनुवाद और व्याख्या’।

‘वर्स्ट का वैष्णव बन जाना ही चमत्कार’

श्रील प्रभुपाद का स्पष्ट मानना था कि ज्ञान एक शुद्ध विज्ञान है। ज्ञान से बड़ा कोई चमत्कार नहीं है, परंतु कोई व्यक्ति अपनी सिद्धियों के बल पर चमत्कार दिखा कर लोगों को आकर्षित करे, तो वह शुद्ध ज्ञानी नहीं हो सकता। ज्ञान के प्रकाश में वर्स्ट (दुराचारी में दुराचारी) व्यक्ति भी वैष्णव बन जाता है। यही ज्ञान की शक्ति है। एक बार एक शिष्य ने श्रील प्रभुपाद से इसी संदर्भ में प्रश्न किया, ‘क्या कुछ स्वामियों द्वारा सामान्य जन को कुछ चमत्कार दिखाकर आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित करना सही है ?’ इस प्रश्न के उत्तर में श्रील प्रभुपाद ने कहा, ‘मैं क्यों चमत्कार दिखाऊँ ? यह क्या व्यवसाय है ? मुझे सत्य बोलना है, बस। चमत्कार का क्या लाभ है ? जब आप स्कूल या कॉलेज जाते हो, तो क्या वहाँ चमत्कार देखते हो या ज्ञान की पुस्तकों से सीखते हो ? कृष्ण ने कभी ये नहीं कहा कि आप किसी ऐसे गुरु के पास जाओ, जो चमत्कार दिखा सके। नहीं, उन्होंने ऐसे कभी नहीं कहा । कृष्ण (गीता में) कहते हैं:-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः || भ गी 4.34 ||

अर्थात्

किसी ज्ञानी के पास जाओ, जो तत्त्व-दर्शी है, न कि किसी जादूगर या करामाती के पास। यह एक विज्ञान है, कोई जादू नहीं। तद-विज्ञानार्थम् स गुरुम एव अभिगच्छेत (मु उ 1.2.12) । यही वैदिक निषेधाज्ञा है, ताकि हम उस विज्ञान को समझ सकें, जादू या कारनामों से नहीं। चमत्कार यह है कि माँसाहारी, शराबी और स्त्री-लम्पट आज वैष्णव बन गए हैं। ये वास्तव में चमत्कार है। अगर आप अपनी आँखों से देख सकते हैं, तो यह देखिये। अगर नहीं, तो अलग बात है। इसे कहते हैं चमत्कार।’ यह केवल एक उदाहरण है। वास्तव में श्रील प्रभुपाद ने भारत सहित पश्चिमी देशों और दुनिया में भारतीय सनातन धर्म की जो क्रांति की, उसने अनेक दुराचारियों को सत्य का मार्ग दिखाया और वैष्णव अर्थात् विष्णु के वास्तविक स्वरूप (कोई मूर्ति नहीं) की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया है।

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