सैलानियों के लिए खुल गये ‘सियाचिन’ के द्वार : जानिए इसे क्यों कहते हैं ‘गुलाबों की भरमार’ ?

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 21 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। 31 अक्टूबर को देश के केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में अपना अलग अस्तित्व बनाने जा रहे लद्दाख के लेह जिले में स्थित ‘सियाचिन’ ने सैलानियों के स्वागत के लिये अपनी बाहें फैला दी हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को लद्दाख में कर्नल चेवांग रिनचेन ब्रिज का उद्घाटन किया और इसी के साथ उन्होंने सियाचिन क्षेत्र को पर्यटकों के लिये खोलने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि इस पुल के उद्घाटन से इस क्षेत्र में कनेक्टिविटी भी बेहतर होगी और साथ ही पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। राजनाथ सिंह ने स्वयं ट्विटर के माध्यम से सियाचिन को पर्यटकों के लिये खोलने की घोषणा करते हुए कहा कि सियाचिन बेस कैंप से लेकर कुमार पोस्ट तक का पूरा इलाका पर्यटन के लिये खोल दिया गया है। सियाचिन दौरे में सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत और चिनार कॉर्प्स के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल केजेस ढिल्लोन भी सिंह के साथ मौजूद थे। लद्दाख की श्योक नदी पर बने कर्नल चेवांग रिनचेन ब्रिज के बारे में उन्होंने कहा कि इस पुल को राष्ट्र को समर्पित करते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। यह केवल इस क्षेत्र में सभी मौसम में कनेक्टिविटी ही प्रदान नहीं करेगा, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों के लिहाज से भी एक रणनीतिक सम्पत्ति है।

कौन हैं कर्नल चेवांग रिनचेन ?

इस पुल का नाम कर्नल चेवांग रिनचेन के नाम पर रखा गया है। चेवांग ने पाकिस्तान के विरुद्ध 1948, 1971 और चीन के विरुद्ध 1962 में युद्ध लड़ा था। इन युद्धों में उन्होंने अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया था, जिसके लिये उन्हें 2 बार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। चेवांग ने 1948 में पाकिस्तान के विरुद्ध नुब्रा घाटी की लड़ाई लड़ी थी, 1971 में उन्होंने लद्दाख में पाकिस्तानी सेना के चालुनका और तुरतुक की सामरिक चौकियों पर कब्जा कर लिया था।

चीन से सटी सीमा के निकट बना है ब्रिज

यह पुल चीन की सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से 40 कि.मी. पहले पूर्व में बना है। यह पुल श्योक नदी पर समुद्र तल से 14,650 फीट की ऊँचाई पर बनाया गया है। इसकी लंबाई 1,400 फीट और चौड़ाई 4.5 मीटर है। सेना के एक अधिकारी के अनुसार दौलत बेग ओल्डी सड़क पर इस पुल का निर्माण किया गया है। दौलत बेग ओल्डी दुनिया का सबसे ऊँचा एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउण्ड (एयरबेज़) है। इस पुल का निर्माण सीमा सड़क संगठन (BRO) ने किया है। यह पुल 70 टन तक के वाहनों का भार उठाने में सक्षम है। यह काराकोरम पास से बिल्कुल नजदीक है। यहाँ से 8 कि.मी. की दूरी पर एलएसी है। इस पुल के बन जाने से 14 घण्टे की यात्रा सिमट कर साढ़े छह घण्टे की रह गई है। यानी 7.5 घण्टे का समय बचेगा। इस पुल के उपलब्ध हो जाने से भारतीय सैनिकों को चीन से जुड़ी सीमा पर पहुँचने में भी काफी कम समय लगेगा। जम्मू कश्मीर और लद्दाख में 1,597 कि.मी. लंबी सीमा को एलएसी कहते हैं, जो चीन और पाकिस्तान से जुड़ी है।

सियाचिन को क्यों कहते हैं ‘गुलाबों की भरमार’ ?

सियाचिन हिमानी या सियाचिन ग्लेशियर हिमालय की पूर्वी काराकोरम पर्वतमाला में भारत पाकिस्तान नियंत्रण रेखा के पास स्थित लगभग एक हिमानी (ग्लेशियर) है। यह काराकोरम की पाँच बड़ी हिमानियों में से सबसे बड़ा और ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर (ताजिकिस्तान की फेदचेंको हिमानी के बाद) विश्व का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई इसके स्रोत इंदिरा कोल पर लगभग 5,753 मीटर और अंतिम छोर पर 3,620 मीटर है। यह लगभग 70 कि.मी. लंबा है। इसके निकटवर्ती क्षेत्र पाकिस्तान के बाल्टिस्तान की बाल्टी भाषा में ‘सिया’ का अर्थ एक प्रकार का जंगली गुलाब होता है और ‘चुन’ का अर्थ भरमार या बहुतायत होता है। इसलिये ‘सियाचिन’ नाम का अर्थ ‘गुलाबों की भरमार’ है।

पुल के बहाने भारत ने पाकिस्तान के जख्मों पर रगड़ा नमक

सियाचिन हिमानी पर 1984 से भारत का नियंत्रण है। अभी भारत इसे जम्मू कश्मीर राज्य के लद्दाख खण्ड के लेह जिले के अधीन प्रशासित करता है। यह सामरिक रूप से दोनों देशों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। रविवार को ही भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में आतंकी कैंपों के विरुद्ध बड़ी कार्यवाही की है, जिससे पाकिस्तान सकते में हैं और सोमवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सियाचिन क्षेत्र में न सिर्फ पुल का उद्घाटन किया, बल्कि इस क्षेत्र को पर्यटकों के लिये भी खोलने की घोषणा की है। पाकिस्तान के नजरिये से यह उसके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। क्योंकि इस ग्लेशियर पर कब्जे को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद रहा है। 1972 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद हुए शिमला समझौते के समय सियाचिन के एनजे-9842 नामक स्थान पर युद्ध विराम की सीमा तय हुई थी। इस बिंदु के आगे के हिस्से के बारे में कुछ नहीं कहा गया था। अगले कुछ वर्षों में बाकी हिस्से में गतिविधियाँ शुरू हो गई थी। इसके बाद पाकिस्तान के कुछ मानचित्रों में यह भाग उनके हिस्से में दिखाने से चिंतित हुए भारत ने 1984 में ऑपरेशन मेघदूत के जरिये इस उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया था। पाकिस्तान आरोप लगाता रहा है कि 1989 में दोनों देशों के बीच यह सहमति हुई थी कि भारत अपनी पुरानी स्थिति पर लौट जाएगा, परंतु भारत ने ऐसा नहीं किया। उसका यह भी कहना है कि सियाचिन ग्लेशियर पर जहाँ पाकिस्तानी सेना हुआ करती थी, वहाँ भारतीय सेना ने 1984 में कब्जा कर लिया था। ऐसा करके भारतीय सेना ने 1972 के शिमला समझौते और उससे भी पहले 1949 में हुए कराची समझौते का उल्लंघन किया है। पाकिस्तान भारत से इस इलाके को खाली करने की माँग करता आ रहा है।

सियाचिन में 10,000 सैनिक, हर रोज़ 5 करोड़ का खर्च

दुनिया का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र है सियाचिन सियाचिन दुनिया का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र है। इस पर लगभग 22,000 फीट की ऊँचाई पर भारत की ओर से 10,000 सैनिक तैनात किये गये हैं। इन सैनिकों की देखभाल के लिये भारत को प्रति दिन लगभग 5 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यहाँ से भारत को लेह, लद्दाख के अलावा चीन के कुछ हिस्सों पर नज़र रखने में मदद मिलती है। सियाचिन का उत्तरी हिस्सा काराकोरम भारत के पास है, जबकि कुछ भाग पाकिस्तान के पास है और कुछ भाग चीन के पास भी है। एनजे-9842 ही भारत पाकिस्तान के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह हिस्सा किसी के हिस्से में न हो तो भी दोनों देशों को कोई नुकसान नहीं है। बल्कि एक तो यहाँ सैनिकों को कड़ाके की ठंड और ऑक्सीजन की कमी से जूझते हुए ड्यूटी करनी पड़ती है, जिसमें कई बार उनकी जान जोखिम में पड़ जाती है। दूसरी तरफ सैनिकों को यहाँ रखने के लिये देश को भी प्रति दिन 5 करोड़ रुपये से अधिक रकम खर्च करनी पड़ती है और सैनिकों को सुविधाएँ पहुँचाने व उनकी देखभाल करनी पड़ती है।

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