युवाPRESS EXCLUSIVE : गुजरात के इस ‘कोण’ में पहुँच कर विलुप्त हो जाता है ‘कौन’…

विशेष आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 8 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। सनातन सत्य की आधारशिला पर स्थापित युवाPRESS की वैचारिक क्रांति की प्रज्ज्वलित ज्योति अपने सुधि पाठकों को नित-नए क्रांतिकारी विचारों से उस ‘गूढ़ निद्रा’ से जगाने का प्रयास कर रही है, जो अविद्या के अंधकार के कारण प्रतिदिन प्रात:काल नींद से जाग जाने को ही ‘जागना’ मानने की भ्रांति पाले बैठे हैं, परंतु वास्तविकता यह है कि किसी बिस्तर पर शरीर का सो जाना और सुबह जाग जाना केवल शरीर का एक धर्म, प्रकृति की एक क्रिया का हिस्सा है। इस ‘जाग’ जाने को हम उस ‘गूढ़ निद्रा’ से जाग जाना नहीं कह सकते, जो अज्ञान के अंधकार के कारण जन्मी है। उस ‘गूढ़ निद्रा’ से हम उस समय जाग सकेंगे, जब हम यह पता लगा लेंगे कि रात्रि में गहरी नींद में विलीन हो जाने के बाद प्रतिदिन प्रात:काल हमें सकुशल कौन ‘जगाता’ है ? वह कौन है, जो शरीर की गहरी नींद में भी श्वासोच्छवास, रक्त-हृदय-धमनियों की क्रियाओं को चलाता रहता है ? वह कौन है, जो निद्रावस्था में भी हमारे भीतर-बाहर रह कर हमारी रक्षा करता है और सुबह नई तरावट के साथ जगाता है ? शारीरिक निद्रा से इस ‘जगाने’ वाले को जान लेना ही ‘गूढ़ निद्रा’ से जाग जाना है, उसे ही जागृति कहते हैं, उस ‘जगाने’ वाले को जानने वाले को ही ‘जागृत’ कहते हैं। हम जिस ‘जागृत’ व्यक्ति की बात कर रहे हैं, वह कोई आसमान से नहीं टपकता, अपितु हमारी तरह किसी न किसी माँ की कोख से ही जन्म लेता है, परंतु जन्म लेने के बाद स्वयं को जागृत बना लेने वाला ऐसा व्यक्ति अपने जन्म को अवतार में बदल कर सार्थक कर जाता है।

अनादि-अनंत सनातन धर्म की धरोहर से सम्पन्न हमारी भारत भूमि पर असंख्य ‘जागृत’ व्यक्तियों का अवतरण होता रहा है और हो भी रहा है। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि आज भी सत्य की आधारशिला के कारण अस्तित्व बनाए रखने में सफल रहने वाली हमारी माँ भारती के आँचल में ऐसे अनेक ‘जागृत’ व्यक्ति खेल रहे हैं। आप भी यदि हृदय से यह भावना करें कि हमें ऐसे जागृत व्यक्ति से साक्षात्कार करना है, तो आपकी यह भावना पहले शोध में परिवर्तित होगी, फिर परिणाम में। मैं यह विशेष आलेख भारत भूमि के जिस स्थान पर अर्थात् अहमदाबाद में बैठ कर लिख रहा हूँ, वहाँ से लगभग 70 किलोमीटर दूर ही एक ऐसे ही ‘जागृत’ पुरुष साक्षात् विद्यमान हैं। अब तक मैंने ‘जागृत’ के साथ ‘व्यक्ति’ शब्द लिखा, जिसका तात्पर्य यह है कि ‘व्यक्ति’ में पुरुष और स्त्री दोनों का समावेश हो जाता है। ‘व्यक्ति’ लिख कर मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ‘जागृति’ पर किसी पुरुष या स्त्री विशेष का अधिकार नहीं है, अपितु यह हर विवेकी ‘व्यक्ति’ के लिए उपलब्ध है। हाँ, तो पुन: चलते हैं अहमदाबाद से 70 किलोमीटर दूर उस ‘प्रज्ज्वलित ज्योति’ की ओर, जो देह रूप में पुरुष है। इसीलिए उन्हें मैं यहाँ ‘जागृत पुरुष’ कह कर संबोधित कर रहा हूँ।

अद्भुत अनुभूतियों के साथ हुआ ‘संत मिलन’ का शुभारंभ

संत गोपालदास बापू (फाइल चित्र)

युवाPRESS कोई सूचनाओं का ‘बोझ’ नहीं, अपितु सत्य का ‘बोध’ कराने वाला ‘अत्याधुनिक माध्यम’ (ULTRA MODERN MEDIA) है। संस्थापक और मुख्य सम्पादक आई. के. शर्मा के समर्थ, शक्तिशाली, सत्य-सरल और स्पष्ट नेतृत्व तथा मार्गदर्शन में युवाPRESS सत्य आधारित सम्पन्नता धरोहर से समृद्ध भारत की वास्तविक शक्ति को अपने सुधि पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा है और इसी प्रयास की एक श्रृंखला ‘संत मिलन’ का व्यापक पद गुरु के दिवस यानी गुरुवार 7 नवंबर, 2019 से आरंभ हुआ, परंतु यह कोई साधारण ‘आरंभ’ नहीं रहा, अपितु अद्भुत-अकल्पनीय-अविश्वसनीय-अद्वितीय अनुभूतियों से परिपूर्ण ‘आरंभ’ रहा, क्योंकि ‘संत मिलन’ की इस श्रृंखला में युवाPRESS की प्रथम भेंट एक ऐसे संत से हुई, जिन्होंने संत शब्द को शाब्दिक नहीं, अपितु व्यावहारिक रूप से सार्थक किया है। ‘संत’ शब्द संस्कृत ‘सत्’ के प्रथमा का बहुवचनांत रूप है, जिसका सामान्य भाषा में अर्थ होता है सज्जन और धार्मिक व्यक्ति, परंतु आज के आधुनिक ‘धर्म-पंथ-सम्प्रदाय’ के स्वामी बन कर स्वयं को संत कहलाने वालों की ‘भारी भीड़’ के बीच किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए यह समझ पाना अत्यंत कठिन हो गया है कि वास्तव में वह कौन है, जिसने सत् को जीवन में आत्मसात् कर ‘संत’ पद की प्राप्ति की है ? यद्यपि युवाPRESS गुजरात के ही एक ‘कोण’ (कोने) में ब्रह्मांड को धारण किए बैठे एक ऐसे सद्पुरुष के सान्निध्य में पहुँचा, जहाँ कोई व्यक्ति ‘संत’ था ही नहीं !!! आश्चर्य हुआ न सुन कर !

तुच्छ कैमरों से नहीं समा सके हम इस संत को

संत गोपालदास बापू (फाइल चित्र)

आप सोच रहे होंगे कि इतना लंबा वृत्तांत पढ़ने के बाद भी अब तक आपको मैंने अहमदाबाद से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित गुजरात के उस ‘कोण’ को नाम नहीं बताया, जहाँ ‘कौन’ विलुप्त हो जाता है और न ही ‘संत मिलन’ श्रृंखला में साक्षात् हुए उस संत का नाम बताया। चलिए, आपको अब यह भी बता ही देते हैं। यह स्थान है पिलुद्रा, जो गुजरात में उत्तर-पूर्व (उत्तर गुजरात) दिशा में स्थित साबरकाँठा जिले की प्राँतीज तहसील में पड़ता है। पश्चिमी क्षत्रपों (आर्यों) के शासनकाल में श्वभ्र नाम से प्रसिद्ध और 1949 में साबरमती नदी के तट पर बसे होने के कारण साबरकाँठा कहलाए इस जिले का मुख्यालय हिम्मतनगर है और प्राँतीज तहसील का पिलुद्रा गाँव जिला मुख्यालय हिम्मतनगर से 22 किलोमीटर दूर स्थित है। पिलुद्रा गाँव में जब युवाPRESS ‘संत मिलन’ को पहुँचा, तो आम जनधारणा से विपरीत वहाँ कोई भगवा धारी, तिलकधारी या साधारण जगत में असाधारण वेश में रहने वाला कोई साधारण भाषा में पिरोया जा सके, ऐसा संत नहीं मिला। पिलुद्रा गाँव में स्थित सत्य सनातन आश्रम में हमारी जिस महापुरुष से भेंट हुई, वह था तो संत, परंतु कहलवाने वाले संतों से परे था। जी हाँ, उनका नाम है संत गोपालदास बापू गुरु भीखाराम बापू। मुझे स्मरण है 29 अक्टूबर, 2019 का वह दिन, जब मैंने संत गोपालदास बापू से मोबाइल फोन पर हुए वार्तालाप के दौरान साक्षात्कार के लिए भेंट करने की इच्छा व्यक्त की थी। एक साधारण व्यक्ति साक्षात्कार को अंग्रेजी में इंटर्व्यू (लेने या देने) की दृष्टि से देख सकता है, परंतु मैंने जब संत गोपालदास से साक्षात्कार की इच्छा प्रकट की, तो उन्होंने साधारण मीडिया के इंटर्व्यू लेने-देने की प्रक्रिया में पड़ने से स्पष्ट मना कर दिया। यद्यपि हमारा उद्देश्य संत गोपालदास का साधारण इंटरव्यू लेने-देने का नहीं, अपितु उनके विचारों को युवाPRESS के पाठकों तक पहुँचाने का था। मैं व्यक्तिगत रूप से भी यह अच्छी तरह जानता था कि यह कोई साधारण संत नहीं है, जो टीवी पर छा जाने को आतुर हों। यही कारण है कि कैमरे के साथ पहुँचने के बावजूद युवाPRESS ने संत की गरिमा का पूरा सम्मान किया। संतों के माध्यम से युवाPRESS वैचारिक क्रांति अवश्य करना चाहता है, परंतु युवाPRESS साधारण टीआरपी-पेजव्यूज़ तृष्णा से युक्त मीडिया की तरह किसी भी व्यक्ति को अपनी प्रगति की सीढ़ी नहीं बना सकता और संतों को ऐसी सीढ़ी बनाने का पाप तो कदापि नहीं कर सकता। मैं इस वास्तविकता को भली-भाँति समझता हूँ और पिलुद्रा के सत्य सनातन आश्रम के पावन परिसर में बैठ कर भी समझ रहा था कि एक सच्चे संत का चित्र कभी किसी कैमरे में नहीं उतारा जा सकता।

भ्रम भंजक-ब्रह्म बोधक संत गोपालदास

संत गोपालदास बापू (फाइल चित्र)

जब कैमरा बंद हुआ, तो तब युवाPRESS संत गोपालदास की वास्तविक तसवीर को खींच सका। गुजरात में वैसे सौराष्ट्र को संतों की भूमि कहा जाता है, क्योंकि वहाँ जेसल-तोरल, गंगासती-पानबाई, नरसिंह मेहता, जलाराम बापा, बजरंगदास बापा जैसे अनेक संत अवतरित हुए। यद्यपि धर्म और अध्यात्म से परिपूर्ण गुजरात की पावन भूमि के हर कोण में ब्रह्मांड के भूगोल को जानने वाले संत अवतरित होते रहे हैं और यही कारण है कि संत गोपालदास भी भले ही गुजरात के पुरोधा-प्रसिद्ध महान संतों की तरह प्रसिद्ध न हों, परंतु यूट्यूब पर उनके अनेक वीडियो आपको मिल जाते हैं। देखिएगा, भूल नहीं करना। यह वीडियो संत गोपालदास या उनके आश्रम की ओर से अपलोड नहीं किए गए हैं। ये सारे वीडियो पाँच वर्ष से अधिक पुराने हैं, जब संत गोपालदास ने गुजरात में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रम-भ्रांति, भय और भेद के विरुद्ध ब्रह्म बोध की अलख जगाई थी। संत गोपालदास की वाणी में आपको ‘क्रूरता और प्रहार’ नज़र आएँगे, परंतु यदि वास्तविक दृष्टिकोण से देखेंगे, तो आप सहज ही समझ सकेंगे कि गोपलदास की वाणी समाज में अभूतपूर्व क्रांति लाने में सक्षम है। संत गोपालदास के यूट्युब पर अपलोड वीडियो पाँच वर्ष पूर्व गुजरात के विभिन्न गाँवों और छोटे-बड़े शहरों में आयोजित सत्संग के हैं, जिनमें उन्होंने धार्मिक आडंबरों, देवी-देवताओं, तांत्रिकों, बाह्य क्रियाओं के माध्यम से केवल कामनाओं से युक्त सकाम भक्ति करने वालों पर घातक प्रहार किए हैं और लोगों को अपने आत्म-स्वरूप, निज-स्वरूप, स्व-स्वरूप को पहचानने के लिए ललकारा है। ये सारे वीडियो सत्संग स्थल पर लोगों ने मोबाइल पर शूट किए हैं। संत गोपालदास स्वयं कोई ऐसी प्रसिद्धि या सार्वजनिक व्याख्याता या महान उपदेशक बनने की इच्छा नहीं रखते। यह सही भी है, जो इच्छा रखे, वह संत कैसे हो सकता है। संत का अर्थ ही सत्य को जानने वाला होता है। सत्य का प्रकाशक होता है। संत गोपालदास की निर्बाध-अभेद-निर्भय वाणी ने कइयों के जीवन को भ्रांतिमुक्त किया, परंतु कहीं न कहीं संत गोपालदास को लगा कि उनके प्रवचनों को कुछ लोग केवल मनोरंजन की दृष्टि से सुनते हैं। इसीलिए उन्होंने सार्वजनिक सत्संग और प्रवचनों का सिलसिला रोक दिया।

युवाPRESS के साथ सत्संग में दिखा प्रकट स्वरूप

संत गोपालदास (मध्य में), गुरु व पिता भीखाराम बापू व गुरु माता व माता विमळा बा। (फाइल चित्र)

युवाPRESS जब सत्य सनातन आश्रम में संत गोपालदास के सम्मुख पहुँचा, तो पहले तो उन्हें कैमरे आदि देख कर संकोच हुआ, परंतु जब कैमरे का मुँह बंद हुआ, तो सत्संग की धारा बह निकली। जैसा कि यूट्यूब पर अपलोडेड वीडियो में हमने संत गोपालदास को देखा-सुना था, ठीक वैसा ही उन्हें पाया भी। अपनी वाणी में निरंतर स्वयं को पहचान लेने की चुनौती देने वाले संत गोपालदास ने युवाPRESS के साथ सत्संग के दौरान भी यही बात दोहराई, ‘आप किसी भगवान को, किसी देवी-देवता को मानें या न मानें, परंतु स्वयं को तो मानिए। आपका होना ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण है।’ उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध नहीं किया, परंतु उनका स्पष्ट मानना यह था कि जब तक आत्म-ज्ञानी, प्रकट स्वरूप, ज्ञानी संत की शरण न मिले, तब तक भक्ति के लिए मूर्ति पूजा, विधि-विधान आदि कर्म करना अनुचित नहीं है, परंतु इन सभी पुण्य कर्मों के फल स्वरूप यदि आपको कोई प्रकट पुरुष मिल जाए, तो इन कर्मों से मुक्त हो जाना चाहिए और अपने मूल स्वरूप को पहचानने के लिए पुरुषार्थ आरंभ कर देना चाहिए। संत गोपालदास अपने गुरु और दैहिक पिता संत भीखाराम बापू के प्रकट संदेश को बार-बार दोहराते हुए कहते हैं, ‘हर व्यक्ति को अपने जीवन में अपने आप से कभी न कभी यह प्रश्न अवश्य करना चाहिए कि वह कौन है ? जिसके मन में यह प्रश्न नहीं जागता, उसका जीवन व्यर्थ है। जब तक देह भाव रूपी ‘मैं’ जीवित है, तब तक अमरत्व प्राप्त ‘मैं’ को नहीं जाना जा सकता। हम जिस शरीर के आधार पर अपना परिचय ‘मैं’ कह कर कराते हैं, वास्तव में वह ‘मैं’ हम नहीं हैं। हम वह ‘मैं’ हैं, जो हमारे शरीर के भीतर-बाहर कण-कण में व्यापक है। वही हमारा वास्तविक स्व-रूप है। उस ‘मैं’ को जान लेने वाला व्यक्ति कभी भी अपने शरीर तक सीमित नहीं हो सकता। वह अथाह, असीमित, अनंत और अमरत्व को प्राप्त व्यक्ति होता है, जो यह भली-भाँति जानता है कि मैं जिस देह के रूप में पृथ्वी पर विद्यमान हूँ, वह भले ही एक दिन नष्ट हो जाएगा, परंतु मेरा न कभी आरंभ हुआ था, मेरा न कोई मध्य है और न ही मेरा कभी अंत होगा। मैं सनातन सत्य हूँ। मैं सदैव हूँ। न कभी जन्म लूँगा, न ही कभी मरूँगा।’ संत गोपालदास ने मानव जीवन के परम् लक्ष्य उस आत्म-ज्ञान को अत्यंत सहज भाव से युवाPRESS के समक्ष वाणी में लाने का प्रयास किया, जो अवर्णनीय है। संत गोपालदास का समग्र मानव जाति को एक ही संदेश है कि वह क्रियाओं के बंधनों में जकड़ने वाले धर्मों, पंथों, संप्रदायों से मुक्त होकर स्व की ओर यात्रा करें और स्व को जानें और इस स्व की परख के लिए किसी प्रकट पुरुष अर्थात् ज्ञानी संत की शरण में जाएँ, जिसने स्वयं को जाना है। संत गोपालदास के साथ हुए इस सत्संग के बाद मैं स्वयं यह दावा करता हूँ कि वास्तव में किसी प्रकट पुरुष, सत् आधारित संत, सत्य प्रकाशक गुरु की शरण ली जाए, तो जिस किसी के भी मन में ‘मैं कौन हूँ ?’ प्रश्न उठे, उसका यह प्रश्न स्वत: विलुप्त हो जाएगा। अंत में यही कहना चाहूँगा कि गुजरात ही नहीं, पूरे भारत में अनेक संत होंगे, परंतु यदि हम गुजरात में रहते हैं, तो गुजरात के इस ‘कोण’ (कोने) अर्थात् पिलुद्रा अवश्य जाना चाहिए, जहाँ एक सच्चे संत और प्रकट पुरुष का सान्निध्य ‘कौन’ को विलुप्त कर सकता है।

(गुरु अर्पण)

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