VIDEO : मिलिए एक ऐसी माँ से, जिसकी कोई संतान नहीं..!

* नि:संतान सालूमरदा ने वृक्षों को ही बना लिया संतान

* 8 हजार वृक्ष लगा कर अनायास ही बन गईं वृक्षमाता

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 7 जून, 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। अभी दो दिन पहले ही 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। यह ऐसा दिन होता है, जब पूरी दुनिया एक दिन के लिए पर्यावरण की चिंता करती है, बड़े-बड़े विद्वान पर्यावरण संरक्षण के लिए आकर्षक भाषण देते हैं और फिर वर्ष के शे, 364 दिनों के लिए ‘सो’ जाते हैं, परंतु हम बात एक ऐसी महिला की करने जा रहे हैं, जो एक दिन नहीं, एक सप्ताह नहीं, एक महीना नहीं, एक वर्ष नहीं, अपितु जीवन भर पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित है। भारत एक युवा, शिक्षित और दुनिया में तेजी से प्रगति करने वाला देश है, इसमें कोई संदेह नहीं, परंतु इसी प्रगतिशील देश का एक अत्यंत कठोर और कड़वा सत्य यह भी है कि देश की पर्यावरणीय स्थिति अत्यंत दयनीय स्थिति में है। हम सब इस सत्य से परिचित भी हैं। इसके बावजूद पर्यावरण को सुधारने की दिशा में कोई सक्रिय प्रयास नहीं करते। अभी बीते दिन ही विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधारोपण की औपचारिकता पूरी करके संतोष कर लिया गया। जबकि कर्णाटक की एक अशिक्षित और बुजुर्ग महिला सभी के लिये प्रेरणा बन गई है। बरगद के 400 से अधिक तथा अन्य 8,000 वृक्ष लगाकर सालूमरदा कर्नाटक की पर्यावरणविद् और वृक्षमाता के नाम से पहचानी जाती है।

हम सब तो जानते हैं कि वृक्ष हमारे पर्यावरण और जीवनदायिनी शुद्ध व शीतल हवा के लिये कितने आवश्यक हैं। फिर भी हम वृक्षारोपण के प्रति उदासीनता बरतते हैं। बल्कि सड़कें और बस्तियाँ बसाने के लिये पेड़ काटने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाते हैं। जबकि कर्णाटक के रामनगर जिले में रहने वाली और मजदूरी करके पेट भरने वाली 104 साल की बुजुर्ग महिला सालूमरदा थिमक्का ने अंजाने में ही पर्यावरण के लिये ऐसा प्रशंसनीय काम किया है, जिसके लिये केन्द्र और राज्य सरकार ने भी उन्हें कई पुरस्कारों से पुरस्कृत किया है। 2019 में 107 वर्ष की उम्र में राष्ट्रपति भवन में स्वयं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने वृक्षमाता को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर वृक्षमाता नंगे पाँव पुरस्कार लेने आई थी। उन्होंने खुद से उम्र में 33 साल छोटे राष्ट्रपति कोविंद के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद भी दिया।

सालूमरदा थिमक्का नाम की इस महिला की शादी चिकइया नाम के एक युवक से हुई थी, जो उसी की बिरादरी का था। दोनों मिलकर मजदूरी करते थे और अपनी आजीविका चलाते थे। लंबा दाम्पत्यजीवन गुज़र जाने के बावजूद दोनों की कोई संतान नहीं हुई, जिससे सालूमरदा बहुत उदास रहने लगी। अपने जीवन के इस सूनेपन को दूर करने के लिये एक दिन उसने एक बरगद का पौधा रोपा और उसी की अपनी संतान की तरह देखभाल करने लगी। इससे उसका मन लगा रहता था। वह पौधे को नियमित पानी से सींचती थी और पशुओं से भी पौधे को सुरक्षित रखती थी। उसकी देखरेख में पौधा भी खिल उठा और जब यह पौधा थोड़ा बड़ा हो गया, इसके बाद सालूमरदा ने कुछ और पौधे लगाए और उन्हें भी अच्छे से देखभाल करके बड़ा किया। सालूमरदा तो अपनी संतान की तरह ही इन पौधों को पाल रही थी, उसे पता नहीं था कि उसने अपने जीवन के खालीपन को दूर करने के लिये जो मार्ग अपनाया है, वह एक दिन उसे वृक्षमाता की पहचान दिलाएगा और सरकार से पुरस्कार दिलायेगा। धीरे-धीरे पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना ही सालूमरदा के जीवन का उद्देश्य बन गया और उसने हुलूकल से कुडूर तक 4 किलोमीटर तक हाई-वे के किनारे बरगद के 400 पौधे रोपकर उन्हें छायादार वृक्ष बना दिया।

इन पेड़ों के कारण सालूमरदा आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी और फिर उसकी वृक्षमाता की यश-कीर्ति इतनी बढ़ी कि सरकार को भी सालूमरदा के बारे में जानकारी मिली। सरकार ने जब इसका पता लगाया तो ज्ञात हुआ कि इन 400 वृक्षों का बाजार मूल्य लगभग 15 लाख रुपये है। अब सरकार ने इन वृक्षों की देखरेख की जिम्मेदारी सँभाल ली है और सालूमरदा को पर्यावरण के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिये पुरस्कृत किया है। इसके बाद पुरस्कारों भी सिलसिला चल पड़ा। अब तक सालूमरदा को कई सम्मान मिल चुके हैं।

सबसे पहले 1995 में सालूमरदा को नेशनल सिटीजंस अवॉर्ड मिला। इसके बाद 1997 में इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र और वीरचक्र प्रशस्ति अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। सन् 2000 में सालूमरदा को कर्णाटक कल्पवल्ली अवॉर्ड मिला, जबकि 2006 में गोडफ्रे फिलिप्स ब्रेवरी अवॉर्ड दिया गया। श्री श्री रविशंकर महाराज की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग भी सालूमरदा को विशालाक्षी अवॉर्ड से सम्मानित कर चुकी है। सालूमरदा को प्राप्त हुए पुरस्कारों की सूची काफी लंबी हो चुकी है। इस प्रकार सालूमरदा के अपने हाथों से पाले गये वृक्ष रूपी पुत्रों ने समाज में उसे इतना सम्मान दिलाया है, जो कदाचित उसकी अपनी संतानें भी उसे नहीं दिला पाती।

आप भी देखिए पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण करती अम्मा को :

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