पूरी दुनिया में हो गई ‘इमर्जेंसी’ की घोषणा : अब क्या करेंगे आप ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 6 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। देश की राजधानी दिल्ली में भारी प्रदूषण के चलते सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित टीम ने ‘हेल्थ इमर्जेंसी’ की घोषणा की तो पूरे देश में खलबली मच गई। 1.80 करोड़ की आबादी वाले महानगर के आसमान में स्मॉग की ऐसी चादर बिछ गई कि भरी दोपहर में भी अंधकार छा गया और इसके चलते फ्लाइट्स भी डायवर्ट करनी पड़ी। दूसरी ओर लोग शुद्ध हवा में साँस लेने को तरसने लगे और जहरीली हवा में साँस लेने को मजबूर हो गये। अब सोचिए कि यदि पूरी धरती पर इससे भी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाए तो आप क्या करेंगे ? इसीलिये दुनिया के कुल 195 देशों में से 153 देशों के 11 हजार से अधिक वैज्ञानिकों ने ‘पृथ्वी पर आपातकाल’ की घोषणा कर दी है और दुनिया पर मँडरा रहे अस्तित्व के खतरे के बारे में चेताया है। दिल्ली में हेल्थ इमर्जेंसी घोषित होने के बाद एक सर्वे में यह तथ्य सामने आया कि 40 प्रतिशत से अधिक लोग दिल्ली छोड़ कर अन्यत्र बसना चाहते हैं। अब यहाँ भी आपके लिये गंभीर सवाल उपस्थित होता है कि यदि पूरी पृथ्वी पर ही आपातकाल की स्थिति होगी तो हमारे पास रहने के लिये एक मात्र घर के रूप में पृथ्वी ही है, तो हम कहाँ जाएँगे ? इसीलिये वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर पर्यावरण सुरक्षा के लिये आज से और अभी से युद्ध स्तर पर काम शुरू नहीं किया तो ऐसी त्रासदी का सामना करना पड़ेगा, जिसके बारे में आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इस चेतावनी से एक बार पुनः यह बात सिद्ध हो गई कि आधुनिक विकास, वस्तुतः विकास नहीं, अपितु विनाश है और भारत की प्राचीन इको फ्रेंडली जीवनशैली ही सर्वोत्तम है। इसी को दोबारा अपनाने के अतिरिक्त जीवन का अस्तित्व बचाने का अन्य कोई उपाय नहीं।

वैज्ञानिकों ने कहा, हमने आगाह करके अपना कर्तव्य निभाया

वैज्ञानिकों ने बायो साइंस मैग्जीन में छपी अपनी रिसर्च रिपोर्ट में यह बात कही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि स्थिर भविष्य के लिये हमें अपने जीने के तरीके बदलने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों का यह नैतिक दायित्व है कि वे आने वाले संकट के बारे में लोगों को चेतावनी दें। इसलिये वे लोगों को उनके अस्तित्व पर मँडरा रहे खतरे से आगाह कर रहे हैं और अब स्वयं की रक्षा करने का दायित्व खुद लोगों का है। इन वैज्ञानिकों ने जलवायु आपातकाल की घोषणा करने के साथ ही उस पर अपने हस्ताक्षर भी किये हैं। वैज्ञानिकों की इस रिसर्च टीम का नेतृत्व ओरेगॉन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता विलियम रिपल और क्रिस्टोफर वुल्फ ने किया। उन्होंने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में लिखा है कि वैश्विक जलवायु वार्ता के 40 वर्ष बाद भी हम अपना प्रदूषण फैलाने का कारोबार जारी रखे हुए हैं और विकट स्थिति को दूर करने में विफल रहे हैं। अब संकट आ चुका है और बढ़ रहा है।

आपातकाल से निपटने के लिये वैज्ञानिकों ने बताये 6 उपाय

वैज्ञानिकों ने इस विकट स्थिति से निपटने के लिये 6 बड़े काम करने का सुझाव दिया है। पहला जीवाश्म ईंधन की जगह ऊर्जा के अक्षय स्रोतों का इस्तेमाल शुरू करें। मीथेन गैस जैसे प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम करने पर काम शुरू कर दें। धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित करें अर्थात् भूमि, जलस्रोत यानी नदी, नहर, तालाब, बावड़ियों और जंगल तथा जीव सृष्टि को सुरक्षित करें, पृथ्वी का दोहन रोकें। शाकाहारी भोजन को तरजीह दें और माँसाहार पर तुरंत रोक लगाएँ। कार्बन मुक्त अर्थ व्यवस्था को विकसित करना, अर्थात् कैमिकल वाले उद्योगों-व्यवसायों को तुरंत रोकना होगा और अंत में जनसंख्या पर भी ब्रेक लगाने का काम करना होगा। क्योंकि धरती का दोहन होने से धरती का वजन कम हो रहा है और सूर्य व पृथ्वी की नजदीकी बढ़ने से पृथ्वी पर तापमान तेजी से बढ़ रहा है। यह परिस्थिति मानव सृष्टि के लिये नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। मानव सृष्टि को पृथ्वी पर बनाये रखने के लिये अब तत्काल प्रभाव से काम शुरू करना होगा, इसे कल पर नहीं टाल सकते। क्योंकि हमारे पास पृथ्वी के रूप में केवल एक ही घर है, इसे बचाने के अतिरिक्त हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को बाहर रखने की प्रक्रिया शुरू की है। इस समझौते का उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन को कम करना है।

क्या पैरिस जलवायु समझौता ?

इस वैश्विक समझौते में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ट्रंप ने जून 2017 में ही इस समझौते से अलग होने की घोषणा कर दी थी और इसकी प्रक्रिया सोमवार से शुरू की है, जिसकी औपचारिक जानकारी संयुक्त राष्ट्र को भेज दी है। 4 नवंबर-2020 को अमेरिका इस समझौते से अलग हो जाएगा। यह समझौता 12 दिसंबर 2015 को हुआ था। अमेरिका ने 22 सितंबर 2016 को इस पर हस्ताक्षर किये थे और 3 सितंबर 2016 को समझौते का पालन करने की स्वीकृति दी थी। इस समझौते में दुनिया के सभी 195 देशों ने हस्ताक्षर किये हैं। सभी देश जलवायु परिवर्तन को कम करने के तरीकों पर काम करने के लिये सहमत हुए हैं। यह समझौता 2020 से लागू किया जाएगा। इस समझौते के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग को वर्ष 2,100 तक 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित करना है। 2050 तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को 40 और 70 प्रतिशत के बीच कम किया जाना है और 2100 तक शून्य स्तर तक पहुँचने की जरूरत है।

क्या है ग्रीन हाउस गैस ?

धरती के वातावरण के तापमान को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों में ग्रीन हाउस गैस भी एक कारक है। ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाई ऑक्साइड सबसे प्रमुख है, जो आम तौर पर जीवाश्म ईंधनों के जलने से उत्सर्जित होती है। वातावरण में यह गैस 0.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है और इसकी तपन क्षमता 1 है। जैव ईंधनों के जलने से प्रति वर्ष 5 बिलियन टन से भी अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड वातावरण में फैलती है, जिसमें उत्तरी तथा मध्य अमेरिका, एशिया, यूरोप तथा मध्य रशियन गणतंत्रों का योगदान 90 प्रतिशत से भी अधिक है। औद्योगिक युग की शुरुआत से पहले की तुलना में वायु में कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर 31 प्रतिशत तक बढ़ गया है। चूँकि जंगल कार्बन डाई ऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते हैं, अंतः वन विनाश इस गैस की वातावरण में वृद्धि का प्रमुख कारण है। वनों के विनाश के परिणाम स्वरूप 1850 से 1950 के बीच 100 साल में लगभग 120 बिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड वातावरण में मिश्रित हो चुकी है। इस प्रकार पिछले 100 वर्षों में कार्बन डाई ऑक्साइड की वातावरण में 20 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। कोयला बिजली घर भी ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं। हालाँकि भारत में क्लोरो-फ्लोरो का प्रयोग बंद हो चुका है, परंतु इसके स्थान पर प्रयोग की जा रही गैस हाइड्रो क्लोरो-फ्लोरो कार्बन सबसे हानिकारक ग्रीन हाउस गैस है। जो कार्बन डाई ऑक्साइड से एक हजार गुना अधिक हानिकारक है। कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, वाष्प, ओजोन आदि का उत्सर्जन एयरकंडीशन, फ्रिज, कंप्यूटर, स्कूटर, कार आदि से होता है। कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत पेट्रोलियम ईंधन और परंपरागत चूल्हे हैं। पशुपालन से मीथेन का उत्सर्जन होता है।  

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