जब टीम मैनेजर ने कहा, ‘तिरंगे की लाज तुम्हारे हाथ में है’, तो मेजर ध्यानचंद ने हिटलर की सेना को हिला डाला…

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 3 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। एक भारतीय नागरिक, चाहे किसी भी देश में चला जाए, किसी भी देश में रहने लगे, वह भारत के साथ अपने नाते को कभी नहीं तोड़ना चाहता। हर भारतीय ने जब भी मौका मिला, अपने भारत और उसके तिरंगे की शान में सब कुछ गँवाना गवारा समझा। एक भारतीय नागरिक अपने देश में रह कर भले ही किसी व्यक्ति के प्रलोभन में फँस जाए, परंतु वह कभी भी विदेशियों के लिए बिकाऊ नहीं होता, फिर ख़रीदार दुनिया का सबसे क्रूर तानाशाह हिटलर ही क्यों न हो।

ऐसे ही एक भारतीय नागरिक का नाम है मेजर ध्यानचंद सिंह। पूरी दुनिया में हॉकी के जादूगर (MAGICIAN OF HOCKEY) की उपाधि से विख्यात मेजर ध्यानचंद को आज हम इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 40वीं पुण्यतिथि है। 3 दिसंबर, 1979 को मेजर ध्यानचंद ने इस दुनिया को अलविदा कहने से पूर्व भारत के लिए हॉकी के क्षेत्र में ऐसे-ऐसे साहसी कीर्तिमान स्थापित किए, जिसकी उस दौर में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में जन्मे मेजर ध्यानचंद हॉकी की दुनिया में ‘दद्दा’ नाम से भी विख्यात थे। आज का भारत भले क्रिकेट का दीवाना हो, परंतु स्वतंत्रता से पूर्व भारत को हॉकी के क्षेत्र में बुलंदियों पर पहुँचाने का कठिन कार्य करने का श्रेय मेजर ध्यानचंद को ही जाता है। वे ध्यानचंद ही थे, जिन्होंने उस दौर में जर्मीनी की हॉकी टीम को धूल चटाई थी, जब वहाँ दुनिया के सबसे ख़तरनाक और क्रूर अधिनायक (तानाशाह) एडोल्फ हिटलर का शासन था। बात 1936 की है, जब तत्कालीन नाज़ी जर्मनी के बर्लिन शहर में मल्टी-स्पोर्ट इवेंट ‘समर ओलम्पिक्स 1936’ चल रहा था। 1 अगस्त से 16 अगस्त, 1936 के दौरान आयोजित इस हॉकी ओलम्पिक्स में भारतीय टीम का नेतृत्व ध्यानचंद कर रहे थे। कप्तान चुने जाने के बाद ध्यानचंद ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा था, ‘”मुझे ज़रा भी आशा नहीं थी कि मैं कप्तान चुना जाऊँगा।’ यह वह दौर था, जब हॉकी की दुनिया में जर्मनी का बोल-बाला था। 5 अगस्त को भारत का पहला मुक़ाबला हंगरी से हुआ। भारत ने हंगरी को 4 गोल से हरा कर विजयी शरुआत की, तो 7 अगस्त को भारत ने जापान को 9-0 से और 12 अगस्त को फ्रांस को 10 गोल से हरा दिया।

जब तिरंगे ने भरा जोश और चित्त हो गया जर्मनी

1947 से 15 अगस्त का दिन हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दिन बना, क्योंकि हमें अंग्रेजों की दासता से इसी दिन मुक्ति मिली थी, परंतु 1936 में 15 अगस्त के दिन को भारत के लिए ऐतिहासिक बनाने का काम किया मेजर ध्यानचंद और उनके नेतृत्व वाली भारतीय टीम ने। यह वही दिन था, जब बर्लिन ओलम्पिक्स में भारत और जर्मनी के बीच फाइनल मुक़ाबला हुआ था। यद्यपि इतिहास में यह तारीख़ 14 अगस्त के रूप में दर्ज होने वाली थी, क्योंकि भारत-जर्मनी का मैच इसी दिन होने वाला था, परंतु भारी वर्षा के चलते 14 अगस्त को मैच नहीं हुआ। जर्मनी ने अभ्यास मैच के दौरान ध्यानचंद की टीम को ज़ोरदार पटखनी दी थी। इसके चलते टीम इंडिया कैम्प में 15 अगस्त को होने वाले मुक़ाबले को लेकर हताशा और आशंका थी। एक दिन पहले हुई बारिश, गीले मैदान और प्रतिकूल परिस्थितियों ने भारतीय खिलाड़ियों को निराश कर रखा था, तभी टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता को एक युक्ति सूझी और वे खिलाड़ियों को ड्रेसिंग रूम में ले गए। गुप्ता ने खिलाड़ियों के सामने तिरंगा झण्डा रखा और कहा, ‘इसकी लाज तुम्हारे हाथ में है।’ सभी खिलाड़ियों ने तिरंगे को सलाम किया और वीर सैनिक की तरह 15 अगस्त, 1936 को जर्मनी के विरुद्ध मैदान में कूद पड़े। मेजर ध्यानचंद के नेतृत्व में सभी खिलाड़ियों ने ऐसा धारदार और धमाकेदार प्रदर्शन किया कि जर्मनी को 8-1 की शर्मनाक हार झेलनी पड़ी। 15 अगस्त, 1936 को वास्तव में मेजर ध्यानचंद और उनकी टीम इंडिया ने तिरंगे की लाज बचाई।

व्याकुल हिटलर ने ध्यानचंद को दिया लालच

यह पहला मौका नहीं था कि भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता हो। टीम इंडिया ने 1928 और 1932 के ओलम्पिक में दो स्वर्ण पदक जीत कर हॉकी की दुनिया में जबर्दश्त धाक जमा ली थी और बर्लिन ओलम्पिक में भी टीम इंडिया का विजय रथ रुका नहीं। जर्मन टीम इस अति आत्मविश्वास में रही कि उसने अभ्यास मैच में भारत को हरा दिया है, लिहाज़ा वह 15 अगस्त, 1936 को हुए मुक़ाबले में भी भारत को आसानी से धूल चटा देगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं। पूरे बर्लिन ओलम्पिक्स में मेजर ध्यानचंद ने अपने शानदार प्रदर्शन से पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। ध्यानचंद ने 5 मैचों में कुल 11 गोल दागे, जबकि फाइनल मुक़ाबले में जर्मनी के खिलाफ उन्होंने 3 निर्णायक गोल दाग कर जर्मन टीम के अहंकार को चकनाचूर कर दिया और भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। मेजर ध्यानचंद के इस प्रदर्शन से तत्कालीन जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर बहुत प्रभावित हुआ। उसने ध्यानचंद को अपने यहाँ बुलाया। हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मन नागरिकता देने की पेशकश की और साथ ही जर्मन फौज़ में कर्नल जैसा ऊँचा पद देने का भी प्रस्ताव किया, परंतु हिन्दुस्तानी ध्यानचंद ने उस दौर के सबसे क्रूर शासक हिटलर के सामने पूर्ण आत्म-विश्वास, निर्भयता और विनम्रता के साथ उनके सारे प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा, ‘मैं हिन्दुस्तान में खुश हूँ।’ उस दौर में जब हिटलर के सामने ‘न’ कहने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी, तब भारतीय सेना में पहले से ही सेवारत् मेजर ध्यानचंद ने हिटलर का प्रस्ताव ठुकरा दिया और हिटलर का माथा शर्म से झुका दिया। हिटलर ध्यानचंद को छोड़ कर चुपचाप वहाँ से चला गया। यह मुलाक़ात भले ही चंद मिनटों की थी, परंतु इन चंद मिनटों में ही ध्यानचंद ने हिटलर सहित पूरे विश्व को जता दिया कि उनके लिए देश से बड़ा कोई पद नहीं था।

सेना से जुड़ कर बने मेजर

मेजर ध्यानचंद ने अपने हॉकी खिलाड़ी के रूप में पूरे कैरियर में 1000 से अधिक गोल दागे। ध्यानचंद ने 16 वर्ष की आयु में यानी 1921 में भारतीय सेना जॉइन कर ली थी, परंतु उनके मनो-मस्तिष्क में तो हॉकी छाई हुई थी। हॉकी खेलने के ज़ुनून के कारण ही ध्यानचंद ने सेना जॉइन करने के बाद हॉकी खेलना शुरू किया। वे काफी प्रैक्टिस करते थे। वे चांद निकलने तक हॉकी का अभ्यास करते थे। इसीलिए उनके साथी खिलाड़ी उन्हें चांद के नाम से पुकारने लगे थे। एक तरफ हॉकी और दूसरी तरफ सेना। दोनों ही क्षेत्रों में ध्यानचंद बराबर ध्यान दे रहे थे। ब्रिटिश हुक़ूमत ने 1927 में ध्यानचंद को लांस नायक बनाया, तो अगले ही साल 1928 में ध्यानचंद पहली बार एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में उतरी भारतीय टीम का हिस्सा बने। इंग्लैण्ड में खेले गए एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में भारतीय टीम ने 11 मैच खेले और सभी जीते, जिसमें ध्यानचंद का शानदार प्रदर्शन रहा। भारतीय टीम ने 17 मई, 1928 को ऑस्ट्रिया को, 18 मई, 1928 को बेल्जियम को, 20 मई, 1928 को स्विट्ज़रलैण्ड को हराया और 26 मई, 1928 को हुए फाइनल मैच में हॉलैण्ड को हरा कर विश्व चैम्पियन का ख़िताब हासिल किया। फाइनल में भी ध्यानचंद ने 2 निर्णायक गोल दागे। हॉकी में शानदार प्रदर्शन कर रहे ध्यानचंद को ब्रिटिश शासकों ने 1932 में लॉस एंजेल्स भेजी गई सेना का नायक नियुक्त किया। इधर 1937 में ध्यानचंद को टीम इंडिया का कप्तान बनाया गया, तो उधर सेना में 1938 में ब्रिटिश हुक़ूमत के वायसरॉय कमिशन से मुलाक़ात के बाद उन्हें सूबेदार बना दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1943 में ध्यानचंद को लेफ्टिनेंट और स्वतंत्र भारत में 1948 में कप्तान पद पर नियुक्त किया गया। केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नति होती चली गई। बाद में स्वतंत्र भारत में ही ध्यानचंद को सेना में मेजर का पद प्रदान किया गया।

बले तिवारी से सीखा हॉकी का पहला पाठ

एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन के बाद 1932 में लॉस एंजल्स में हुई ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में भी उन्हें भारतीय दल में शामिल किए गए, जिसमें ध्यानचंद ने 262 में से 101 गोल खुद दागे। निर्णायक मैच में भारत ने जब अमेरिका को 24-1 से हराया, तो एक अमेरिकी समाचार पत्र ने लिखा, ‘भारतीय हॉकी टीम तो पूरब से आया तूफान दी, जिसने अपने वेग से अमेरिकी टीम के 11 खिलाड़ियों को कुचल दिया।’ ध्यानचंद की तुलना क्रिकेट में ब्रैडमैन से की जाती है। हालाँकि ध्यानचंद ने हॉकी का पहला पाठ तब सीखा, जब वे भारतीय सेना की ब्राह्मण रेजीमेंट में थे। इस रेजीमेंट में हॉकी के शौकीन बले तिवारी से ध्यानचंद ने हॉकी का पहला पाठ सीखा।

भारत रत्न से वंचित क्यों हैं ध्यानचंद ?

मेजर ध्यानचंद सिंह को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने की बार-बार मांग उठती रही है। ध्यानचंद को भारत सरकार ने 1956 में तीसरे दर्जे के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से तो सम्मानित किया, परंतु भारत रत्न से अब तक वे वंचित ही रहे हैं। भारत में 2013 से पहले भारत रत्न की योग्यता श्रेणी में खेल जगत से जुड़े लोग शामिल नहीं थे, परंतु क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने के लिए भारत सरकार ने 2013 में नियम बदले और सचिन तेंदुलकर खेल जगत से भारत रत्न पाने वाले प्रथम भारतीय नागरिक बने। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि नियम बदल जाने के बाद भी मेजर ध्यानचंद की ओर किसी सरकार ने अब तक ध्यान क्यों नहीं दिया ? नियम बदले 6 वर्ष हो चुके हैं, परंतु अभी तक भी मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया। सचिन को तो भारत रत्न से सम्मानित कर दिया गया, परंतु ध्यानचंद की प्रतीक्षा जारी है। ध्यानचंद के पुत्र ओलम्पियन अशक कुमार कहते हैं कि कोई भी सरकार उनके पिता के योगदान को समझ नहीं पा रही है। यद्यपि अब मोदी सरकार से लोगों को उम्मीद है कि वह मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देकर उनकी राष्ट्र सेवा को सर्वोच्च प्रणाम करने का सौभाग्य अवश्य हासिल करेगी।

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