आ अब लौट चलें : रम जाओ राम में, यही है रमा एकादशी का संदेश

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 24 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। वैचारिक क्रांति के मंच युवाPRESS की ओर से गत 9 अक्टूबर से आरंभ किए गए ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ और उसके अंतर्गत ही आरंभ किए गए ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ की आज दूसरी कड़ी है, क्योंकि आज रमा एकादशी है। ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ के इस भाग 4 में और ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ के भाग 2 में आज हम रमा एकादशी की चर्चा करने जा रहे हैं। रमा एकादशी वैसे दीपावली महापर्व से पूर्व पड़ती है और इसी कारण रमा एकादशी से लाभ पंचमी तक मनाए जाने वाले दीपावली महापर्व का आरंभ भी रमा एकादशी से ही होता है, परंतु हम ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ में रमा एकादशी की ही बात करेंगे।

रमा अर्थात् माता लक्ष्मी का एक नाम। रमा का यदि शाब्दिक अर्थ किया जाए, तो किसी में लीन हो जाना या रम जाना भी रमा कहलाता है। भगवान श्री राम का नाम भी रम से सम्बद्ध है। ‘रम्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय के योग से ‘राम’ शब्द उत्पन्न होता है। ‘रम्’ धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे प्राणीमात्र के हृदय में ‘रमण’ (निवास) करते हैं, इसलिए ‘राम’ हैं तथा भक्तजन उनमें ‘रमण’ करते (ध्याननिष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे ‘राम’ हैं – ‘रमते कणे कणे इति रामः’। ‘विष्णुसहस्रनाम’ पर लिखित अपने भाष्य में आदि शंकराचार्य ने पद्मपुराण का हवाला देते हुए कहा है कि नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगीजन रमण करते हैं, इसलिए वे ‘राम’ हैं। अब राम चूँकि भगवान विष्णु का ही अवतार हैं, अत: स्वाभाविक है विष्णु की पत्नी माता लक्ष्मी का एक नाम रमा है। रमा एकादशी के दिन लक्ष्मी नारायण की ही पूजा का विधान है।

रमा अर्थात माँ लक्ष्मी का स्वरूप और एकादशी यानी हिंदू पंचांग की ग्यारहवीं तिथि, जो महीने में दो बार आती है। एक पूर्णिमा के बाद और दूसरी अमावस्या के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। इन दोनों प्रकार की एकादशियों का भारतीय सनातन संप्रदाय में बहुत महत्त्व है। आज रमा एकादशी (Rama Ekadashi) है जिसे रम्भा एकादशी भी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा का प्रावधान माना जाता है। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इस दिन व्रत के प्रभाव से सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं, जो भक्‍त सच्‍चे मन और विधि विधान से रमा एकादशी का व्रत करता है, इसकी कथा पढ़ता है उसे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है और मृत्‍यु उपरांत उसे विष्‍णु लोक की प्राप्‍ति होती है। मान्यता है कि रमा एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के बारबर पुण्‍य मिलता है। वाजपेय यज्ञ एक वैदिक यज्ञ है जिसका वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। यह यज्ञ शौर्य प्रदर्शन एवं प्रजा के मनोरंजन हेतु किया जाता था। रमा एकादशी के दिन भगवान विष्‍णु के साथ माँ लक्ष्‍मी का पूजन करना बेहद शुभ और मंगलकारी माना जाता है, इससे दरिद्रता दूर भाग जाती है और घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है। रमा एकादशी धनतेरस से एक दिन पहले मनाई जाती है। हिन्‍दू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को ही रमा एकादशी कहते हैं।

रमा एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त

रमा एकादशी की तिथि: 24 अक्‍टूबर, 2019
एकादशी तिथि आरंभ: 24 अक्‍टूबर, 2019 को सुबह 01 बजकर 09 मिनट तक
एकादशी तिथि समाप्‍त: 24 अक्‍टूबर, 2019 को रात 10 बजकर 19 मिनट तक
द्वादश के दिन पारण का समय: 25 अक्‍टूबर, 2019 सुबह 06 बजकर 32 मिनट से सुबह 08 बजकर 45 मिनट तक
द्वादश तिथि समाप्‍त: 25 अक्‍टूबर, 2019 को शाम 07 बजकर 08 मिनट तक

रमा एकादशी की पूजा विधि

रमा एकादशी का व्रत करने वाले को एक दिन पहले यानी कि दशमी से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। व्रत के दिन सुबह जल्‍दी उठकर स्‍नान कर, स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करना चाहिए। एकादशी का व्रत निर्जला होता है। घर के मंदिर में विष्‍णु की प्रतिमा स्‍थापित करना चाहिए। विष्‍णु की प्रतिमा को तुलसी दल, फल, फूल और नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। अंत में विष्‍णु जी की आरती उतारना चाहिए और घर के सभी सदस्‍यों में प्रसाद वितरित करना चाहिए। रात के समय सोना नहीं चाहिए। भगवान का भजन-कीर्तन करना चाहिए। अगले दिन सुबह पारण के समय किसी ब्राह्मण या गरीब को यथाशक्ति भोजन करा कर उसे दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। इसके बाद अन्‍न और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करना चाहिए। राम एकादशी के दिन घर में सुंदर कांड का आयोजन करना शुभ माना जाता है।

रमा एकादशी व्रत के नियम

कांसे के बर्तन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मांसाहार भोजन, मसूर की दाल, चने व कोदों की सब्‍जी और शहद का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन सभी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। व्रत वाले दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए। न ही पान खाना चाहिए और न ही दातुन करना चाहिए। जो लोग एकादशी का व्रत नहीं कर रहे हैं उन्‍हें भी इस दिन चावल और उससे बने पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।

क्या है रमा एकादशी की व्रत कथा ?

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार प्राचीन दक्षिण कोसल का मुचुकुंद नाम का एक राजा था, जिसकी इंद्र, यम, कुबेर, वरुण और विभीषण के साथ मित्रता थी। राजा बड़ा धर्मात्मा, विष्णुभक्त और न्याय प्रिय था। राजा मुचुकुंद की एक कन्या थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। चंद्रभागा का विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। एक बार जब शोभन ससुराल आया, तो उसी समय रमा एकादशी आने वाली थी और दशमी के दिन राजा मुचुकुंद ने ढोल बजवाकर सारे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। जब व्रत का दिन समीप आ गया तो चंद्रभागा के मन में अत्यंत सोच उत्पन्न हुआ कि उसके पति अत्यंत दुर्बल हैं और पिता की आज्ञा अति कठोर थी। शोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा से कहा, “हे प्रिये! अब क्या करना चाहिए, मैं किसी प्रकार भी भूख सहन नहीं कर सकूंगा। ऐसा उपाय बतलाओ कि जिससे मेरे प्राण बच सकें, अन्यथा मेरे प्राण अवश्य चले जाएंगे।” तब चंद्रभागा ने कहा, “हे स्वामी! मेरे पिता के राज में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। हाथी, घोड़ा, ऊंट, बिल्ली, गौ आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं कर सकते, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है। यदि आप भोजन करना चाहते हैं, तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहीं रहना चाहते हैं, तो आपको अवश्य व्रत करना पड़ेगा।” ऐसा सुनकर शोभन कहने लगा, “हे प्रिये! मैं अवश्य व्रत करूंगा, जो भाग्य में होगा, वह देखा जाएगा।” इस प्रकार से विचार कर शोभन ने व्रत रख लिया और वह भूख व प्यास से अत्यंत पीड़ित होने लगा। सूर्य नारायण अस्त हो गए और रात्रि को जागरण का समय आया, जो वैष्णवों को अत्यंत हर्ष देने वाला था, परंतु शोभन के लिए अत्यंत दु:खदायी था। प्रात:काल होते ही शोभन के प्राण निकल गए। राजा मुचुकुंद ने सुगंधित काष्ठ से उसका दाह संस्कार करवाया। शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के बाद चंद्रभागा अपने पिता के घर में ही रहने लगी।

रमा एकादशी के प्रभाव से चंद्रभागा के पति शोभन को मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से युक्त तथा शत्रुओं से रहित एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ। वह अत्यंत सुंदर रत्न और वैदुर्यमणि जटित स्वर्ण के खंभों पर निर्मित अनेक प्रकार की स्फटिक मणियों से सुशोभित भवन में बहुमूल्य वस्त्राभूषणों तथा छत्र व चंवर से विभूषित, गंधर्व और अप्सराओं से युक्त सिंहासन प्राप्त हुआ। सिंहासन पर शोभायमान शोभन ऐसा दिखता था मानो दूसरा इंद्र विराजमान हो। एक समय राजा मुचुकुंद को नगर में रहने वाला एक सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ मंदराचल पर्वत जा पहुँचा और उसने शोभन को पहचान लिया। सोम शर्मा ने मन में कहा, अरे ये तो राजा का जमाई शोभन है, ब्राह्मण उसके निकट गया। शोभन भी उसे पहचान कर अपने आसन से उठकर उसके पास आया और प्रणामादि करके कुशल प्रश्न किया। ब्राह्मण ने शोभन से कहा, “राजा मुचुकुंद और आपकी पत्नी कुशल से हैं। नगर में भी सब प्रकार से कुशल है, परंतु हे राजन! हमें आश्चर्य हो रहा है। आप अपना वृत्तांत कहिए कि ऐसा सुंदर नगर, जो न कभी देखा, न सुना, आपको कैसे प्राप्त हुआ ?

शोभन ने ब्राह्मण से कहा, कार्तिक कृष्ण की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह नगर प्राप्त हुआ, परंतु यह अस्थिर है। यह स्थिर हो जाए ऐसा उपाय कीजिए। ब्राह्मण कहने लगा, “हे राजन! यह स्थिर क्यों नहीं है और कैसे स्थिर हो सकता है आप बताइए, फिर मैं अवश्यमेव वह उपाय करूँगा। मेरी इस बात को आप मिथ्या न समझिए।” शोभन ने कहा, “मैंने इस व्रत को श्रद्धारहित होकर किया है। अत: यह सब कुछ अस्थिर है। यदि आप मुचुकुंद की कन्या चंद्रभागा को यह सब वृत्तांत कहें, तो यह स्थिर हो सकता है।” ऐसा सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने नगर लौटकर चंद्रभागा से सब वृत्तांत कह सुनाया। ब्राह्मण के वचन सुनकर चंद्रभागा बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण से कहने लगी, “हे ब्राह्मण! ये सब बातें आपने प्रत्यक्ष देखी हैं या स्वप्न की बातें कर रहे हैं।” ब्राह्मण कहने लगा, “हे पुत्री! मैंने महावन में तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है। साथ ही किसी से विजय न हो ऐसा देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिर नहीं है। जिस प्रकार वह स्थिर रह सके सो उपाय करना चाहिए।” चंद्रभागा कहने लगी, “हे विप्र! तुम मुझे वहाँ ले चलो, मुझे पतिदेव के दर्शन की तीव्र लालसा है। मैं अपने किए हुए पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूँगी। आप ऐसा कार्य कीजिए जिससे उनका हमारा संयोग हो, क्योंकि वियोगी को मिला देना महान पु्ण्य है।”

ब्राह्मण चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर गया। वामदेवजी ने सारी बात सुनकर वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का अभिषेक कर दिया। ऋषि के मंत्र के प्रभाव और एकादशी के व्रत से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और वह दिव्य गति को प्राप्त हुई। इसके बाद बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने पति के निकट गई। अपनी प्रिय पत्नी को आते देखकर शोभन अति प्रसन्न हुआ और उसे बुलाकर अपनी बाईं तरफ बिठा लिया। चंद्रभागा ने अपने पति से कहा, “हे प्राणनाथ! आप मेरे पुण्य को ग्रहण कीजिए। अपने पिता के घर, जब मैं 8 वर्ष की थी, तब से विधिपूर्वक एकादशी के व्रत को श्रद्धापूर्वक करती आ रही हूँ। इस पुण्य के प्रताप से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और समस्त कर्मों से युक्त होकर प्रलय के अंत तक रहेगा।” इस प्रकार चंद्रभागा दिव्य आभू‍षणों और वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने पति के साथ आनंदपूर्वक रहने लगी।

You may have missed