बापू का बुलावा आते ही परीक्षा छोड़ अहमदाबाद आ पहुँचा था 21 वर्ष का वह ‘युवक’ !

* आचार्य विनोबा भावे की 124वीं जयंती पर विशेष

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 11, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। अनंत काल तक भारत में उन सभी महान देश भक्तों की गाथाएँ गूँजती रहेंगी, जिन्होंने माँ भारती के तिरंगे को अपने खून से सींचा है, अपने रक्त की हर बूंद से माँ भारती की आज़ादी का इतिहास लिखा है। ऐसे ही महान देशभक्तों में से एक थे महान विचारक और विद्वान आचार्य विनोबा भावे, जिनकी आज 124वीं जयंती है। आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले, और गणित व रसायन विज्ञान में विशेष रूचि लेने वाले विनोबा भावे चितपावन ब्राह्मण परिवार से थे। चितपावन का अर्थ होता है, जिनका चित्त पवित्र हो। विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था।

विनोबा भावे 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में गागोदा गाँव में एक निर्धन परिवार में जन्म हुआ था। पिता नरहरि संभु राव एक रंग व्यापारी थे। वे अधिकतर रंगों की खोज में घर से दूर बाहर ही रहते थे, वहीं माता रूकमणि देवी सदा ईश्वर में लीन रहने वाली सुसंस्कृत महिला थीं। माता के धार्मिक प्रवित्ति की होने के कारण विनोबा का मन भी बचपन से ही भक्तिभाव में लीन रहने लगा। बहुत ही छोटी-सी आयु में विनोबा श्रीमद् भगवद् गीता पढ़ने लगे। गीता में लिखे उपदेशों से विनोबा इतने प्रभावित हुए कि उनके मन में वैराग्य जागने लगा और गृहस्थ जीवन से विरक्ति आने लगी। यह फरवरी-1916 की बात है, जब विनोबा हाईस्कूल में पढ़ाई कर रहे थे। यह वह दौर था, जब देश में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन का आगाज़ हुआ था। इसी दौरान विनोबा भावे ने एक स्थानीय समाचार पत्र में महात्मा गांधी के भाषण के कुछ अंश पढ़े।

जब गांधीजी ने कटु सत्य से किया प्रहार

महात्मा गांधी ने यह भाषण 6 फरवरी, 1916 को बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय (BHU) के उद्घाटन समारोह में दिया था। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद यह गांधीजी का पहला स्वयंस्फूर्त भाषण था, जिसमें उन्होंने अपने सत्य पर आधारित वाक्यों से वहाँ मौजूद राजा-महाराजाओं से लेकर अंग्रेजी हुकू़मत को हिला डाला। सबसे पहले तो गांधीजी ने बीएचयू के उद्घाटन समारोह की कार्रवाई एक विदेशी भाषा अंग्रेजी में चलाए जाने पर आपत्ति की और दु:ख जताया। फिर उन्होंने काशी विश्वविद्यालय मंदिर की गलियों में व्याप्त गंदगी की आलोचना की। इसके बाद उन्होंने मंच पर और सामने विराजमान रत्नजड़ित आभूषणों से दमकते राजाओं-महाराजाओं की उपस्थिति को ‘बेशकीमती जेवरों की भड़कीली नुमाइश’ बताते हुए उन्हें देश के असंख्य दरिद्रों की दारूण स्थिति का ध्यान दिलाया। उन्होंने जोड़ा कि जब तक देश का अभिजात्य वर्ग इन मूल्यवान आभूषणों को उतार कर उसे देशवासियों की अमानत समझते हुए पास नहीं रखेगा, तब तक भारत की मुक्ति संभव नहीं होगी। गांधीजी ने घोषित किया कि भारत को मुक्ति वकीलों, डॉक्टरों, धनपतियों और समृद्ध जमीदारों से नहीं, बल्कि किसानों के उठ खड़े होने के बाद ही प्राप्त होगी। उन्होंने शहर के चप्पे-चप्पे पर वॉयसराय की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस और चौकसी व्यवस्था को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि ऐसा सुरक्षित जीवन ‘जीवित मृत्यु’ के समान है, जिसकी तुलना में हत्या कई मायने में बेहतर होगी।’

गांधीजी के सत्य वचन विनोबा को अहमदाबाद खींच लाए

गांधीजी के सत्य वचनों ने 21 वर्षीय युवा विनोबा को भीतर से झकझोर दिया और विनोबा का मन इस व्यक्ति से मिलने को व्याकुल हो उठा। फिर क्या था, विनोबी ने तत्काल एक पत्र महात्मा गांधी को लिखा और उनसे मिलने की इच्छा जताई। महात्मा गांधी ने विनोबा को अनुमति देते हुए अपने अहमदाबाद में पालडी के कोचरब गाँव में स्थित ‘सत्याग्रह आश्रम’ (कोचरब आश्रम) बुलाया। बापू का बुलावा मिलते ही विनोबा खुशी से उछल पड़े। न उन्हें परिवार याद रहा और न ही ये याद रहा की उनकी हईस्कूल की परिक्षा हो रही है। विनोबा हाईस्कुल की परीक्षा बीच में ही छोड़कर 7 जून, 1916 को गांधीजी से मिलने अहमदाबाद आ पहुँचे। गांधीजी से पहली ही मुलाक़ात ने विनोबा को इतना प्रभावित किया कि विनोबा अपनी जन्म भूमि छोड़ कर कोचरब आश्रम में ही बस गए। वे आश्रम में गांधीजी के कार्यों में हाथ बँटाने लगे। गांधीजी से हुई अपनी पहली भेंट पर विनोबा भावे ने लिखा है, ‘जिन दिनों में काशी में था, मेरी पहली अभिलाषा हिमालय की कंदराओं में जाकर तप-साधना करने की थी और दूसरी अभिलाषा बंगाल के क्रांतिकारियों से भेंट करने की, परंतु मेरी एक भी अभिलाषा पूरी न हुई। मेरी दोनों अभिलाषाएँ उस समय पूर्ण हो गईं, जब मैं गांधीजी से मिला। गांधी के व्यक्तित्व में हिमालय जैसी शांति और बंगाल की क्रांति की धधक मौजूद थी।’

विनोबा बन गए गांधीजी के लिए विशेष

आश्रम में गांधीजी और विनोबाजी के संबंध लगातार प्रगाढ़ होते चले गए। विनोबा ने खुद को गांधीजी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया। विनोबा पर गांधी का प्रभाव दिन प्रति दिन बढ़ता गया, तो दूसरी तरफ कोचरब आश्रम में कार्यकर्ताओं की संख्या भी तेजी से बढ़ रही थी। अब यह आश्रम छोटा पड़ने लगा, तो महात्मा गांधी ने विनोबा भावे को 8 अप्रैल 1923 को वर्धा सेवाश्रम, महाराष्ट्र भेज दिया। वहाँ विनोबाजी ने ‘महाराष्ट्र धर्म’ मासिक का संपादन शुरू किया। मराठी में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में विनोबा ने नियमित रूप से उपनिषदों और महाराष्ट्र के संतों पर लिखना आरंभ किया। इसके साथ ही देश में भक्ति आंदोलन की शुरुआत हुई। पत्रिका के माध्यम से लोगों के बीच विनोबाजी की आध्यात्मिक गहराई का भी प्रचार-प्रसार होने लगा। इसके बाद गांधीजी के हर कार्य में विनोबा का योगदान महत्वपूर्ण बन गया। गांधीजी अपनी हर योजना में सर्वप्रथम विनोबा को ही सर्वोपरि मानते थे और उन्हें कोई भी कार्य सौंपने में संदेह या संकोच नहीं करते थे।

गांधीजी ने विनोबा को बनाया प्रथम सत्याग्रही

एक तरफ भारत में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, तो दूसरी तरफ 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। भारत पर राज कर रहे ब्रिटिश शासकों ने अपने स्वार्थ के लिए भारत को इस युद्ध में जबरन झोंका, जिसके विरुद्ध गांधीजी ने 17 अक्टूबर 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत की और विनोबाजी को इस आंदोलन का प्रथम सत्याग्रही बनाया। विनोबा ने पवनार आश्रम महाराष्ट्र से व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रारंभ किया। यह सत्याग्रह 2 महीने बाद यानी 17 दिसंबर 1940 को समाप्त कर दिया गया। इसके बाद से विनोबा निरंतर समाज सेवा के कार्यों में लगे रहे। इस दैरान वे कई बार गिरफ़्तार भी किए गए। रचानात्मक कार्यों के अतिरित्क वे महान स्वतंत्रता सेनानी भी रहे। 1920 में नागपुर झंडा सत्याग्रह में वे बंदी बनाये गये, इसके बाद 1936 में गांधीजी जब लंदन के गोलमेज सम्मेलन से खाली हाथ लौटे, तो जलगाँव में विनोबा भावे ने एक सभा में अंग्रेजों की आलोचना की, जिसके चलते उन्हें छह माह की जेल हुई।

विनोबा का सबसे बड़ा भूदान आंदोलन

गांधीजी के पदचिन्हों पर चलने वाले विनोबाजी ने लोगों के उत्थान और देश हित के लिए आंदोलनों को ही अपना हथियार बनाया। ग़रीब जनता की भलाई के लिए विनोबाजी ने 8 अप्रैल, 1951 को भूदान आंदोलन शुरू किया। तेलंगाना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में आरंभ किए गए भूदान आंदोलन के अंतर्गत विनोबाजी पदयात्राएँ करते और गाँव-गाँव जाकर बड़े भूस्वामियों से अपनी जमीन का कम से कम छठा हिस्सा भूदान के रूप में भूमिहीन किसानों को देने की प्रार्थना करते। 1953 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) के नेता जयप्रकाश नारायण भी इस आंदोलन से जुड़ गए। पीएसपी भारत का एक राजनीतीतिक दल था, जिसकी स्थापना 1952 में की गई थी। इस पार्टी का निर्माण समाजवादी पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी के विलय के परिणामस्वरूप हुआ था। आंदोलन के शुरुआती दिनों में विनोबा ने तेलंगाना क्षेत्र के करीब 200 गांवों की यात्रा की, जिसके फलस्वरूप उन्हें 12,200 एकड़ भूमि दान में मिली। आंदोलन की गूंज उत्तर भारत तक पहुँची, जिसका बिहार और उत्तर प्रदेश में भी गहरा असर हुआ। मार्च-1956 तक दान के रूप में 40 लाख एकड़ से भी अधिक जमीन मिल चुकी थी, परंतु इसके बाद यह आंदोलन बिखरते हुए 1955 में समाप्त हो गया।

धर्म-अध्यात्म में गहरी रुचि

विनोबा भगवद् गीता से काफी प्रभावित थे। उनके विचार और प्रयास इस पवित्र पुस्तक के सिद्धांतों पर आधारित थे। उन्होंने लोगों के बीच सादगी से जीवन गुजारने और चकाचौंध से दूर रहने को बढ़ावा देने के लिए कई आश्रम खोले। विनोबा ने 1959 में महाराष्ट्र के पौनार में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से ब्रह्म विद्या मंदिर की स्थापना की। उन्होंने अपने जीवन के दौरान कई किताबें लिखीं। ज्यादातर किताबें अध्यात्म पर थीं। मराठी, तेलुगू, गुजराती, कन्नड़, हिंदी, उर्दू, इंग्लिश और संस्कृत समेत कई भाषाओं पर उनकी पकड़ थी। उन्होंने संस्कृत में लिखे कई शास्त्रों का सामान्य भाषा में अनुवाद किया। उनकी किताबों में स्वराज्य शास्त्र, गीता प्रवचन और शक्ति महत्वपूर्ण है। नवंबर 1982 में विनोबा गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्होंने अपने जीवन को त्यागने का फैसला लिया। उन्होंने खाना और दवाईयाँ लेना पूरी तरह से बंद कर दिया। अंततः 15 नवंबर, 1982 को देश के एक महान समाज सुधारक, विचारक, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे ने पंचमहाभूत की देह का त्याग कर इस सृष्टि से महाप्रयाण किया।

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