इस लड़की ने काजू खाकर नहीं, बेच कर खोला NASA में जाने का मार्ग….

* संघर्षों से भरी है निर्धन छात्रा जयलक्ष्मी की कहानी

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 23 दिसंबर, 2019 युवाPRESS। कहते हैं काजू-बादाम खाने से दिमाग तेज़ होता है, परंतु इस लड़की के प्रारब्ध में तो काजू खाना नहीं, अपितु बेचना लिखा था। लोगों की याददाश्त तेज करने का अचूक नुस्खा बेचने वाली इस लड़की की ऐसी आर्थिक हालत नहीं थी कि वह स्वयं काजू खाए, फिर भी उसका दिमाग आम छात्राओं से तेज था और यही कारण है कि उसने अपने इस तेज दिमाग के बल पर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA में जाने का अवसर प्राप्त करने में सफलता पाई। सही सुना आपने दूसरों को बादाम-काजू बेचकर इस लड़की ने नैशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (National Aeronautics and Space Administration) नासा जाने का अपना सपना पूरा किया है। इस लड़की का नाम है के. जयलक्ष्मी, जिसका चयन मई 2020 में नासा जाने के लिए हुआ है। इतना ही नहीं, जब यह बात भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation) यानी ISRO-इसरो को पता चली, तो इसरो के पूर्व वैज्ञानिक ने जयलक्ष्मी को इसरो आने का भी आमंत्रण दिया, बहुत जल्द जयलक्ष्मी इसरो भी जाएगी।

कक्षा 11 के विज्ञान विभाग में पढ़ने वाली जयलक्ष्मी ने अपने तेज़ दिमाग के बल पर एक ऑनलाइन परीक्षा में नासा जाने की प्रतियोगिता जीती है। दरअसल जयलक्ष्मी काजू बेचकर अपना घर चलाती है और के. जयलक्ष्मी को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा जाने का सपना था। लक्ष्मी ने प्रतियोगिता तो जीत ली, परंतु उसके पास नासा जाने के लिए पैसे नहीं थे। नासा प्रतियोगिता जीतने के कारण जयलक्ष्मी के कार्य की सराहना करने वाले उसके गाँव वालों ने तय किया कि उसके सपने को मरने नहीं देंगे और सब ने मिलकर जयलक्ष्मी के नासा जाने के लिए चंदे के जरिये टिकट का पैसा जुटाया।

तमिलनाडू में अदानाकोट्टई के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली जयलक्ष्मी के नासा जाने की कहानी भी अनोखी है। जयलक्ष्मी का कहना है कि वह कैरम मैच का अभ्यास कर रही थी, उसी दैरान सामने बोर्ड पर समाचार पत्र से काट कर लगाई गई एक ख़बर की कटिंग पर उनका ध्यान गया, जिसमें जे. धान्य थासनेम की स्टोरी छपी थी। तमिलनाडू की रहने वाली कक्षा 10 की छात्रा जे. धान्य थासनेम (J Dhaanya Thasnem) ने 2019 में राष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान प्रतियोगिता 2019 (National Space Science Contest 2019) जीत कर नासा जाने का अवसर प्राप्त किया था। समाचार पत्र में छपी उस ख़बर ने जयलक्ष्मी को बहुत प्रेरित किया और उसने तत्काल इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए ऑनलाइन परीक्षा में अपना पंजीकरण करा लिया। काजू बेच कर घर चलाने वाली ग़रीब परिवार की जयलक्ष्मी के सामने अब अंग्रेजी सबसे बड़ी चुनौती बन गई, परंतु उसके सपने और उसके दृढ़ संकल्प ने उसकी इस कमी को उसके मार्ग में आने नहीं दिया। जयलक्ष्मी ने 1 महीने तक रात-दिन अंग्रेजी का अभ्यास किया और परीक्षा में ग्रेड-2 लाकर नासा जाने का अवसर प्राप्त कर लिया।

जयलक्ष्मी का नासा जाने का सपना, तो पूरा हो गया, परंतु अब उसके सामने पैसे की समस्या आ खड़ी हुई, क्योंकि उसके पास अमेरिका जाने के लिए टिकट लेने और अन्य चीजों के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। जयलक्ष्मी को 27 दिसंबर तक पासपोर्ट के लिए पैसे जमा कराने थे। पर कहते हैं न जब आप सच्ची लगन से किसी चीज को पाने की कोशिश करते हो, तो भगवान भी आपकी सहायता अवश्य करते हैं। यही जयलक्ष्मी के साथ भी हुआ, उसकी सहायता के लिए उसका पूरा गाँव साथ आ गया। सबने 1.69 लाख रुपये चंदा एकत्र किया और जयलक्ष्मी को नासा जाने में सहयोग दिया। जयलक्ष्मी के शिक्षकों और साथी छात्रों ने ही नहीं, यहाँ तक कि पासपोर्ट अधिकारी ने भी 500 रुपये पासपोर्ट के लिए दिए।

जिलाधिकारी के आग्रह पर ओएनजीसी (ONGC) के कर्मचारी भी आगे आए और सबने अपने वेतन से 65 हजार रुपये का चंदा उसके लिए जमा किया। जयलक्ष्मी ने सोशल मीडिया के जरिये इसके लिए अपील की और पुदुकोटै की जिलाधिकारी पी. उमा माहेश्वरी सेमिल कर उनसे भी मदद की गुहार लगाई। सोशल मीडिया पर की गई अपील के जरिये लोग उसकी मदद के लिए आगे आए और आखिरकार वह पूरा पैसा जुटाने में सफल हो गई। जयलक्ष्मी को एक और खुशखबरी तब मिली, जब इसरो के पूर्व वैज्ञानिक व पद्मश्री से सम्मानित एम. अन्नादुरई ने उसे इसरो का दौरा कराने का वादा किया, जहाँ वह वैज्ञानिकों से मिल कर रॉकेट के उड़ने की प्रक्रिया की जानकारी ले सकेगी।

जयलक्ष्मी का जीवन बहुत ही कष्टों से भरा हुआ रहा है। पिछले वर्ष तमिलनाडु में आए गाजा चक्रवात के चलते उसका घर उजड़ गया और उसके साथ उसके घर की बिजली भी जाती रही। तूफान के बाद से वह और उसका परिवार बिजली के आभाव में ही जी रहा है। इतना ही नहीं वह अपने परिवार की एक मात्र कमाने वाली सदस्य है, क्योंकि उसके पिता लंबे समय से परिवार के साथ नहीं रहते और कभी-कभी ही पैसा भेजते हैं। वह काजू बेचने के अतिरिक्त कक्षा 8 और 9 के बच्चों को पढ़ा कर अपनी पढ़ाई और घर का खर्च पूरा करती है। जयलक्ष्मी मिसाइल मैन कलाम को अपना आदर्श मानती है। वह पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की तरह वैज्ञानिक बनकर रॉकेट बनाना चाहती है। इतनी विषम परिस्थितियों में भी जयलक्ष्मी की सफलता वास्तव में आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। उसकी इस सफलता ने सरकारी स्कूलों के बच्चों को भी मार्गदर्श दिया है।

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