विचित्र, किंतु सत्य : जिसने खोज़ा ‘भुलक्कड़ी’ का रहस्य, उसका नाम ही बन गया ‘रोग’ !

* विश्व में 5 करोड़ लोग अल्ज़ाइमर से पीड़ित

* 8वें विश्व अल्ज़ाइमर दिवस पर विशेष

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 21, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। हमारी स्मृतियाँ हमारे व्यक्तित्व का एक प्रमुख अंग हैं। जिस प्रकार भाषा, दृष्टि, श्रवण, प्रत्यक्षीकरण, अधिगम और ध्यान मानव मस्तिष्क की क्षमता हैं, उसी प्रकार स्मृति यानी याद (Memory) भी मस्तिष्क की एक प्रमुख बौद्धिक क्षमता है। हम क्या याद रखते हैं और क्या भूल जाते है, यह कई चीज़ों पर निर्भर करता है। हमारे मस्तिष्क में जो कुछ भी अनुभव, सूचना और ज्ञान के रूप में संग्रहित है, वह सभी स्मृति के ही विविध रूप हैं। युवा अवस्था के दौरान हमें हमारे साथ घटित होने वाली लगभग सभी घटनाएँ याद रहती हैं, परंतु जैसे-जैसे हम युवावस्था के पार प्रौढ़ावस्था व वृद्धावस्था की ओर बढ़ते हैं, हम इंद्रियों के क्षीण होने सहित कई शारीरिक बीमारियों से घिरने लगते हैं, परंतु उन सभी बीमारियों से अलग एक बीमारी ऐसी भी है, जो मस्तिष्क से जुड़ी हुई है, जिसमें इंसान को चीज़ों और घटनाओं को भूलने लगता है। स्मृति से जुड़ी बीमारी इस रोग का नाम है अल्ज़ाइमर (Alzheimer), जिसे साधारण आम भाषा में ‘भूलने का रोग’ कहते हैं। आज दुनिया में रोजमर्रा की बातों को भूलने की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है, हालाँकि यह बीमारी 60 वर्ष के लोगों में अधिक होती है, परंतु कुछ समय से इस बीमारी ने युवाओं को भी शिकार बनाना शुरू कर दिया है। आधुनिक विज्ञान की यह लाचारी है कि वह अब तक इस बीमारी यानी अल्ज़ाइमर का कोई स्थायी इलाज नहीं खोज सका है।

विस्मृति का शिकार बनाने वाले रोग अल्ज़ाइमर के बारे में हम इसलिए बात कर रहे हैं, क्योंकि आज विश्व अल्ज़ाइमर दिवस (World Alzheimer’s Day) है। इसकी शुरुआत 21 सितंबर, 2012 को विश्व अल्ज़ाइमर माह जागरूकता अंतरराष्ट्रीय अभियान शुरू करने के साथ की गई थी और आज 8वाँ विश्व अल्ज़ाइमर दिवस दिवस है, जिसका उद्देश्य लोगों को अल्ज़ाइमर रोग के बारे में जागरूक करना है। आज दुनिया भर में 5 करोड़ से अधिक लोग अल्ज़ाइमर रोग से पीड़ित हैं। अल्ज़ाइमर डिसीज़ इंटरनेशनल (ALZ) के अनुसार, दुनिया भर में प्रति वर्ष 90 लाख 90 हजार लोग अल्ज़ाइमर की चपेट में आ रहे हैं।

अल्ज़ाइमर ने खोज़ा था ‘अल्ज़ाइमर’

अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease) यानी ‘भूलने का रोग’, उसी चिकित्सक के नाम पर रखा गया, जिन्होंने इस बीमारी की खोज़ की। उनका नाम है DR. Alois Alzheimer। डॉ. अलॉइस अल्ज़ाइमर जर्मन मनोचिकित्सक, न्यूरोपैथोलॉजिस्ट और एमिल क्रैपेलिन थे। उन्होंने पहले इस रोग का नाम “प्रीसेनिल डिमेंशिया” नाम गया था, परंतु 1910 के बाद से प्रीसेनिल डिमेंशिया को अल्ज़ाइमर रोग कहा जाने लगा। इसके खोजकर्ता डॉ. अलॉइस अल्ज़ाइमर का जन्म 14 जून, 1864 को जर्मनी स्थित बवेरिया के मार्कटब्रिट में जोहान बारबरा सबीना और एडुआर्ड रोमैन अल्ज़ाइमर के घर हुआ था। उनके पिता पब्लिक नोटरी (Public Notary) के कार्यालय में काम करते थे। अलॉइस अल्ज़ाइमर ने 1883 में स्नातक करने के बाद बर्लिन विश्वविद्यालय, ट्युबिंगन विश्वविद्यालय और अमेरिका में चिकित्सा का अध्ययन किया। उन्होंने 3 नवंबर, 1906 को दक्षिण-पश्चिम जर्मन मनोचिकित्सकों की तुबिंगेन बैठक में सार्वजनिक रूप से मस्तिष्क विकृति के लक्षण और प्रीसेनिल डिमेंशिया यानी अल्ज़ाइमर के लक्षणों का विवरण दिया, परंतु इस व्याख्यान में उपस्थित लोगों ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और प्रीसेनिल डिमेंशिया पर बिना किसी प्रश्न या टिप्पणी के डॉ. अलॉइस को पैथोलॉजी की खोज़ पर भेज दिया गया। व्याख्यान के बाद अलॉइस ने अपने व्याख्यान का सारांश देते हुए 1907 में एक छोटा पत्र प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने इस बीमारी और उनके निष्कर्षों का विवरण देते हुए एक शोध पत्र लिखा। 1910 तक इस बीमारी को प्रीसेनिल डिमेंशिया ही कहा जाता था, परंतु जब क्रैपेलिन ने अपने हैंडबुक ऑफ साइकियाट्री के 8वें संस्करण में “प्रीसेनिल और सेनील डिमेंशिया” के अध्याय में इसका नाम अल्ज़ाइमर दिया, तब से इसे अल्ज़ाइमर रोग कहा जाने लगा। अगस्त 1912 में, अल्ज़ाइमर ब्रेस्लो विश्वविद्यालय के रास्ते में ट्रेन में गिर गए। लंबी बीमीरी के बाद 19 दिसंबर, 1915 को 51 साल की उम्र में ब्रेस्लाउ, सिलेसिया (वर्तमान में व्रोकला, पोलैंड) में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई।

क्या है अल्ज़ाइमर, जो भुला देता है सब कुछ ?

अल्ज़ाइमर बीमारी में लोगों की याददाश्त कम होने लगती है। ऐसे मरीजों को निर्णय लेने, बोलने और यहाँ तक कि किसी को पहचानने में भी परेशानी होती है, जिस कारण उन्हें सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अल्ज़ाइमर रोग में जब कोशिकाओं का उद्योग का हिस्सा काम करना बंद कर देता है, जिससे दूसरे कामों पर भी असर पड़ता है। जैसे-जैसे नुकसान बढ़ता है, कोशिकाओं में काम करने की शक्ति कम होती जाती है और अंततः वे मर जाती हैं। स्नायु या तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाने और मारने वाले दो संदिग्ध तत्व सेनील पट्टिका (Senile plaques) और लट या न्यूरोफिब्रिलरी उलझन (Neurofibrillary tangle) होते हैं। प्लेक स्नायु तंत्र के बीच में बनते हैं। टैंगल मरती हुई कोशिकाओं में रेशे के रूप में पाये जाते हैं और लोगों में उम्र बढ़ने के साथ ही प्लेक और टैंगल अधिक मात्रा में बनने लगते हैं। अल्ज़ाइमर के रोगी में प्लेक और टैंगल मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में अधिक बनते हैं, जहाँ सीखने और याद रखने की क्षमता होती है और बाद में यह दूसरे क्षेत्रों में फैलते हैं। रक्तचाप, मधुमेह, आधुनिक जीवनशैली और सर पर चोट लग जाने के कारण यह बीमारी हो सकती है। मस्तिष्क के स्नायुओं के क्षरण से रोगियों की बौद्धिक क्षमता और व्यावहारिक लक्षणों पर भी असर पड़ता है। हम जैसे-जैसे वृद्ध होते जाते हैं, हमारी सोचने और याद करने की क्षमता भी कमज़ोर होती जाती है, परंतु हमारे दिमाग के काम करने की क्षमता में तेजी से बदलाव आना उम्र बढ़ने का सामान्य लक्षण नहीं है, अपितु इस बात का संकेत है कि हमारे दिमाग की कोशिकाएँ मर रही हैं। दिमाग में 100 अरब कोशिकाएँ (Neuron) होती हैं। प्रत्येक कोशिका बहुत सारी अन्य कोशिकाओं से संवाद कर एक नेटवर्क बनाती हैं। इस नेटवर्क का काम सोचना, सीखना-सिखाना और याद रखना होता है। अन्य कोशिकाएँ हमें देखने, सुनने, सूंघने और मांसपेशियों को चलने का निर्देश देती हैं। ये सभी काम करने के लिए मस्तिष्क की कोशिकाएँ यानी तंत्रिका लघु उद्योग की तरह काम करती हैं। वे सप्लाई लेती हैं, ऊर्जा पैदा करती हैं, अंगों का निर्माण करती हैं और बेकार चीजों को शरीर से बाहर निकालती हैं। कोशिकाएँ सूचनाओं को जमा करती हैं और फिर उनका प्रसंस्करण भी करती हैं। जब यही कोशिकाएँ काम करना बंद कर देती हैं, तब हम अल्ज़ाइमर रोग से ग्रस्त हो जाते हैं।

अल्ज़ाइमर रोग का उपचार

अल्ज़ाइमर रोग के कारण मस्तिष्क की क्षति को रोकने या धीमा करने का अभी तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं हो पाया है, परंतु ऐसी अनेक दवाएँ हैं, जो कुछ लोगों में डिमेंशिया के लक्षणों में अस्थायी तौर पर सुधार लाने में सहायता करती हैं। ये दवाएँ मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमीटरों में बढ़ोत्तरी करने के माध्यम से काम करती हैं। अनुसंधानकर्ता अल्ज़ाइमर एवं अन्य प्रगामी डिमेंशिया के बेहतर उपचार के तरीकों को खोजने में लगे हुए हैं। वर्तमान में, दर्जनों थैरेपी और फार्माकोलॉजिक उपचार जारी हैं, जो अल्ज़ाइमर से संबद्ध मस्तिष्क कोशिकाओं की मृत्यु को रोकने पर शोध कर रही हैं।

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