जब सुनंदा ने सुनाई कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार की ‘चीत्कार’, तो हर कोई रह गया स्तब्ध…

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 16 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। धारा 370 हटने के साथ ही जहाँ एक ओर कश्मीर में अमन, शांति और लोगों में प्रसन्नता का महौल है, वहीं दूसरी तरफ कश्मीर से जुड़े कुछ ऐसी दर्दनाक घटनाओं का खुलासा भी हो रहा है, जो अत्यंत चौंकाने वाली हैं। भारत के सबसे नज़दीके दुश्मन पाकिस्तान नज़दीकी इसलिए क्योंकि पाकिस्तान का जन्म भारत से ही हुआ है और भारत-पाकिस्तान का माता-संतान का संबंध अतिशोक्ति नहीं होगा। माता और संतान के इस युद्ध में माता तो कभी कु-माता नहीं बनी, परंतु संतान हर बार उसे आघात पहुँचाने का प्रयास करता रहता है। धारा 370 भी इसी का एक भयावह रूप था। फिलहाल तो 370 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों के चलते समाप्त कर दिया गया है और लोग सरकार के इस निर्णय से खुश भी हैं। भारत के लिए ये बहुत दुर्भाग्य की बात है कि दुश्मन तो दुश्मन उसके कुछ ऐसे अपने यानी यहाँ के रहने वालों ने समय-समय पर भारत को उजाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी, अब जब कश्मीर से धारा 370 समाप्त हो चुका है, तो वहाँ कि एक बेटी ने सुनंदा वशिष्ठ ने 29 वर्ष पूर्व हुए कश्मीर में एक भयानक घटना को लोगों तक पहुँचाया है। आइए जानते हैं कौन है सुनंदा वशिष्ठ और क्या है वह घटना ?

“मेरे दादाजी रसोई की चाकू और जंग लगी कुल्हाड़ी लेकर हमें मारने के लिए खड़े थे, ताकि वो हमें उस बर्बरता से बचा सकें, जो जिंदा रहने पर हमारा आगे इंतजार कर रही थी।” ये शब्द हैं कश्मीर की रहने वाली पेशे से पत्रकार सुनंदा वशिष्ठ के, जिन्होंने 19 जनवरी, 1990 को कश्मीरी में हिन्दुओं की बर्बरता से हुई हत्या की एक ऐसी कड़वी घटना सबके सामने प्रस्तुत की है, जिसे चाह कर भी भुल पाना असंभव है। 19 जनवरी की रात कश्मीर से अपना घर, संपत्ति छोड़कर भागे लोगों के मन में आज भी उस रात की टीस बाकी है, जब उन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथी का सामना किया था। लोगों ने अपनी आँखों के सामने बर्बरता से अपने ही लोगों को जिंदा जलते और मरते देखा था। गुरुवार, 14 नवंबर, 2019 को ऐसी ही अनगिनत घटनाओं को अपने दिल में समेट भारतीय स्तंभकार सुनंदा वशिष्ठ, टॉम लैंटॉस एचआर द्वारा आयोजित यूएस कांग्रेस की एक बैठक में भाग लेने के लिए वॉशिंगटन डीसी पहुँचीं, हालाँकि वहाँ जाने से पहले ही उन्होंने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दे दी थी कि आयोजन में वह केवल कश्मीर से जुड़े मद्दों पर ही बात करेंगी। वो भी ऐसे मुद्दे, जिनके विषय में लोगों ने कभी न सुना और न ही लोगों तक पहुँचाया गया। बैठक में सुनंदा ने जब कश्मीरी हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों के विषय में बोलना शुरू किया, तो पूरी सभा के साथ-साथ टेलिविज़न पर देख रहे श्रोता भी स्तब्ध रह गए। सुनंदा वशिष्ठ ने कहा, ’मैं कश्मीर घाटी के हिंदू समुदाय से आती हूँ, मैंने स्वयं 1990 के कश्मीर का वो दर्द सहा है, जब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने हज़ारों कश्मीरी पंडितों को अपना घर-बार छोड़ने पर विवश कर दिया था।

कश्मीर के हालातों की चश्मदीद सुनंदा ने 30 वर्ष पूर्व हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों को ISIS के स्तर की दहशत और बर्बता से जोड़ते हुए कहा, ” आज मुझे खुशी है कि यहाँ मानवाधिकारों की बैठक हो रही है, क्योंकि जब मैने और मेरे जैसों ने अपने घर और अपनी जिंदगी सब गँवा दी थी, तब पूरा विश्व शांत था।” सुनंदा वशिष्ठ ने आक्रोशपूर्ण में लोगों से पूछा कि कहाँ थे वो लोग, जब 19 जनवरी 1990 की रात घाटी की हर मस्जिद से एक ही आवाज़ आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, परंतु बिना किसी हिंदू मर्द के ?” सुनंदा ने आगे कहा, “इंसानियत के रखवाले उस समय कहाँ थे, जब मेरे दादाजी रसोई की चाकू और जंग लगी कुल्हाड़ी लेकर हमें मारने के लिए हमारे सामने केवल इसलिए खड़े थे, ताकि वो हमें उस बर्बरता से बचा सकें, जो ज़िंदा रहने पर हमारा इंतज़ार कर रही थी।” सुनंदा ने अपने संबोधन में ये भी कहा कि उस रात लोगों को आतंकियों ने केवल 3 विकल्प दिए थे, एक कश्मीर छोड़कर भाग जाओ, दूसरा धर्मांतरण कर लो और तीसरा मर जाओ। सुनंदा वशिष्ठ ने आगे कहा, “उस रात लगभग 4 लाख कश्मीरी हिन्दुओं ने दहशत में आकर अपनी घर-संपत्ति सब जस का तस छोड़ दिया और स्वयं को बचाने के लिए वहाँ से भाग निकले।”

संबोधन के दौरान सुनंदा ने गिरिजा टिक्कू जैसी औरतों का भी जिक्र किया, जिनका अपहरण उनके साथ सामूहिक बलात्कार किये गये और जिन्हें टुकड़ों में काटकर फेंक दिया गया। उन्होंने बीके गंजू जैसे बहादूर बलिदानियों के बारे में लोगों को बताया, जिन्हें अपने पड़ोसियों पर विश्वास करने के बदले केवल विश्वासघात मिला और जिन्हें चावल कंटेनर में ही गोली मार दी गई इतना ही नहीं, उनकी पत्नी को बीके के रक्त से सने चावल भी खिलाये गये थे। दरअसल आतंकियों के डर से वो एक चावल के कंटेनर में छिप गए, परंतु उनके एक पड़ोसी ने इसकी सूचना आतंकियों को दे दी, इससे पहले की बीके गूंज वहाँ से बाग पाते उन्हें गोली मार दी गई। उनकी शहादत की याद में कश्मीर में एक बीके गूंज पार्क भी बनाया गया है। अंत में सुनंदा ने कहा, “मेरे पिता एक कश्मीरी हिन्दू हैं, मेरी माता कश्मीरी हिन्दू हैं और मैं भी एक कश्मीरी हिन्दू ही हूँ।”

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