‘फूले’ ने अस्पृश्यता के कीचड़ में खिलाए मानवता के फूल

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 28 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत में 19वीं शताब्दी को धार्मिक एवं सामाजिक पुनर्जागरण का समय-काल माना जाता है। इस दौरान ईस्ट इण्डिया कंपनी की पाश्चात्य शिक्षा पद्धति से भारतीय युवक का मन चिन्तनशील हो उठा था। युवा और वृद्ध सब इस विषय पर सोचने के लिए विवश हो गये थे। पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित लोगों ने हिन्दू सामाजिक रचना, धर्म, रीति-रिवाज और परम्पराओं को तर्कों की कसौटी पर कसना आरम्भ किया था। इसके परिणाम स्वरूप सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों का जन्म हुआ। प्रबुद्ध भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक सुधारकों, सुधारवादी प्रचारकों को भारतीय समाज को नवजीवन प्रदान करने का श्रेय दिया जाता है। इन्हीं में से एक थे महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले (Mahatma Jyotirao Govindrao Phule)। उन्होंने महिलाओं और दलितों के उत्थान के लिये अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये। इतना ही नहीं, समाज के सभी वर्गों को शिक्षित करने के लिये उनके द्वारा किये गये प्रयास आज भी याद किये जाते हैं। ज्योतिराव भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के कट्टर विरोधी थे। आज हम उन्हें इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 129वीं पुण्यतिथि है। ज्योतिराव गोविंदराव फुले 28 नवंबर, 1890 को पुणे में इस नश्वर संसार को अलविदा कह गये। ज्योतिराव फुले को ज्योतिबा फूले के नाम से भी जाना जाता है। ज्योतिबा फूले एक ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्हें जाति-धर्म का दंश कभी स्पर्श नहीं कर पाया। उन्होंने अपना समग्र जीवन मानवोद्धार में लगा दिया था। वे एक भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे।

ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को ब्रिटिश भारत के (अब महाराष्ट्र में) पूना (अब पुणे) के सतारा स्थित काटगुण गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविन्दराव और माता का नाम चिमणाबाई था, जो पारंपरिक रूप से बागवानी से जुड़े थे। उनके परिवार की गणना हिन्दू समाज प्रणाली के शूद्र वर्ण में की जाती थी। परिवार का मूल उपनाम गोरहे था। उनका पूरा परिवार जीवनयापन करने के लिए सतारा से फूल लाकर पुणे में गजरा बना कर बेचता था। इसी कारण उनके परिवार के लोग फूले अर्थात फूल वाले कहलाए। ज्योतिबा फुले ने मराठी भाषा से अध्ययन शुरू किया था, परंतु घर की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी माध्यम से 7वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। 1840 में ज्योतिबा फुले का विवाह सावित्री बाई से हुआ था, जो एक प्रसिद्ध समाजसेवी थीं। आगे चल कर दोनों ने दलित और स्‍त्री-शिक्षा के लिए कई कार्य किये। उन दिनों महाराष्ट्र में धार्मिक सुधार आंदोलन जोरों पर था। जाति-प्रथा का विरोध करने और एकेश्‍वरवाद को अमल में लाने के लिए ‘प्रार्थना समाज’की स्थापना की गई थी, जिसके प्रमुख गोविंद रानाडे और आरजी भंडारकर थे। स्त्रियों की शिक्षा को लेकर भी लोग उदासीन थे। ऐसे में ज्योतिबा फुले ने समाज को इन कुरीतियों से मुक्त करने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाया। इस प्रकार उन्होंने एक प्रकार से अस्पृश्यता के कीचड़ में भी मानवता के फूल खिलाए थे। उन्होंने महाराष्ट्र में सर्वप्रथम महिला शिक्षा और अछूतोद्धार का काम आरंभ किया था। 1848 में उन्होंने पुणे में बालिकाओं के लिए भारत का पहला विद्यालय खोला था। कुछ लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा भी की थी, परंतु फुले आगे बढ़ते गये। इस पर लोगों ने उनके पिता पर दबाव डाल कर उन्हें और उनकी पत्नी को घर से निकलवा दिया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका तो अवश्य, परंतु शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के लिए 3 नये स्कूल खोल दिये।

शूद्र एवं पिछड़े जाति के लोगों को विमुक्त करने के उद्देश्य से ज्योतिबा फुले ने 24 सितंबर, 1863 को सत्यशोधक समाज की नींव रखी। इस समाज की स्थापना के पीछे एक बेहद मार्मिक घटना जुड़ी है। दरअसल ज्योतिबा फूले अपने एक ब्राहमण मित्र के विवाह प्रसंग में शामिल होने के लिए गये थे, परंतु वहाँ उन्हें जातिगत भेदभाव और वैमनस्यता के कारण बुरी तरह अपमानित किया गया और धक्के मार कर विवाह मंडप से बाहर निकाल दिया गया। घर आकर उन्होंने अपने पिताजी से इसका कारण पूछा, तब पिता गोविन्दराव ने कहा कि, “ब्राह्मण-भूदेव (धरती के देवता) हैं। ऊँची जाति के लोग हैं और हम लोग नीची जाति के हैं। अतः हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते।” ज्योतिबा फूले ने अपने पिता से बहस की और कहा, “मैं उन ब्राह्मणों से अधिक साफ़-सुथरा था। मेरे कपड़े भी उनसे अधिक अच्छे थे। मैं उनसे अधिक पढ़ा-लिखा और होशियार भी हूँ तथा हम उनसे अधिक धनवान भी हैं। फिर मैं उनसे नीचा कैसे हो गया ?” पिता नाराज़ होकर बोले, “ये मुझे नहीं पता परंतु यह सदियों से होता आ रहा है।’ हमारे सभी धर्म ग्रंथों एवं शास्त्रों में यही लिखा है और हमें भी यही मानना पड़ेगा, क्योंकि यही परम्परा व परम सत्य है।” ज्योतिबा फूले सोच में पड़ गये। उनका मन और मस्तिष्क मंथन करने लगा कि “धर्म तो जीवन का आधार है। फिर भी धर्म को बताने वाली पुस्तकों, धर्म ग्रंथों, शास्त्रों में ऐसा क्यों लिखा है ? यदि सभी जीवों को भगवान ने बनाया है, तो मनुष्य-मनुष्य में भेद क्यों ? कोई ऊँची जाति, कोई नीची जाति का कैसे हो गया ? यदि ये हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है और जिसके कारण समाज में इतनी विषमता व छुआछूत फैली है, तो यह परम सत्य कैसे हुआ ? यह तो असत्य है। यदि यह असत्य है, तो मुझे (ज्योतिबा फूले) सत्य की खोज करनी होगी और समाज को बताना होगा। इन्हीं विचारों और मंथन के साथ उन्होंने एक संगठन बनाया और उसका नाम “सत्यशोधक समाज” अर्थात सच को खोजने वाला समाज (Society to research on social Truths) रखा।

ज्योतिबा फुले ने कई छोटे-छोटे आंदोलन जारी रखे। सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर लोगों को परतंत्रता से मुक्त किया। लोगों में नये विचार, चिंतन की शुरुआत हुई। उनके इन्हीं कार्यों के लिए 1888 में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की गई। उनके कहे विचार आज भी लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने कहा था, “भारत में राष्ट्रीयता की भावना का विकास तब तक नहीं होगा, जब तक खान-पान एवं वैवाहिक सम्बन्धों पर जातीय बंधन बना रहेगा।” ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया, जिसे मुंबई हाईकोर्ट से मान्यता भी दी गई। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। धर्म, समाज और परम्पराओं के सत्य को सामने लाने हेतु उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखी, जिनमें गुलामगीरी, तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत प्रमुख हैं। महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण ही सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’पास किया था।

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