बाघ में ऐसा क्या है, जिसे उसने सिंह के स्थान पर राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिलाया ?

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 18 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। प्राचीन काल में बाघ या टाइगर का शिकार राजा-महाराजाओं की शान समझा जाता था, जिसका परिणाम ये हुआ कि शिकार को लोगों ने शौक बना लिया और लगातार बाघों की संख्या में गिरावट आने लगी। आज विश्व में कुल 6 हज़ार बाघ और भारत में लगभग 3 हज़ार बाघ शेष बचे हैं। बाघ का वैज्ञानिक नाम है पैंथेरा टाइग्रिस टाइग्रिस (Panthera Tigris Tigris) और भारत में बाघ को साधारण भाषा में रॉयल बंगाल टाइगर (Royal Bengal Tiger) के नाम से जाना जाता है। हम बाघ की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि ये तो हम सभी जानते हैं कि टाइगर को भारत के राष्ट्र पशु का सम्मान प्राप्त है, परंतु कम ही लोग जानते हैं कि टाइगर को ही क्यों भारत का राष्ट्र पशु चुना गया, तो आइए जानते कब और कैसे टाइगर भारत का राष्ट्रीय पशु बन गया ?

राजसी बाघ, तेंदुआ, टाइग्रिस पीले रंगों की धारीदार और लोमचर्म वाला जानवर है। बाघ अपनी शालीनता, दृढ़ता, स्फूर्ति और अपार शक्ति के लिए विश्व प्रसिद्ध है। बाघ के अपने इन्हीं गुणों के कारण 1973 में भारत का राष्ट्र पशु घोषित किया गया। इससे पूर्व 1972 तक सिंह (शेर) को भारत के राष्ट्र पशु की उपाधि प्राप्त थी। अप्रैल 1973 में बाघ को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करने के साथ ही इसके संरक्षण के लिए ‘बाघ परियोजना’ प्रारम्भ की गई। भारत में बाघों की घटती संख्या को देखते हुए हुई ही इस प्रोजेक्ट टाइगर की शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य भारत में बाघों की संख्या में वृद्धि करना था।

जंगलों की अंधाधुंध कटाई और लगातार शिकारियों द्वारा पशुओं के शिकार के कारण राष्ट्रीय पशु बाघों की संख्या कम होती जा रही है। यह एक जटिल समस्या है। यही कारण है कि जहाँ पहले बाघ की 8 प्रजातियाँ पाईं जाति थीं, वह सिमट कर अब 5 प्रजातियाँ हो गईं हैं। सर्वोच्च परभक्षी होने के कारण बाघ प्रकृति की नियंत्रण और संतुलन योजना में प्रमुख भूमिका निभाता है। शिकार किए जाने वाले जानवरों के अलावा यह अपने इलाक़े के अन्य परभक्षी तेंदुए की संख्या पर भी नियंत्रण रखता है, परंतु इसकी लगातार घटती संख्या प्रकृति को भी चुनौती दे रही है, जो मानव जाति के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

सरकारों पर उन देशों के विरुद्ध प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव डाला गया, जो बाघ के अंगों के व्यापार को समाप्त करने में विफल रहे। संरक्षणकर्ताओं ने यह विश्वास जताया कि संयुक्त राज्य अमरीका (USA) द्वारा दंडात्मक उपाय ही बाघों को बचाने में कारगर सिद्ध होगी। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन से कार्रवाई करने का आग्रह किया और अप्रैल 1994 में उन्होंने ऐसा किया भी। ताइवान से लगभग 2 करोड़ 50 लाख डॉलर वार्षिक मूल्य के वन्य जीव उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। कुछ सरकारों ने इस प्रतिबंध का सहयोग किया, तो कुछ ने उसका विरोध जाताया। मार्च-1994 में भारत ने बाघों को बचाने के लिए एक संगठित प्रयास के तहत 10 राष्ट्रों के ‘विश्व बाघ मंच’ की पहली बैठक बुलाई, जिसमें शिकार को अवैध घोषित किया गया, परंतु इसके बावजूद शिकार पर लगाम न लग सकी।

एशिया में बाघों की कुल 9 प्रजातियाँ हैं, जिन्हें क्षेत्र के आधार पर बाँटा गया है। इनमें साइबेरियन बाघ, जो रूस के सुदूर और दुर्गम साइबेरिया के बर्फीले जंगलों में अब केवल 450 बचे हैं। रॉयल बंगाल टाइगर, जो भारत, नेपाल, बांग्लादेश और म्यानमार के जंगलों में पाया जाता है। इनकी संख्या कुल 1800 के आस पास है। बंगाल टाइगर की सबसे निकटतम प्रजाति है इंडो-चाइनीज़ टाइगर, जो कभी लाओस, वियतनाम, कम्बोडिया और मलयेशिया (मलेशिया) में पाया जाता था। इनकी संख्या अब केवल 300 बची है। इसके अतिरिक्त मलय टाइगर, जो थाइलैंड और मलयेशिया (मलेशिया) में पाया जाता है, अब केवल 500 बचे हैं, जिनमें से अधिकतर मानव निर्मित पशु शिविरों में पाए जाते हैं। सुमात्रा द्वीप समूह में पाए जाने वाले सुमात्रा टाइगर की संख्या भी अब 400 रह गई है। हिन्द महासागर में बसे जावा और बाली द्वीपों में पाए जाने वाले जावा टाइगर और बाली टाइगर, जो आकार में सबसे छोटे माने जाते थे। अब लगभग विलुप्त मान लिए गए हैं। उत्तर एशिया में मंगोलिया से लेकर कज़ाकिस्तान, अफग़ानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान, इराक़ से लेकर तुर्की तक पाया जाने वाला कैस्पियन टाइगर भी अब विलुप्त हो चुका है।

न्यूयॉर्क-अमेरिका के एक वन्यजीव संरक्षण संस्थान ने लुप्त प्राय बाघों के संरक्षण के लिए भारत की ‘बेमिसाल प्रतिबद्धता’ की प्रशंसा की है। कोरिया के जेजु में आयोजित ‘वर्ल्ड कंज़र्वेशन कांग्रेस’ में संस्था ने 5 सितंबर, 2012 को कहा, “भारत ने वर्ष 1972 में प्रोजेक्ट टाइगर की घोषणा के साथ बाघों की ज़िम्मेदारी लेकर एक स्पष्ट संदेश दिया है कि जंगली बाघों का भविष्य उसके हाथ में है और उनके भविष्य के लिए वह पूरी तरह बाध्य भी होगा।” संस्था ने कहा कि समस्याएँ और चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, परंतु भारत प्रतिबद्ध है कि बाघों का प्रभावी तरीक़े से उनके आवासों में संरक्षण हो। भारत के राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकार के अनुसार 2018 में भारत में बाघों की संख्या 2967 हो गयी है, जबकि 1972 में बाघों की संख्या 1872 थी। 2018 में सबसे अधिक बाघों की संख्या में वृद्धि हुई। अकेले कर्नाटक में 524 बाघ और उत्तराखंड में 442 बाघ और मध्य प्रदेश में कुल 526 देखे गए हैं। भारत लगभग 3000 बाघों के साथ दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सुरक्षित पर्यावास में से एक है। सरकार ने बाघों के संरक्षण और उनकी संख्या को दोगुनी बढ़ाने के लिए 2022 तक करने का लक्ष्य निर्धारित किया था, जिसे समय से बहुत पहले ही पूरा किया जा चुका है।

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