भारत के महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन, 45 वर्षों से थे बीमार

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 14 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। स्कूल में हम सभी गणित विषय अवश्य पढ़ते हैं। गणित को बहुत ही कठिन विषय माना जाता है, क्योंकि गणित एक अमूर्त या निराकार (abstract) और निगमनात्मक प्रणाली है। गणित एक ऐसी विद्याओं का समूह है, जो हमें संख्याओं, मात्राओं, परिमाणों, रूपों और उनके आपसी रिश्तों, गुण, स्वभाव इत्यादि का अध्ययन कराता है। गणित एक ऐसा विषय है, जिसकी जटिलता को न समझने वाला इस विषय से डरता है, तो वहीं गणित को भली प्रकार से समझ कर उसका ज्ञान प्राप्त करने वाला गणितज्ञ बन जाता है। आज हम बात कर रहे हैं, एक ऐसे महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की, जिनके लिये दुर्भाग्य से कहना पड़ रहा है कि अँगुलियों पर कैलकुलेशन करने वाले इस महान गणितज्ञ का गुरुवार को निधन हो गया। वशिष्ठ नारायण 77 वर्ष के थे और पिछले 45 वर्षों से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) से पीड़ित थे। सिज़ोफ्रेनिया, मनोविदलता या विखंडित मानसिकता एक ऐसा मानसिक विकार है, जो लगभग 1 प्रतिशत लोगो में पाया जाता है। इस रोग में रोगी के विचार, संवेग तथा व्यवहार में आसामान्य बदलाव आ जाते हैं, जिनके कारण वह कुछ समय के लिए अपनी जिम्मेदारियों तथा अपनी देखभाल करने में असमर्थ हो जाता है। ‘मनोविदलता’ और ‘सिज़ोफ्रेनिया’ दोनों का शाब्दिक अर्थ है, ‘मन का टूटना’।

महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के कुल्हरिया कॉम्पलेक्स में अपने परिवार के साथ रहते थे और 45 वर्षों से बीमार चल रहे थे, जिसके चलते मृत्यु से कुछ दिन पहले उनकी तबियत ज्यादा बिगड़ गई थी। इसलिये उनके परिजन जब गुरुवार को उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज-अस्पताल (Patna Medical College and Hospital) PMCH ले गये, तो वहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों का कहना है कि जीवन के अंतिम दिनों में भी उनकी कॉपी, किताब और पेंसिल से अच्छी दोस्ती थी। आइए जानते हैं निर्धनता में भी स्वयं को कड़े संघर्षों में तपा कर सोना बनाने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह के व्यक्तित्व को।

वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल, 1942 को बिहार में भोजपुर जिले के बसंतपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम लाल बहादुर सिंह तथा माँ का नाम लहसो देवी था। उनके पिता एक सिपाही थे। वे 5 भाई-बहन थे। उनका बचपन अभाव में बीता था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी गरीबी को प्रतिभा के मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। वशिष्ठ बचपन से ही पढ़ाई में और विशेष कर गणित विषय में निपुण थे। इसका एक उदाहरण भी मिलता है कि एक बार जब उनके अध्यापक कक्षा में गणित विषय पढ़ा रहे थे, तब उनसे कुछ त्रुटि हो गई, जिस पर वशिष्ठ ने अपने अध्यापक को त्रुटिपूर्ण पठन के लिए टोक दिया था। इसके बारे में जब कॉलेज के प्रिंसिपल को जानकारी हुई, तो उन्होंने वशिष्ठ नारायण सिंह की प्रतिभा की परख करने के लिए उनकी परीक्षा ली, जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकॉर्ड तोड़ दिये थे। 1962 में वशिष्ठ नारायण सिंह ने बिहार के एक स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए पटना विज्ञान महाविद्यालय में दाखिला लिया था। 20 साल की उम्र में पीजी करने वाले पहले भारतीय होने का गौरव भी उनके नाम है। पटना साइंस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी भेंट यूएस के कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन एल. केली (John L. Kelley) से हुई। केली ने वशिष्ठ की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अमेरिका ले गये।

1969 में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय से वशिष्ठ नारायण ने केली के मार्गदर्शन में साइकल वेक्टर स्पेस थ्योरी (Reproducing Kernels and Operators with a Cyclic Vector) विषय में अपनी पीएचडी पूरी की। पैसिफिक जर्नल ऑफ मैथेमेटिक्स में प्रकाशित अपने चक्रीय सदिश समष्टि सिद्धांत के शोधपत्र के कारण वे विश्व के महान गणितज्ञों की श्रेणी में शामिल हो गए थे। उनके शोध कार्य ने उन्हें भारत ही नहीं, अपितु विश्व में प्रसिद्ध कर दिया था। इसके बाद उन्हें वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने अमेरिका के नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (National Aeronautics and Space Administration) नासा में भी काम किया था। नासा में वे वैज्ञानिक (एसोसियेट साइंटिस्ट) के रूप में कार्यरत रहे, परंतु वह अधिक समय तक वहाँ नहीं रह पाए और भारत लौट आए। 1971 में वशिष्ठ नारायण ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (Indian Institutes of Technology) आईआईटी कानपुर में अध्यापक की नौकरी की, परंतु यहाँ भी केवल 8 महीने पश्चात ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और बंबई (अब मुंबई) टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (Tata Institute of Fundamental Research) टीआईएफआर में काम करने लगे। 1974 में उन्हें तत्कालीन कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के भारतीय सांख्यिकी संस्थान (Indian Statistical Institute) आईएसआई में स्थाई प्रोफेसर नियुक्त किया गया था।

इससे पहले 1973 में उनका विवाह वन्दना रानी के साथ हुआ था, परंतु विवाह के एक वर्ष बाद ही यानी 1974 में उन्हें मानसिक दौरे पड़ने लगे थे। बिहार सरकार ने राँची में उनका उपचार भी कराया। अगस्त-1989 में उनके छोटे भाई जब उन्हें उपचार के लिए पुणे ले जा रहे थे तब मध्यप्रदेश के खंडवा स्टेशन पर वे गुम हो गए थे। इसके बाद 4 वर्षों तक उनका कोई पता नहीं चला। लोगों ने उन्हें भिखारी और पागल समझा। लम्बे समय तक गायब रहने के बाद गाँव के एक युवक ने उन्हें पहचाना और उन्हें उनके घर पहुँचाया, तो बिहार सरकार ने उन्हें उपचार के लिए बेंगलुरू भेज दिया। वहाँ से भी वे वापस आ गए और अपने गाँव बसंतपुर में परिवार के साथ जीवन व्यतीत करने लगे। लम्बी बीमारी और जीवन की विभिन्न कठिनाइयों के बीच आज इस महान गणितज्ञ का निधन हो गया।

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