ताराबाई : मराठा साम्राज्य की ऐसी वीरांगना, जिन्होंने मुग़लों को हर मोर्चे पर धूल चटाई…

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 9 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। मुग़ल शासक औरंगज़ेब (1618-1707) लगभग संम्पूर्ण उत्तर-दक्षिण भारत पर अपना आधिपत्य जमा कर पश्चिम भारत की ओर बढ़ रहा था, क्योंकि उसका सपना संपूर्ण भारत को एक मुग़ल साम्राज्य बनाने का था। यही सपना लिए वह अपनी विशाल सेना के साथ मराठा साम्राज्य की ओर बढ़ने लगा। वह तेजी से आगे बढ़ रहा था, परंतु उसकी बढ़ती सेना पर अचानक एक मराठा वीरांगना तूफान की तरह टूट पड़ी। इस वीरांगना के साहस के आगे औरंगज़ेब और उसके सैनिको को मैदान छोड़ कर भागने पर विवश होना पड़ा। वह महान वीरांगना थीं महारानी ताराबाई। ताराबाई कोई साधारण महिला नहीं थीं। ताराबाई मराठा साम्राज्य के महान राजा छत्रपति शिवाजी महाराज की पुत्रवधु थीं। हम ताराबाई को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 258वीं पुण्यतिथि है।

महारानी ताराबाई का जन्म 14 अप्रैल, 1675 को छत्रपति शिवाजी महाराज के सरसेनापति हंबीरराव मोहिते के घर हुआ था। 8 वर्ष की अल्पायु में ताराबाई का विवाह छत्रपति शिवाजी के बेटे छत्रपति राजाराम महाराज के साथ हो गया था। इनका पूरा नाम महारानी ताराबाई भोंसले था। पति राजाराम (1689-1700) के निधन के पश्चात् ताराबाई ने अपने 4 वर्ष के पुत्र शिवाजी तृतीय का राज्याभिषेक कराया और स्वयं मराठा साम्राज्य की संरिक्षका बनीं। मराठा साम्राज्य की संरक्षिका के रूप में उन्होंने मुग़लों को कई बार युद्ध में परास्त किया। हालाँकि औरंगज़ेब ने पन्हाला, विशालगढ़ और सिंहगढ़ पर आक्रमण कर उन पर अपना कब्ज़ा कर लिया था। मराठा साम्राज्य कमज़ोर पड़ने लगा था, परंतु वीरांगना ताराबाई इन विषम परिस्थितियों में भी विचलित नहीं हुईं और मराठा सेना में जोश का भरती रहीं। ताराबाई के नेतृत्व में मराठा सैनिकों ने मुग़ल साम्राज्य के अधीन कई क्षेत्रों पर आक्रमण किया। 1703 में बरार, 1704 में सतारा और 1706 में गुजरात पर किए गए आक्रमणों में उन्हें अभूतपूर्व सफलता, धन तथा सम्मान प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त मराठा सैनिकों ने मुग़ल साम्राज्य वाले बुरहानपुर, सूरत और भरूच नगरों को भी लूटा। इस तरह एक बार फिर मराठे अपने सम्पूर्ण क्षेत्र को विजित करने में सफल रहे। ताराबाई ने दक्षिणी कर्नाटक में अपना राज्य स्थापित किया।

1689 ई. में रायगढ़ के पतन के बाद शाहू, उसकी माँ येसूबाई एवं अन्य महत्वपूर्ण मराठा लोगों को क़ैद कर औरंगज़ेब के शिविर में नजरबंद कर दिया गया। 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद बहादुरशाह ज़फ़र के समय आज़म द्वारा कैद से मुक्त कर दिये जाने पर शाहू अपने कुछ साथियों के साथ वापस महाराष्ट्र आ गया। यहाँ पर परसोजी भोंसले, भावी पेशवा बालाजी विश्वनाथ और नैमाजी सिंधिया ने उसका साथ दिया। शाहू ने सतारा पर घेरा डाल कर वहाँ की तत्कालीन शासिका राजाराम की विधवा ताराबाई के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। ताराबाई ने धनाजी जादव के नेतृत्व में एक सेना को शाहू का मुक़ाबला करने के लिए भेजा। अक्टूबर-1707 में प्रसिद्ध ‘खेडा युद्ध’ हुआ, परंतु कूटनीति का सहारा लेकर शाहू ने जादव को अपनी तरफ मिला लिया। ताराबाई ने अपने सभी महत्त्वपूर्ण अधिकारियों के साथ ‘पन्हाला’ में शरण ली। ताराबाई बड़ी विकट स्थिति में पड़ गईं। शाहू ने महाराष्ट्र आकर अपनी पैतृक सम्पत्ति का अधिकार मांगा। उसको शीघ्र पेशवा बालाजी विश्वनाथ के नेतृत्व में बहुत से समर्थक भी मिल गए। ताराबाई का पक्ष कमज़ोर पड़ गया और उसे शाहू को मराठा साम्राज्य का छत्रपति स्वीकार करना पड़ा, फिर भी वह अपने पुत्र शिवाजी तृतीय को सतारा में राज पद पर बनाये रखने में सफल रहीं। 1689 से 1707 ई. तक प्राय: 20 वर्षों तक मराठों का यह स्वतंत्रता संग्राम तब तक चलता रहा। बाद में ताराबाई के पुत्र शिवाजी तृतीय को राजा शाहू ने गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

1700 से 1707 ई. तक के संकटकाल में ताराबाई ने मराठा राज्य की एकसूत्रता और अखण्डता बनाये रख कर उसकी अमूल्य सेवा की। अपनी योग्यता, अदम्य उत्साह, नेतृत्व क्षमता एवं पराक्रम के कारण ही ताराबाई ने मराठा इतिहास के पन्नों पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवाया। 14 जनवरी 1761 में पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की हार होने के बाद जून-1761 में बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो गई और उसके बाद ही दिसंबर-1761 में ताराबाई का भी निधन हो गया। ताराबाई मराठा साम्राज्य की सबसे ताक़तवर महिला शासक-योद्धा सिद्ध हुईं। जिस तरह से उन्होंने 7 वर्षों तक औरंगजेब से लड़ाई लड़ी, यह इनके महान व्यक्तित्व को दर्शाता है। ताराबाई एक अद्धितीय उत्साह वाली महिला थीं। ख़फ़ी ख़ाँ जैसे कटु आलोचक ने उनके विषय में लिखा है, ‘वह चतुर तथा बुद्धिमती स्त्री थी तथा दीवानी एवं फ़ौजी मामलों की अपनी जानकारी के लिए अपने पति के जीवनकाल में ही ख्याति प्राप्त कर चुकी थी।’

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