प्रैक्टिस, प्रैक्टिस और प्रैक्टिस, जिसने इस खिलाड़ी को शून्य से शिखर पर पहुँचाया

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 23 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। श्रीमद् भगवद् गीता में कृष्ण परमात्मा जब अर्जुन से कहते हैं, ‘हे अर्जुन ! तू अपना मन मुझे दे दे।’ उत्तर में नि:सहाय अर्जुन कहते हैं, ‘हे माधव ! पवन को वश करना संभव है, परंतु मन को मैं कैसे वश करूँ ?’ अर्जुन के संशय को दूर करते हुए कृष्ण परमात्मा ने इसका एक ही उपाय बताया, ‘योग और अभ्यास’। कृष्ण ने कहा, ‘हे अर्जुन ! योग और अभ्यास से सब कुछ कर पाना संभव है।’ यहाँ कृष्ण परमात्मा शारीरिक रूप से किए जाने वाले विभिन्न योगासनों वाले योग और अभ्यास की बात नहीं कर रहे। कृष्ण का कहने का तात्पर्य है ईश्वर के साथ योग करने का निरंतर अभ्यास।

वैसे आज हम आपको एक ऐसे ही योगी और अभ्यासी व्यक्ति का परिचय कराने जा रहे हैं, जो भारत सहित पूरे विश्व में अति लोकप्रिय खेल क्रिकेट से सम्बद्ध है। इस व्यक्ति यानी खिलाड़ी का नाम है मार्वन अटापट्टू। वैसे यह कोई भारतीय खिलाड़ी नहीं है, परंतु इसकी कहानी क्रिकेट खेलने वालों ही नहीं, अपितु न खेलने वाले कर्मयोगियों के लिए भी अत्यंत प्रेरणादायक है। मार्वन अटापट्टू 2007 में क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं, परंतु उनका क्रिकेट कैरियर जिस प्रकार शून्य से शिखर पर पहुँचा, उसके पीछे उसी योग और अभ्यास अर्थात् प्रैक्टिस ने सबसे बड़ा योगदान दिया। महान क्रिकेटर बनने का सपना लिए जब अटापट्टू पहली बार मैदान में उतरे, तो शून्य पर आउट हुए और उसके बाद भी कई विफलताओं ने उनके सपनों पर संकट के बादल उमड़ा दिए, परंतु अटापट्टू ने हार नहीं मानी और उसी अभ्यास यानी प्रैक्टिस का सहारा लिया, जिसने उन्हें विश्व का महान क्रिकेटर बनाया।

आज हम श्रीलंका के सबसे सफल क्रिकेटर और पूर्व कप्तान मार्वन सैमसन अटापट्टू (Marvan Samson Atapattu) की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि आज से 29 वर्ष पहले 23 नवंबर, 1990 को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था, परंतु अत्यंत निराशाजनक तरीके से। उस समय कदाचित कोई नहीं जानता था कि यही अटापट्टू आगे चल कर श्रीलंका के सबसे सफल कप्तान सिद्ध होंगे। ये वही अटापट्टू थे, जिन्हें 3 बार टीम से निकाल बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, परंतु क्रिकेट की चाह और दीवानगी ने उन्हें निरंतर प्रयास और अभ्यास करने की प्रेरणा दी और श्रीलंका क्रिकेट टीम के वह चहेते खिलाड़ी बन गये। पूर्व श्रीलंकाई क्रिकेटर और कप्तान मार्वन अटापट्टू टीम के सबसे सफल क्रिकेटर्स में से एक हैं। उन्होंने अपने टेस्ट करियर में 5 हज़ार और वनडे करियर में 8 हज़ार से अधिक रन बनाये हैं। 29 वर्ष पूर्व यानी 23 नवंबर, 1990 को उन्होंने भारत के विरुद्ध अपना पहला टेस्ट डेब्यू किया था, परंतु उनकी शुरुआत बहुत ही निराशाजनक थी, क्योंकि वह शून्य पर ही आउट हो गये थे। मार्वन अटापट्टू ने अपने 17 वर्ष क्रिकेट को दिये, उस दौरान उन्होंने कई उतार-चढ़ाव भी देखे। 49 वर्षीय मार्वन अटापट्टू, जिन्हे टेस्ट क्रिकेट में 1 रन से दूसरा रन बनाने में 6 वर्ष लगे, परंतु आज यही अटापट्टू 6 बार दोहरा शतक बनाने वाले विश्व के सातवें क्रिकेट खिलाड़ी बने हुए हैं। आइए जानते हैं एक बुरी शुरुआत के बावजूद कैसे मार्वन अटापट्टू श्रीलंकाई क्रिकेट टीम के एक महान क्रिकेटर बने।

मार्वन सैमसन अटापट्टू (Marvan Samson Atapattu) ने शुक्रवार को ही अपना 49वाँ जन्म दिवस मनाया। अटापट्टू का जन्म 22 नवंबर, 1970 को श्रीलंका के कलुत्रा में हुआ था। मारवन अटापट्टू ने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत गाल्ले के महिंदा कॉलेज में की, जहाँ मेजर जी. डब्ल्यू. डी. सिल्वा उनके पहले क्रिकेट कोच थे। इसके बाद वह कोलम्बो के आनंदा कॉलेज चले गए, जहाँ उन्हें पी. डब्ल्यू. परेरा ने कोचिंग दी। मार्वन अटापट्टू ने 20 वर्ष की आयु में 23 नवंबर, 1990 को भारत के विरुद्ध चंडीगढ़ में खेली गयी टेस्ट सिरीज़ के एकमात्र मैच से अपना टेस्ट डेब्यू किया था, परंतु उस मैच की दोनों इनिंग्स में वे बिना खाता खोले अर्थात ज़ीरो (0) पर आउट हो गये थे। उस टेस्ट सिरीज़ में श्रीलंकाई टीम 54 रन पर 5 विकेट खो चुकी थी। ऐसे में 7वें बैट्समैन के तौर पर अटापट्टू बैटिंग करने आये और ज़ीरो पर आउट होकर पैवेलियन लौट गये। पहली इनिंग में श्रीलंकाई टीम 82 रन पर ऑलआउट हो गई। दूसरी इनिंग में मार्वन अटापट्टू छठे बैट्समैन के तौर पर बैटिंग करने उतरे, परंतु इस बार भी वे ज़ीरो पर आउट हो गये। टीम इंडिया एक इनिंग और 8 विकेट से वह सिरीज़ जीत गई। इसके बाद अटापट्टू को अगले 3 वर्षों तक टीम में खेलने का मौका नहीं मिला।

प्रैक्टिस, प्रैक्टिस और प्रैक्टिस ने बनाया महान

मार्वन अटापट्टू के दिमाग में बस एक ही चीज़ चलती रही क्रिकेट। अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर उन्हें श्रीलंका टीम में दोबारा खेलने का मौका तो मिला, परंतु वह उसमें कुछ क़माल न दिखा सके। मार्वन अटापट्टू ने कड़ी प्रैक्टिस की और 1st क्लास मैच में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया । 21 महीने बाद यानी अगस्त 1992 को एक बार फिर मार्वन अटापट्टू ने मैच खेला, परंतु दुर्भाग्य कि वे पुन: ज़ीरो पे आउट हो कर टीम से बाहर हो गये। पुन: प्रयास किया और 1st क्लास मैच में हज़ारों रन बनाये और 18 महीने बाद फरवरी-1994 को उन्हें भारत के विरुद्ध अहमदाबाद में होने वाले टेस्ट के लिए टीम में शामिल किया गया, परंतु इस बार भी निराशा मिली। वह ज़ीरो पे आउट हो गये। इस मैच के बाद उनका लक्ष्य केवल क्रिकेट बन गया। 3 वर्ष की लंबी प्रतिक्षा के बाद मार्च-1997 में न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध न्यूज़ीलैंड के दुनेदिन (Dunedin) में अपने करियर का चौथा टेस्ट खेला, जिसमें पहली इनिंग में 25 और दूसरी में 22 रन बनाए। इस मैच के साथ ही मार्वन अटापट्टू के करियर पर बार-बार लगने वाला ब्रेक तो हट गया, परंतु अपना पहला शतक बनाने के लिए उन्हें लंबी प्रतिक्षा करना पड़ी।

19 नवंबर, 1997 को मार्वन ने मोहाली में पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन आईएस बिंद्रा स्टेडियम (Punjab C.A. Stadium, Mohali) में भारत के विरुद्ध 108 रन की शानदार पारी खेलते हुए अपना पहला टेस्ट शतक लगाया, हालाँकि वह टेस्ट सिरीज ड्रा रही थी। 1997 मार्वन के बड़ा ही सुखद वर्ष रहा, क्योंकि उन्होंने अपना पहला वनडे शतक भी 17 अगस्त, 1997 को कोलंबो के आर. प्रेमदासा स्टेडियम (R. Premadasa Stadium, Colombo) में भारत के विरुद्ध 118 रन बनाकर लगाये थे। इसके बाद से मार्वन अटापट्टू के सफलता के मार्ग खुल गये। अप्रैल-2003 में उन्हें एक दिवसीय क्रिकेट टीम के कप्तान के रूप में नियुक्त किया गया। 2004 में उन्होंने ज़िम्बाब्वे के विरुद्ध 249 रन के अपने उच्चतम टेस्ट स्कोर बनाया। मार्वन ने अपने 17 वर्ष के कैरियर में श्रीलंका क्रिकेट टीम को 7 टेस्ट सिरिज़ और 8 वन डे मैचों में जीत दिलाई है। मार्वन ने अपने टेस्ट करियर में 90 मैच खेले, जिसमें 6 दोहरे शतक और 16 शतक लगाते हुए 5,500 से अधिक रन बनाए। वे सबसे ज्यादा टेस्ट डबल सेन्चुरी लगाने के मामले में विश्व में सातवें नंबर के खिलाड़ी हैं। वनडे करियर में अटापट्टू ने 268 मैच खेले, जिसमें 11 शतक लगाते हुए 8,500 से अधिक रन बनाए। आज अटापट्टू की गिनती विश्व के श्रीलंकाई क्रिकेट कप्तान और बेस्ट टेस्ट ओपनर्स में होती है।

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