गुजरात में छठ पूजा की धूम : माँ जानकी छठ घाट पर महोत्सव का हो रहा आयोजन

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 1 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। छठ पर्व, छठ या षष्‍ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह पर्व बिहारियों का सबसे बड़ा पर्व है। छठ पर्व बिहार में बड़े ही धुम-धाम से मनाया जाता है। ये एक मात्र बिहार या पूरे भारत का ऐसा पर्व है, जो वैदिक काल से चला आ रहा है और ये बिहार की संस्कृति बन चुका है। ये पर्व मुख्य रुप से ॠषियों द्वारा लिखे गए ऋग्वेद में सूर्य पूजन, उषा पूजन और आर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। छठ पूजा सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु और उनकी बहन छठी म‌इया को समर्पित है। इस पर्व के माध्यम से पृथ्वी पर जीवन को बहाल करने के लिए देवताओं को धन्यवाद और कुछ शुभकामनाएँ देने का अनुरोध किया जाता है। छठ की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें कोई मूर्तिपूजा शामिल नहीं है। पर्यावरणविदों का दावा है कि छठ सबसे पर्यावरण-अनुकूल हिंदू त्यौहार है, परंतु छठ पर्व का एक वैज्ञानिक पहलू भी है। विज्ञान के अनुसार छठ पूजा हमें कई प्रकार से लाभ पहुँचाती है।

गुजरात में भी छठ पूजा की धूम

गुजरात के अहमदाबाद में छठ पर्व कई वर्षों से बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस बार छठी मैया को नमन करने के लिए उत्तर-भारतीय समुदाय के लोग साबरमती तट पर एकत्रित होने वाले हैं। अहमदाबाद में साबरमती नदी पर बने इंदिरा पुल के पास माँ जानकी छठ घाट पर “छठ सांस्कृतिक महोत्सव 2019” का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव में गुजरात के मुख्य मंत्री विजय रुपाणी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है, साथ ही सुप्रसिद्ध कलाकार सारेगामा फेम अंगद, गायक राजेश पाण्डेय और गायिका रानी सिंह द्वारा भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किये जाएँगे।

कार्यक्रम की शुरुआत शनिवार, 2 नवंबर, 2019 सायं 4:00 बजे से 3 नवंबर सुबह 6:46 तक चलेगा। सर्वप्रथम अतिथि स्वागत के साथ कार्यक्रम की शुरुआत होगी। इसके बाद दीप प्रागट्य, वीडियो प्रस्तुति, छठ महाआरती और अंत में मुख्यमंत्री द्वारा संबोधन का प्रायोजन है। आप सब भी इस महोत्सव के लिए सादर आमंत्रित हैं, कृपया महोत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर छठी मैया से आशीर्वाद लेने का सौभाग्य प्राप्त करें।

और इस तरह शुरू हुआ छठ का चलन

एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये, तब देवमाता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। इससे प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र प्राप्त होने का वरदान दिया था। इस वरदान के बाद अदिति के यहाँ त्रिदेव रूप आदित्य भगवान का पुत्र रूप में जन्म हुआ था, जिन्होंने देवताओं को असुरों पर विजय दिलायी। उसी समय से देवसेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया।

छठ से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य

विज्ञान की मानें तो सूर्य को जल देने के पीछे रंगों का विज्ञान छिपा है। मानव शरीर में रंगों का संतुलन बिगड़ने से भी कई रोगों के शिकार होने का खतरा होता है। सुबह के समय सूर्यदेव को जल चढ़ाते समय शरीर पर पड़ने वाले प्रकाश से ये रंग संतुलित हो जाते हैं। (प्रिज्म के सिद्धांत से) जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ जाती है। सूर्य की रोशनी से शरीर में विटामिन डी की कमी पूरी होती है। त्वचा के रोग कम होते हैं। छठ पूजा का विधि-विधान व्रती के शरीर और मन को सौर ऊर्जा के अवशोषण के लिए तैयार करता है। प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि बिना भोजन-पानी ग्रहण किए कठोर तपस्या करने की ऊर्जा प्राप्त करते थे। छठ पूजा की विधि द्वारा ही वे भोजन-पानी से अप्रत्यक्ष तौर पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा के बजाए सूर्य के संपर्क से सीधे ऊर्जा प्राप्त कर लेते थे। षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर होता है। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में निहित है। माना जाता है कि अस्ताचलगामी और उगते सूर्य को अर्ध्य देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता और इंसान निरोगी रहता है। इसके अलावा सर्दी आने से शरीर में कई परिवर्तन भी होते हैं। खास तौर से पाचन तंत्र से संबंधित परिवर्तन। छठ पर्व का उपवास पाचन तंत्र के लिए लाभदायक होता है। इससे शरीर की आरोग्य क्षमता में वृद्धि होती है। छठ में दिए जाने वाले अर्ध्य का भी विशेष महत्व है। सुबह, दोपहर और शाम तीन समय सूर्य देव विशेष रूप से प्रभावी होते हैं, सुबह के वक्त सूर्य की आराधना से सेहत बेहतर होती है।

ऐसे की जाती है पूजा

छठ पूजा के चार दिवसीय अनुष्ठान में पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना और तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्ध्य व चौथे दिन उगते सूर्य की पूजा की जाती है। नहाएँ-खाएँ के दिन पवित्र नदियों में (जो नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, वे पवित्र कहलाती हैं) स्नान करते हैं। इसके बाद भोजन करते हैं। इस दिन चावल, चने की दाल इत्यादि बनाए जाते हैं। कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना कहते हैं। इस दिन पूरे दिन का व्रत करने के बाद शाम को व्रती भोजन करते हैं। षष्ठी के दिन सूर्य को अर्ध्य देने के लिए तालाब, नदी या घाट पर जाते हैं और स्नान करके डूबते सूर्य की पूजा करते हैं। सप्तमी को सूर्योदय के समय पूजा करके प्रसाद वितरित करते हैं।

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