‘बा’ ने कहा और ठहर गई इस गाँव की जनसंख्या

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 13 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘बा’ गुजराती में अपनों से बड़ी आयु की महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला सम्मानजनक संबोधन है। यही कारण है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पत्नी का नाम कस्तूरबा के साथ बा शब्द जुड़ा हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब कस्तूरबा ने पूरे देश में अपने पति मोहनदास करमचंद गांधी के साथ पत्नी धर्म के साथ-साथ राष्ट्र धर्म भी निभाया, तो वही कस्तूरबा गांधी अपने प्रियजनों के बीच ‘बा’ के रूप में प्रसिद्ध हो गईं।

स्वतंत्रता आंदोलन में कस्तूरबा गांधी ने भी कई महत्वपूर्ण योगदान किए, परंतु मध्य प्रदेश का एक गाँव ऐसा है, जिसने बा की दी हुई शिक्षा को 97 वर्षों से न केवल संजो कर रखा है, अपितु उस पर अक्षरश: अमल भी किया है। बा तो 1922 में कह कर चली गईं, परंतु इस गाँव ने उनकी दी हुई परिवार नियोजन की शिक्षा को 1922 ही क्या, बा के 1944 में निधन के बाद भी अपनाए रखा और इसीलिए पिछले 97 वर्षों से इस गाँव की जनसंख्या ठहर गई है। देश और दुनिया की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, परंतु मध्य प्रदेश का यह गाँव बा के बताए रास्ते पर चल कर जनसंख्या वृद्धि के दूषण से कोसों दूर है।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं मध्‍य प्रदेश के बैतूल जिले (Betul District) के धनोरा गाँव (Dhanora Village) की, जहाँ की जनसंख्या ने पिछले 97 वर्षों से एक संतुलन बनाए रखा है। यहाँ न तो जनसंख्या बढ़ती है और न ही घटती है। आइए जानते हैं जनसंख्या पर निरंतरण रखने वाले इस गाँव की क्या है अद्भुत गाथा। भारत जहाँ एक ओर लगभग 136 करोड़ जनसंख्या के साथ विश्व के दूसरे स्थाप पर पहुँच चुका है, वहीं धनोरा गाँव 1922 से एक समान जनसंख्या का आँकलन प्रस्तुत करते हुए जनसंख्या नियंत्रण के मामले में सभी गाँवों के लिए ब्रांड एंबेसडर बन गया है। वास्तव में इसके पीछे एक रुचिप्रद कहानी है। लगभग 97 वर्ष पूर्व यानी 1992 में इस गाँव की जनसंख्या 1700 थी और आश्चर्य की बात यह है कि आज भी उतनी की उतनी ही बनी हुई है। देश में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए ये विश्वास कर पाना थोड़ा कठिन है, परंतु यह शत प्रतिशत सत्य है। गाँव की इस अद्भुत पहल के पीछे कोई और नहीं, अपितु महात्मा गांधी की धर्म पत्नी कस्तूरबा गांधी की प्रेरणा है, उनके कहे गए शब्दों का अनुसरण आज भी गाँव के लोग दिल से कर रहे हैं, जिसका परिणाम सबके सामने है। कस्तूरबा गांधी का संदेश यहाँ के लोगों के दिल और दिमाग में घर कर गया। परिवार नियोजन को लेकर ग्रामीणों में ज़बरदस्त जागरूकता आई। लोगों ने एक या दो बच्चों पर परिवार नियोजन करवाया शुरू कर दिया, जिससे धीरे-धीरे गाँव की जनसंख्या स्थिर होने लगी। इस परंपरा से न केवल बच्चियों की मृत्यु दर में गिरावट आई, अपितु बेटों के मोह में बेटियों को कोख में या जन्म लेते ही मारने की कुरीतियों पर भी अंकुश लग गया। अब यहाँ के लोग बेटों की तरह एक या दो बेटियों के जन्म के बाद परिवार नियोजन को उचित समझते हैं। आज इस गाँव में किसी भी परिवार में दो से अधिक बच्चे नहीं हैं। परिवार नियोजन के मामले में यह गांव एक मॉडल बन गया है, जबकि इसके आस-पास के गाँवों की जनसंख्या बीते 50 वर्षों में 4 गुना तक बढ़ चुकी है।

स्वतंत्रता पूर्व 1922 में ताप्ती नदी के किनारे बसे धनोरा गाँव में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जीवन संगिनी कस्तूरबा गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस का दूसरा प्रांतीय अधिवेशन हुआ था, जिसमें पंडित रविशंकर शुक्ल, सेठ गोविंद दास, जमना लाल बजाज, राष्ट्रकवि माखन लाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, पंडित सुन्दरलाल उपस्थित थे। सम्मेलन में गाँव के लोगों के बीच बा यानी कस्तूरबा गांधी ने एक नारा दिया था ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’। बा के उक्त वचनो को गाँव वालों ने पत्थर की लकीर माना और आज तक उसका पालन कर रहे हैं। हरिजन उद्धार के लिए कस्तूरबा गांधी के धनोरा गाँव में आई थीं, परंतु आज भी गाँव में कक्षा 12 तक कोई स्कूल या ऐसी कई सरकारी योजनायें नही पहुँच पाई हैं, जिसकी आवश्यकता गाँव को है। इस पिछड़े पर का कारण भी इस गाँव की कम जनसंख्या है, क्योंकि जनसंख्या योजना के अनरूप इस गाँव की जनसंख्या बहुत ही कम है। अधोसंरचना और तमाम मूलभूत सुविधाओं से जूझते हुए इस गाँव ने परिवार नियोजन को अपनाकर एक मिसाल सिद्ध किया है।

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