जानिए वे धारदार दलीलें, जो बनीं अयोध्या विवाद के निर्णायक अंत का आधार

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 9 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। आज राम मंदिर भूमि विवाद के सदियों पुराने मामले को अंतिम रूप मिल चुका है, परंतु निर्णय की बात न करके आइए जानते हैं, उन महान, धारदार वकीलों और उनकी दलीलों के बारे में, जिसके आधार पर इस समस्या का निधान हो पाया है। राम मंदिर-बाबरी केस की सुनवाई के दौरान हिन्दू पक्षकारों में रामलला विराजमान की ओर से के. परासरण और सीएस वैद्यनाथन, निर्मोही अखाड़ा की ओर से सुशील जैन, राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से पीएन मिश्रा ने अपना तर्क दिया था। शिया वक्फ बोर्ड के वकील एमसी ढींगरा ने भी मंदिर के पक्ष में ही अपनी दलील दी थी, जबकि मुस्लिम पक्षकारों में सुन्नी वक्फ बोर्ड व अन्य की ओर से राजीव धवन, जफरयाब जिलानी, मीनाक्षी अरोड़ा, शेखर नाफड़े और मोहम्मद निजामुद्दीन पाशा ने अपना तर्क रखा था। आइए जानते हैं किन-किन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट में रखे गए तर्क, जो आज बना बहु प्रतिक्षित निर्णय का सूत्रधार ?

सुप्रीम कोर्ट में हिन्दू और मुस्लिम पक्षकारों के बीच सबसे अधिक बहस अयोध्या की विवादस्पद भूमि के मालिकाना अधिकार को लेकर हुई थी। हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वकीलों ने ढेरों दस्तावेज, एएसआई रिपोर्ट और धर्मग्रंथों का सहारा लिया। हिन्दू पक्षकार ने 16 दिनों में 67 घंटे 35 मिनट तक तर्क किया, उसके बाद मुस्लिम पक्ष ने 18 दिन में 71 घंटे 35 मिनट तक अपना पक्ष रखा था।

हिन्दू पक्ष के वकील

92 वर्षीय पूर्व अटार्नी जनरल परासरन ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में बहस करते हुए पौराणिक तथ्यों के आधार पर आयोध्या में राम मंदिर होने की दलीलें पेश की थीं। सबसे वयोवृद्ध और अनुभवी वकील के. परासरण ने राम जन्मभूमि से जुड़े साक्ष्यों को मजबूती के साथ शीर्ष अदालत के समक्ष रखा था। रामलला विराजमान के वकील सीएस वैद्यनाथन ने सुप्रीम कोर्ट में एएसआइ की रिपोर्ट की प्रासंगिकता व वैधता के आधार पर पक्ष को सबल किया था। वैद्यनाथन ने दलील रखी थी कि खुदाई में मिली कमल की आकृति, सर्कुलर श्राइन, परनाला की उपस्थिति ये सिद्ध करते हैं कि वह संरचना मंदिर की है, उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( Archaeological Survey of India ) ASI की तसवीरों के हवाले से कहा कि विवादित ढाँचा खंभों के आधार पर टिका होने के सबूत मिले हैं, वहीं पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नरसिम्हा ने सुप्रीम कोर्ट में पुराणों की बात को मजबूती से पेश किया था। गोपाल सिंह विशारद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे पेश हुए थे और बाद में रंजीत सिंह ने बहस की थी। रंजीत कुमार ने कोर्ट में कहा था कि उनका मुवक्किल रामलला का उपासक है और वह मानता है कि जन्मस्थान पर उसे पूजा करने का अधिकार दिया जाए, हालाँकि गोपाल सिंह विशारद का निधन 1986 में हो चुका है। अखिल भारत श्रीराम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से पीएन मिश्रा सुप्रीम कोर्ट में बहस की और अपनी बात रखी। अखिल भारत हिंदू महासभा की ओर से हरिशंकर जैन सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए और उन्होंने मंदिर के पक्ष में दलीलों को रखा था। निर्मोही अखाड़ा की ओर से सुशील कुमार जैन ने सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे और उन्होंने न्यायालय बहस की और मंदिर पर दावा पेश किया था। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता निर्वाणी अखाड़ा के धर्मदास की ओर से अदालत में बहस में हिस्सा लिया था।

मुस्लिम पक्ष के वकील

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से मुख्यतौर पर वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे और उन्होंने मालिकाना हक के मामले में मुस्लिम पक्ष की ओर से मुख्य बहस की थी। मुस्लिम पक्षकार की ओर से जफरयाब जिलानी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे और उन्होंने इमाम के वेतन, पुताई आदि के सबूत पेश कर वहाँ मस्जिद होने का सबूत पेश किया था। मुस्लिम पक्षकारों की ओर से शेखर नाफड़े सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे, उन्होंने रेसजुडीकेटा और एस्टोपल के कानूनी सिद्धांत पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि मालिकाना हक के केस पर कोर्ट अब सुनवाई नहीं कर सकता। मुस्लिम पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में निजामुद्दीन पाशा पेश हुए थे, उन्होंने पवित्र कुरान की आयतों के आधार पर देश की सबसे बड़ी अदालत में इस्लामिक कानून पर बहस की थी। वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा मुस्लिम पक्ष की ओर पेश हुई थीं, उन्होंने एएसआइ की रिपोर्ट के खिलाफ बहस की थी।

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