अरुण खेत्रपाल, जिन्होंने धधकते टैंक के साथ दुश्मनों को धूल चटाई

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 14 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘सर, एक बात है, जो मैं कई सालों से आपको बताना चाहता था, मगर बताने का तरीका नहीं जानता था। मुझे आपकी ख़िदमत करने का मौका मिला, मैं इसके लिए शुक्रगुज़ार हूँ, मगर इसकी वज़ह से मेरा रास्ता और मुश्किल हुआ है। मेरे ही हाथों अरुण का कत्ल हुआ था।” ये शब्द थे पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नसीर के, जिन्होंने अपने अतिथि भारतीय सेना के रिटायर्ड ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल से कहे थे।

दरअसल 2001 में भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध अत्यंत सामान्य स्थिति में थे और दोनों देशों के नागरिकों के बीच आवागमन बढ़ गया था, उसी दौरान भारतीय सेना के 81 वर्षीय रिटायर्ड ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल के पास पाकिस्तानी सेना के एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर का संदेश आया करता था। पाकिस्तानी अफसर हिंदुस्तान के इस रिटायर्ड फौजी से बार-बार पाकिस्तान आने और उनके यहाँ ठहरने की गुज़ारिश करता। खेत्रपाल इसे लंबे समय तक नज़रअंदाज करते रहे। ब्रिगेडियर खेत्रपाल सरगोधा (अब पाकिस्तान) के रहने वाले थे और अपने पुश्तैनी घर को देखना भी चाहते थे। कई वर्ष बाद अंतत: मदन लाल खेत्रपाल ने पाकिस्तानी फौजी से मिलने का फ़ैसला किया। लाहौर में रहने वाले ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नसीर ने मदन लाल के वीज़ा और दस्तावेज की सारी व्यवस्था की। नसीर और उनका पूरा परिवार मदन लाल की देखभाल में ऐसे लग गए मानो कि सालों बाद घर का कोई बुज़ुर्ग घर वापस आया हो। 3 दिन की मेहमाननवाज़ी ने ब्रिगेडियर खेत्रपाल को नसीर का मुरीद बना दिया, परंतु वे यह समझ नहीं पाए कि आखिर क्यों दुश्मन देश का एक फौजी उन्हें इतना सम्मान और प्यार दे रहा हैं ? अनत: नसीर ने मदन लाल को बता ही दिया कि मदन लाल की ख़िदमत वास्तव में उनका पश्चाताप है। दरअसल भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 में मदन लाल खेत्रपाल के पुत्र अरुण खेत्रपाल शहीद हो गए थे। जब नसीर ने बताया कि उनके द्वारा किए गए हमले में ही अरुण शहीद हुए थे, तो मदन लाल यह सुन कर स्तब्ध रह गए, परंतु उन्होंने तुरंत स्वयं को संभालते हुए नसीर के पश्चाताप पर सिर्फ इनता ही कहा, “तुम अपनी ड्यूटी कर रहे थे और वो अपनी।

CHILDHOOD ARUN KHETARPAL WITH FATHER ML KHETARPAL , BROTHER AND MOTHER

अरुण यानी सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, जो भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता सैनिक थे। अरुण ने 1971 की लड़ाई में बासंतार की जंग में पाकिस्तान के पास 5 बटालियन होने के बावजूद भी भारत की केवल 3 बटालियनों और 3 टैंकों के साथ पाकिस्तानी 13 लांसर्स के पैटन टैंक्स की क़तार को रोकने की ज़िम्मेदारी उठाई थी। 21 वर्षीय अरुण ने पाकिस्तान के 10 टैंक तबाह किए, जिसके चलते न केवल पाकिस्तानी सेना का आगे बढ़ना रुका, अपितु उनका मनोबल भी इस हद तक गिर गया कि आगे बढ़ने से पहले दूसरी बटालियन की मदद मांगनी पढ़ी। आज हम अरुण को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनका 69वाँ जन्म दिन है।

परमवीर चक्र से सम्मानित अरुण खेत्रपाल

भारत की स्वतंत्रता के बाद भी भारत-पाकिस्तान बँटवारे ने दोनों देशों के बीच कभी न थमने वाली ऐसी शत्रुता पैदा की, जो आज तक जारी है। वर्ष दर वर्ष भारत और पाकुस्तान के बीच युद्ध होते रहे हैं। कभी कश्मीर के लेकर, तो कभी जिहाद के नाम पर, परंतु हर बार पाकिस्तान को हार का मुंह देखना पड़ा। पाकिस्तान को युद्ध के मैदान में धूल चटाने और उन्हें भारत की सीमा से बाहर खदेड़ना का श्रेय भारत के उन तमाम सानिकों को जाता है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना युद्ध के मैदान में अपने शौर्य का परिचय दिया। भारत के ये वीर सपूत न तो डिगे और न ही मौत के डर से इनके कदम कभी पीछे हटे। उन्होंने हर युद्ध में भारत के परचम बुलंद किया। ऐसे ही एक वीर सपूत थे सेकेंड लेफ़्टिनेट अरुण खेत्रपाल, जिन्होंने 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान के युद्ध में अपने प्राण न्यौछावर कर भारत के सम्मान की रक्षा की थी। भारत-पाकिस्तान युद्ध भारत के इतिहास में ही नहीं, अपितु पूरे विश्व के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह युद्ध 17 दिसम्बर, 1971 तक चला। इसमें पाकिस्तान ने मुहँ की खाई। इसी युद्ध के दौरान बासंतार की लड़ाई में अरुण ने माँ भारती के चरणों में अपना शीष धरा था। भारत सरकार ने 26 जनवरी, 1972 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर सेकेंड लेफ़्टिनेट अरुण खेत्रपाल को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित भी किया था।

सैनिक परिवार से मिले सैनिक बनने के संस्कार

अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर, 1950 को महाराष्ट्र के पूना (अब पुणे) में हुआ था। अरुण खेत्रपाल के पिता मदन लाल खेत्रपाल भी सेना में ब्रिगेडियर थे। यही कारण था कि अरुण की प्रारंभिक स्कूली शिक्षा उन अलग-अलग जगहों के स्कूलों में हुई, जहाँ उनके पिता की नियुक्ति होती थी। इसके बाद अरुण को हिमाचल प्रदेश के एक बोर्डिंग स्कूल द लारेंस स्कूल, सनावर में 5 वर्ष के लिए पढ़ाई करने के वास्ते भेज दिया गया। वे जितने पढ़ाई-लिखाई में निपुण थे, उतने ही सक्षम खेल के मैदान में भी थे। वे अपने स्कूल के एक बेहतर क्रिकेट खिलाड़ी थे। एक फौजी के परिवार में जन्मे अरुण की नस-नस में परिवार से भारतीय सेना और उससे जुड़े गौरव के बीज विद्यमान थे, जिसने उन्हें बोर्डिंग स्कूल से पढाई करने के बाद सेना में भर्ती होने की ओर आकर्षित किया। अरुण एक वीर परिवार से थे। 1848 में उनके परदादा सिख सेना में कार्यरत थे और उन्होंने चिलियाँवाला का मोर्चा संभालते हुए ब्रिटिश सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई भी लड़ी थी। अरुण के दादा ने 1917-1919 में प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया था। अरुण खेत्रपाल के पिता मदन लाल खेत्रपाल ब्रिगेडियर तो थे ही, साथ ही उन्हें अतिविशिष्ट सेना मेडल (AVSM) से भी सम्मानित किया गया था। सैन्य परिवार का संस्कार उनके रक्त में बह रहा था। अतः जून-1967 में अरुण खेत्रपाल राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (National Defence Academy) यानी NDA देहरादून में भर्ती हो गए, जहाँ प्रशिक्षण के दौरान वे स्क्वॉड्रन कैडेट (Squadron Cadet) के रूप में चुने गए। वे फॉक्सट्रॉट स्क्वॉड्रन (Foxtrot squadron) से संबंधित थे, जहाँ उन्हें 38वें पाठ्यक्रम के स्क्वॉड्रन कैडेट कैप्टन के रुप में चुना गया। बाद में वे भारतीय सैन्य अकादमी (Indian Military Academy) में शामिल हुए। अरुण की कार्य निष्ठा और उच्च आचरण को देखते हुए उन्हें 13 जून, 1971 को 17 पूना हार्स (17 Poona Horse) में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त किया गया।

धर्मसंकट में मीटिंग नहीं, फायरिंग को चुना

अरुण में एक विशेषता थी कि वे हर काम को पूरी लगन और निष्ठा से करते थे। यह उनका बहुत बड़ा सद्गुण माना जाता कि वे हर काम को खुशी-खुशी किया करते थे। इसका एक उहाहरण भी है। जब वे भारतीय अकादमी में सीनियर अण्डर ऑफिसर थे, उनका ये गुण स्पष्ट रूप से मुखर हुआ। उन्हें दो आदेश एक साथ मिले। एक आदेश ने उन्हें 11 बजे दिन में लाइब्रेरी की एक मीटिंग में भाग लेने को कहा और उसी दिन दूसरा आदेश उन्हें ठीक उसी समय, यानी 11 बजे फायरिंग रेंज में जाने का मिला। स्पष्ट था कि एक साथ एक ही समय में दो स्थानों पर जाना संभव नहीं था, परंतु इस विरोधाभासी आदेशों पर सवाल उठाना उनकी प्रकृति में नहीं था। उन्होंने फायरिंग रेंज में जाना स्वीकार किया और वहाँ ठीक समय पर पहुँच कर अपनी ड्यूटी की। बाद में लाइब्रेरी की मीटिंग में न पहुँचने के कारण उन्हें दण्ड स्वरूप सीनियर अण्डर ऑफिसर से एक पद नीचे उतार दिया गया यानी पदावनत कर दिया गया। उन्होंने यह दण्ड बिना किसी तर्क-वितर्क के स्वीकार कर लिया। उन्होंने कोई हंगामा या बखेड़ा नहीं खड़ा किया। यद्यपि बाद में जब अकादमी के वरिष्ठ अधिकारियों को वास्तविक सत्य का पता चला, तो उन्होंने अपनी भूल स्वीकारते हुए अरुण को पुनः सीनियर अण्डर ऑफिसर बना दिया।

धधकते टैंक के साथ की भारत की रक्षा

अरुण खेत्रपाल के कार्यकाल के दौरान पूर्वी पाकिस्तान की सरकार और सेना पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में बर्बरता व अत्याचार का कहर बरपा रही थीं। पश्चिमी पाकिस्तान से हजारों पीड़ित हिन्दू (बांग्ला भाषी) पाकिस्तानी भारत की सीमा में शरणार्थी के रूप में प्रवेश कर रहे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इससे परेशान थीं। इसका हल निकालने के लिए इंदिरा ने 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। कई मोर्चों पर लड़ाई शुरू हुई। अरुण खेत्रपाल को भी एक स्क्वॉड्रन की कमान संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई। 16 दिसंबर, 1971 को जब अरुण खेत्रपाल एक स्क्वॉड्रन की कमान संभालते ड्यूटी पर तैनात थे, तभी शकरगढ़ सेक्टर के जरपाल पर तैनात दूसरे स्क्वॉड्रन ने अरुण की स्क्वॉड्रन से मदद मांगी। सहायता का संदेश मिलते ही अरुण खेत्रपाल किसी उच्चाधिकारी की अनुमति की प्रतीक्षा जैसी औपचारिकताएँ न करते हुए स्वेच्छापूर्वक अपनी टुकड़ी लेकर मदद के लिए चल पड़े। अरुण खेत्रपाल के इस कूच में उनके टैंक पर वे स्वयं थे, जो दुश्मन की गोलाबारी से बेपरवाह उनके टैंकों को बर्बाद करते जा रहे थे। उसी दौरान उनका टैंक दुश्मन के निशाने पर आ गया और उसमें आग लग गई। अरुण के कमाण्डर ने उन्हें टैंक छोड़ कर अलग हो जाने का आदेश दिया, परंतु अरुण को इस बात का एहसास था कि उनका डटे रहना दुश्मन को रोके रखने के लिए कितना ज़रूरी है। इसीलिए वे धधकते टैंक के साथ डटे रहे। इतना ही नहीं, उन्होंने 100 मीटर दूर दुश्मन का एक टैंक बर्बाद भी कर दिया। उनके टैंक पर लगातार पाकिस्तानी सैनिक हमला करते रहे और एक वार ऐसा हुआ कि उनके टैंक ने काम करना बंद कर दिया। परिणामस्वरूप अरुण खेत्रपाल वीरगति को प्राप्त हुए, परंतु उनकी शहादत ने उनकी टुकड़ी के जोश से भर दिया। अरुण की शहादत के बाद उनके साथी घायल शेर की तरह दुश्मन पर टूट पड़े और उन्हें भारतीय सीमा से खदेड़ दिया।

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