तिरंगे की आन, बान और शान पर मर- मिटे ‘कनक और किनारीवाला’

अहमदाबाद, 20, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। 1942 का वह दौर, जब स्वतंत्रता आन्दोलन अपने चरम पर था। माँ भारती स्वतंत्रता से बस कुछ ही दूरी पर थीं। भारत का हर युवक-युवती माँ भारती के पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियों को काट कर फेंकने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा था, उस समय चारों ओर एक ही नारा गूँज रहा था “अंग्रेजो भारत छोड़ो।” 9 अगस्त, 1942 को गांधीजी के आह्वान पर समूचे देश में एक साथ यह आंदोलन आरम्भ हो चुका था। इस नारे के चीत्कार ने सभी क्रांतिकारियों को इस आग में कूद पड़ने की प्रेरणा दी। इसी प्रेरणा से ओत-प्रोत असम के तेजपुर में रहने वाली भारतीय वीरांगना कनकलता बरुआ भी 20 सितंबर, 1942 को हाथ में तिरंगा लिए माँ भारती को स्वतंत्र कराने निकल पड़ीं थी। दूसरी तरफ भारत छो़ड़ो आंदोलन की घोषणा होने पर अहमदाबाद में भी कॉलेज के विद्यार्थियों ने तिरंगा हाथ में लेकर अंग्रेजों के विरूद्ध मोर्चा खोल दिया था, जिसकी अगुआई की थी, विनोद जमनादास किनारीवाला ने। तिरंगा हाथ में लिए माँ भारती के ये दोनों सिपाही अपने-अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़े थे, तभी अचानक अंग्रेजों ने उन पर गोलियाँ बरसाईं और इन दोनों क्रांतिकारियों ने हँसते-हँसते सीने पर गोली खाई, परंतु तिरंगे की शान नहीं घटने दी। माँ भारती की स्वतंत्रता के लिए दोनों ने स्वयं के प्राणों का बलिदान दिया। आज हम इन्हीं दोनों महान क्राँतिकारियों को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि तिरंगे पर प्राण देने वाली कनकलता की आज 77वीं पुण्यतिथि है और तिरंगे को अंग्रेजों के हाथों में न जाने देने के लिए सीने पर गोली खाने वाले महान क्राँतिकारी विनोद किनारीवाला का 77वाँ जन्म दिवस भी है। आज हम आपको इन दोनों क्राँतिकारियों के बलिदान की महान गाथा बताने जा रहे हैं। आइए सबसे पहले जानते हैं माँ भारती की बेटी कनकलता बरुआ के बारे में, जिन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में अपने प्राण माँ भारती के लिये बलिदान कर दिए।

कनकलता माँ भारती की ‘कनक’

कनकलता माँ भारती पर बलिदान होने वाली वीरांगना भले ही उम्र में छोटी थीं, परंतु उनके त्याग और बलिदान का कद बहुत ऊँचा था। भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के 43 दिन बाद यानी 20 सितंबर, 1942 को क्रांतिकारियों की एक सभा हुई, जिसमें तय किया गया कि असम के तेजपुर थाने पर तिरंगा झंडा फहराया जाए और सभी तिरंगा फहराने तेजपुर थाना पहुँचे। तिरंगा फहराने आई भीड़ पर अंग्रेजों ने गोलियाँ दागी, जिसमें कनकलता बरुआ शहीद हो गईं। कनकलता बरुआ का जन्म 22 दिसंबर, 1924 को असम के बारंगबाड़ी गांव निवासी कृष्णकांत बरुआ और कर्णेश्वरी देवी बरुआ के घर हुआ था। कनकलता जब मात्र पाँच वर्ष की थी, तभी उनकी माता कर्णेश्वरी देवी की मृत्यु हो गई थी। पिता कृष्णकांत ने दूसरा विवाह किया था, परंतु 1938 में उनके पिता का भी देहांत हो गया था और कुछ दिन बाद सौतेली माँ भी चल बसीं थी। कनकलता के पालन-पोषण का दायित्व उनकी नानी पर आ गया था। देश उस समय गुलामी की आग में झुलस रहा था, जिसकी लपटें नन्हीं-सी कनकलता तक भी पहुँच रही थीं। इसी दौरान मई 1931 में कनक के गमेरी गाँव में रैयत सभा (जो कि ग्राम समन्वयक समिति होती है) आयोजित हुई। उस समय कनकलता मात्र सात वर्ष की थीं, वह अपने मामा देवेन्द्र नाथ और यदुराम बोस के साथ इस सभा में पहुँची थी। सभा के अध्यक्ष उस समय के प्रसिद्ध साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी ज्योति प्रसाद अग्रवाल कर रहे थे। उनके असमिया भाषा में लिखे गीत घर-घर में लोकप्रिय थे। अग्रवाल के गीतों से कनकलता भी प्रभावित और प्रेरित हुईं, और कनकलता के बाल-मन पर राष्ट्र-भक्ति का बीज अंकुरित हो गया।

9 अगस्त, 1942 को मुंबई में कांग्रेस महासभा में‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’प्रस्ताव पारित हुआ। इसके बाद यह आंदोलन ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध देश के कोने-कोने से एक साथ प्रारम्भ हुआ। कनकलता के गाँव तेजपुर में भी इस आँदोलन की लहर आ पहुँची और असम के क्रांतिकारी इस आंदोलन में कूद पड़े। कई क्राँतिकारियों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया। इसके बाद आंदोलन की बागडोर ज्योति प्रसाद अग्रवाल ने सँभाली। उनके नेतृत्व में एक गुप्त सभा आयोजित की गई। सभा में 20 सितंबर, 1942 को तेजपुर के थाने पर तिरंगा झंडा फहराने का निर्णय लिया गया। तेजपुर से 82 किलोमीटर दूर गहपुर थाने पर तिरंगा फहराया जाना था। कनकलता सुबह-सुबह घर का काम समाप्त कर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ीं। कनकलता आत्म बलिदानी दल की सदस्या थीं। गहपुर थाने की ओर चारों दिशाओं से जुलूस उमड़ रहा था। उस आत्म बलिदानी जुलूस में सभी युवक और युवतियाँ ही थे। दोनों हाथों में तिरंगा झंडा थामे कनकलता उस जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं। जुलूस के नेताओं को संदेह था, कि कनकलता और उसके साथी गोली खाने के डर से भाग जाएँगे। कनक उनका संदेह भाँप गईं और शेरनी के समान गरज कर बोलीं “हम युवतियों को अबला समझने की भूल मत कीजिए। आत्मा अमर है, नाशवान है, हम तो मात्र शरीर हैं। अतः हम किसी से क्यों डरें ?” ‘करेंगे या मरेंगे’‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’, जैसे नारे लगाते हुए वे थाने की ओर बढ़ चलीं। क्रांतिकारियों का जूलूस थाने पहुँचा, सभी सदस्यों में थाने पर झंडा फहराने की होड़ लग गई। हर एक व्यक्ति सबसे पहले झंडा फहराने को बेचैन था, तभी थाने का प्रभारी पी. एम. सोम जुलूस को रोकने के लिए सामने आ खड़ा हुआ। कनकलता ने उससे कहा- “हमारा रास्ता मत रोकिए। हम आपसे संघर्ष करने नहीं आए हैं। हम तो थाने पर तिरंगा फहरा कर स्वतंत्रता की ज्योति जलाने आए हैं। इसके बाद हम लौट जायेंगे।”

थाने के प्रभारी ने कनकलता को डाँटते हुए कहा, कि यदि तुम लोग एक इंच भी आगे बढ़े तो गोलियों से उड़ा दिए जाओगे। इसके बावजूद कनकलता आगे बढ़ीं और कहा- “हमारी स्वतंत्रता की ज्योति बुझ नहीं सकती। तुम गोलियाँ चला सकते हो, पर हमें कर्तव्य विमुख नहीं कर सकते।” इतना कह कर वह ज्यों ही आगे बढ़ीं, पुलिस ने जुलूस पर गोलियों की बौछार कर दी। पहली गोली कनकलता ने अपनी छाती पर झेली। कनकलता गोली लगने पर गिर पड़ीं, किंतु उनके हाथों का तिरंगा नहीं झुका। उनका साहस व बलिदान देख कर युवकों का जोश और बढ़ गया। कनकलता के हाथ से तिरंगा लेकर गोलियों के सामने सीना तान कर वीर बलिदानी युवक आगे बढ़े। एक के बाद एक गिरते गए, किंतु झंडे को न तो उन्होंने झुकने दिया और न ही गिरने दिया। वे एक के बाद दूसरे हाथ में तिरंगे को थामते गए और अंत में रामपति राजखोवा ने सफलतापूर्वक थाने पर झंडा फहरा दिया। कनकलता का शव स्वतंत्रता सेनानी अपने कंधों पर उठा कर उनके घर तक ले जाने में सफल रहे। उनका अंतिम संस्कार इनके गाँव बारंगबाड़ी में किया गया। इस प्रकार अपने प्राणों की आहुति देकर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती देने का काम किया।

किनारीवाला ने हँसते-हँसते सीने पर खाई गोली

जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, गांधीजी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 9 अगस्त 1942 की रात को ही तत्कालीन बम्बई वर्तमान मुंबई से अंग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी कर दिया। ब्रिटिश शासकों ने आंदोलन को रोकने के लिए महात्मा गांधी, नेहरू, सरदार पटेल, सरोजिनी नायडू सहित कई प्रमुख नेताओं को 9 अगस्त की सुबह 6 बजे ही दिल्ली के बिरला हाउस से गिरफ्तार कर लिया, परंतु अंग्रेजों के लिए अब बहुत देर हो चुकी थी, आंदोलन की आग पूरे भारत में फैलते हुए अहमदाबाद तक पहुँच चुकी थी। अहमदाबाद के गुजरात कॉलेज, एच. एल. कॉलेज ऑफ कॉमर्स, एल. डी. आर्ट्स कॉलेज और सर एल. ए. शाह लॉ कॉलेज के छात्रों का आंदोलन राष्ट्रीय विद्यार्थी मंडल के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा था, जिसमें शामिल थे विनोद किनारीवाला, जिन्होंने भी मात्र 18 वर्ष की आयु में सीने पर गोली खाकर तिरंगे के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया। विनोद किनारीवाला का जन्म 20 सितंबर, 1924 को अहमदाबाद शहर में हुआ था। आज उनका 77वाँ जन्म दिवस है।

जब 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा हुई, तब किनारीवाला गुजरात कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे। आंदोलन की शुरूआत के पहले दिन से कॉलेज में विरोध प्रदर्शन आरम्भ हो चुका था। अहमदाबाद में बढ़ता आंदोलन अब ब्रिटिश के हाथों से निकलता जा रहा था। मांडवी की पोल, आस्टोडिया, रायपुर, खाडिया, गांधी रोड जैसे क्षेत्रों में स्थिति पर नियंत्रण पाना मुश्किल हो रहा था। शाम करीब पांच बजे खाडिया डाक घर के पास आंदोलनकारियों का बड़ा जुलूस निकला। पुलिस ने उन पर गोलीबारी की, जिसमें उमाकांत कडिया शहीद हो गये। अगले दिन 10 अगस्त को सुबह पुलिस ने गुजरात कॉलेज परिसर और छात्रावास पर लाठीचार्ज और गोलीबारी की। इससे पूरे शहर में रोष भडक़ उठा। इसके विरुद्ध लॉ कॉलेज से छात्रों का एक जुलूस निकला और गुजरात कॉलेज पहुँचा। जुलूस में करीब एक हजार छात्र थे। अग्रिम पंक्ति में विनोद किनारीवाला सहित कुछ छात्र हाथों में तिरंगा लिए हुए थे। अंग्रेज सार्जेंट ने छात्रों के हाथ से राष्ट्र ध्वज छीनने की कोशिश की। इससे पुलिस और छात्रों में झड़प हुई। उत्तेजित छात्रों ने पुलिस पर जम कर पथराव किया। इससे गुस्साई पुलिस ने सीधे गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में एक गोली विनोद किनारीवाला को लगी और वे कॉलेज परिसर में ही शहीद हो गए। गोलीबारी में कई छात्र घायल भी हुए। पुलिस के दमनचक्र और किनारीवाला की शहादत से आंदोलनकारियों का रोष और भडक़ा। इसके बाद 29 अगस्त को युवतियों के एक जुलूस ने अहमदाबाद महानगर पालिका भवन पर राष्ट्र ध्वज फहराया। स्वतंत्रता के बाद 1947 में गुजरात कॉलेज परिसर में वीर विनोद किनारीवाला मेमोरियल और उनकी प्रतिमा का क्रांतिकारी जय प्रकाश नारायण ने उद्घाटन किया। साथ ही जिस सड़क पर वह गोली लगने से शहीद हुए थे, उसका नाम भी शहीद वीर किनारीवाला मार्ग रखा गया।

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