कौन है यह युवा महिला IFS अधिकारी, जो मोदी की आवाज़ बन गईं ?

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 12 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। यूं तो पीएम मोदी विदेश नीति के चलते अक्सर दौरे पर रहते हैं, पर्ंतु इस बार वे कहीं और नहीं अपितु भारत के महाबलिपुरम में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दौरे पर हैं। हम सभी जानते हैं कि अपने दौरे के दौरान मोदी को हिन्दी भाषा बोलना अधिक भाता है यही कारण है कि विदेश दौरे पर भी वे अपने संबोधन में हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं। अब सोचने वाली बात ये है कि चीन के राष्ट्रपति शी को तो मंदारिन भाषा यानी चीनी भाषा आती है, तो ऐसे में दोनों दिग्गज आपस में वार्तालाप कैसे करेंगे? परंतु आप तो जानते ही हैं कि मोदी हैं तो मुमकिन है। उनकी भाषा की दीवार को तोड़ने का काम आईएफएस अधिकारी प्रियंका सोहानी को सौंपी गई जिसे उन्होंने बाखूबी निभाया। प्रियंका PM मोदी के साथ उनके साये केेकी तरह रहीं और दोनों के बीच होने वाले वार्तालाप को प्रियंका ने उनकी भाषा में समझाया, जिससे भारत और चीन के बीच एक सुखद वार्ता को अंजाम मिला। आइए जानते हैं कौन है प्रियंका सोहानी और क्या है उनके कार्य?

प्रियंका सोहानी महाराष्ट्र की रहने वाली हैं। महाराष्‍ट्र से यूपीएससी में 2012 बैच के सफल अधिकारियों में तीसरे नंबर पर रही थीं और यूपीएससी परीक्षा में 26 रैंक प्राप्त किए थे। प्रियंका 2016 से चीन में भारतीय दूतावास में सेवारत हुईं और मंदारिन (चीनी) भाषा सीखी। प्रियंका विदेश मंत्रालय के बेस्‍ट ट्रेनी ऑफिसर में से एक थी, जिसके लिए उन्हें गोल्‍ड मेडल भी मिल चुका है। उनके बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए तत्‍कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह ने उन्हें बिमल सान्‍याल पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया था।

भारतीय विदेश सेवा (Indian Foreign Service) यानी IFS को भारतीय विदेश मन्त्रालय के कार्य को चलाने के लिए गठित किया गया था। 13 सितंबर 1783 को ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक मंडल ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के फोर्ट विलियम में एक ऐसा विभाग बनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया, जो वारेन हेस्टिंग्स प्रशासन पर इसके द्वारा “गोपनीय एवं राजनीतिक कारोबार” के संचालन में “दबाव को कम करने” में मदद कर सके। हालांकि इसकी स्थापना कंपनी ने की थी, परंतु आगे चलकर भारतीय विदेश विभाग ने विदेशी यूरोपीय शक्तियों के साथ मिलकर कारोबार किया। शुरुआत से ही विदेश विभाग के विदेशी और राजनीतिक कार्यों के बीच एक अंतर रखा गया जिसमें सभी “एशियाई शक्तियों” को राजनीतिक के रूप में और यूरोपीय शक्तियों को विदेशी के रूप स्थान दिया गया। 1843 में भारत के गवर्नर-जनरल एडवर्ड लॉ, एलेनबोरो के पहले अर्ल ने सरकार के सचिवालय को चार विभागों विदेश, गृह, वित्त और सैन्य विभाग में व्यवस्थित कर प्रशासनिक सुधारों को अंजाम दिया। विदेश विभाग के सचिव को “सरकार के बाह्य और आंतरिक राजनयिक संबंधों से संबंधित सभी तरह के पत्राचार के संचालन” का कार्यभार सौंपा गया।

सितंबर 1946 को भारत की आजादी से पहले भारत सरकार ने विदेशों में भारत के कूटनीतिक, दूतावास संबंधी और वाणिज्यिक प्रतिनिधित्व के लिए भारतीय विदेश सेवा की स्थापना की। आजादी के साथ ही विदेशी और राजनीतिक विभाग का लगभग-पूर्ण रूपांतरण एक ऐसे स्वरूप में कर दिया गया, जो उस समय का नया विदेशी मामलों और राष्ट्रमंडल संबंधों का मंत्रालय बना।

1948 में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा के तहत नियुक्त भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों के पहले समूह ने इस सेवा में अपना योगदान दिया। 1949 में सी. बी मुथम्मा ( Chonira Belliappa Muthamma ) भारतीय विदेश सेवा (IFS) में शामिल हुई और पहली भारतीय महिला राजनयिक तथा उसके पहली भारतीय महिला राजदूत भी बनीं। उन्होंने 1948 में सिविल सर्विसेज सेवा परीक्षा में टॉप किया था। इस परीक्षा को आज भी नए आईएफएस अधिकारियों के चयन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। संपूर्ण चयन प्रक्रिया लगभग 12 महीनों तक चलती है। लगभग 400,000 प्रतिभागियों में से प्रति वर्ष लगभग 800 से 900 उम्मीदवारों का चयन अंतिम रूप से किया जाता है, परंतु मात्र एक अच्छी रैंक ही आईएफएस में चयनित की जाती है।

आईएफएस में चयन के बाद प्रशिक्षण की शुरुआत 1 सितंबर, 1959 को मसूरी में स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration) यानी LBSNAA में होती है, जहाँ कई विशिष्ट भारतीय सिविल सेवा संगठनों के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जाता है। LBSNAA का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद परिक्षार्थी आगे प्रशिक्षण के साथ-साथ विभिन्न सरकारी निकायों के साथ संलग्न होने और भारत एवं विदेश में भ्रमण के लिए नई दिल्ली में स्थित विदेश सेवा संस्थान में दाखिला लेता है। संपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम 36 महीनों की अवधि का होता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन पर अधिकारी को अनिवार्य रूप से एक विदेशी भाषा (सीएफएल) सीखना होता है। एक संक्षिप्त अवधि तक विदेशी मामलों के मंत्रालय से संलग्न रहने के बाद अधिकारी को विदेश में एक भारतीय राजनयिक मिशन पर नियुक्त किया जाता है। उनका कार्य स्थान दूतावास, विदेश मंत्रालय और वाणिज्य दूतावास में होता है। जहाँ वो एक सलाहकार, सचिव, मंत्री और अध्यक्ष के पद पर कार्य करते हैं।

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