जोगिंदर सिंह, जिनकी पलटन के आगे पस्त हो गए थे चीनी सैनिक, परंतु…

* भारत-चीन युद्ध 1962 में ‘बुम ला’ की लड़ाई के नायक

* जब भारत ने दिया परमवीर चक्र, तो चीन ने भी किया SALUTE

* दुश्मनों से लड़ते हुए ‘फ़ना’ और ‘फूल’ बन कर लौटे

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 23 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत-चीन युद्ध 1962 में चीन के साथ कई मोर्चों पर भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों की आहूति देते हुए भीषण युद्ध लड़ा। ऐसा ही एक मोर्चा था बुम ला। अरुणाचल प्रदेश में चीन सीमा पर स्थित बुम ला मोर्चे की लड़ाई भारत के वीर सपूतों की अनेक गाथाओं में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ती है। हर तरफ गोलियों और बम-बारूदों के धमाके। एक तरफ शहीद होते साथी भारतीय सैनिक और दूसरी तरफ 200 की संख्या में आगे बढ़ते दुश्मन चीनी सैनिक। फिर अचानक भारतीय सैनिकों की तरफ एक गंभीर सन्नाटा फैल गया, क्योंकि अब उनके पास बची थीं सिर्फ खाली बंदूकें। दुश्मन अब भी गोलियाँ बरसाते हुए भारतीय सैनिकों की ओर बढ़ रहे थे। ख़तरे को आगे बढ़ता देख भारतीय सैनिकों की पलटन का नेतृत्व कर रहे सूबेदार जोगिंदर सिंह ने उस भीषण परिस्थिति में भी युद्ध कौशल्य का परिचय देते हुए घायल जवानों को फिर से खड़ा किया। उनकी खाली बंदूकों पर बेयोनेट यानी चाकू बांध दिये। इसके बाद जोगिंदर सिंह के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ का नारा लगाते हुए चीनी सैनिकों पर धावा बोल दिया। बंदूक में लगे चाकू से एक के बाद एक कई चीनी सैनिक मारे गए। जोगिंदर सिंह और उनके साथियों ने चीनी सेना डट कर सामना किया। आज हम परमवीर चक्र विजेता सूबेदार जोगिंदर सिंह को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि वे एक ऐसे योद्धा थे, जो देश के लिए फ़ना हो गए और फिर फूल बन कर लौटे थे। आज इस वीर भारतीय सपूत सूबेदार जोगिंदर सिंह का 57वाँ बलिदान दिवस (पुण्यतिथि) है। आइए जानते जोगिंदर सिंह की शहादत की पूरी कहानी, जिन्हें दुश्मन चीन ने युद्ध बंदी बनाने के बावजूद उनकी अस्थियों को ससम्मान भारत को लौटाया था।

सैनिक बनना ही था जीवन का लक्ष्य

जोगिंदर सिंह का जन्म 26 सितंबर 1921 को पंजाब में फरीदकोट जिले के मोगा स्थित मेहला कलाँ गाँव में हुआ था। उनके पिता शेर सिंह और बीबी कृष्ण कौर मूल रूप से होशियारपुर के मुनका गाँव के रहने वाले थे। उनके पिता एक किसान थे। जोगिंदर सिंह ने नाथू आला गाँव की एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई की और फिर दरौली गाँव के मिडिल स्कूल में पढ़े। जोगिंदर बचपन से ही सेना में जाना चाहते थे। उनका मन तो सेना में शामिल होने के बारे में ही लगातार सोचता था। किसी और काम में उनका मन नहीं लगता था। उन्हें लगता था सेना में शामिल होकर राष्ट्र की सेवा करना ही उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण काम है। अपने सपने को साकार करने के लिए जोगिंदर ने जम कर तैयारी की और 28 सितंबर 1936 को वह भारतीय सेना (Indian Army) की सिख रेजीमेंट (Sikh Regiment) में सिपाही के तौर पर भर्ती होने में सफल हो गए। सिख रेजीमेंट भारतीय सेना का एक पैदल सैन्य दल (Infantry Regiment) है, जिसकी स्थापना 1 अगस्त, 1846 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ( East India Company ) ने पंजाब में की थी। सेना में आने के बाद भी जोगिंदर ने पढ़ाई जारी रखी और अपनी यूनिट के शिक्षा प्रशिक्षक (Education Instructor) बनाए गए। 1948 में जब कश्मीर पर पाकिस्तानी कबाइलियोंने कश्मीर पर हमला किया, तब बर्मा में तैनात सिख रेजीमेंट को कश्मीर भेजा गया, जिसमें जोगिंदर सिंह भी शामिल थे। भारतीय सैनिकों ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुए इस पहले युद्ध में पाकिस्तानी सैनिकों और कबाइलियों को कश्मीर के दो तिहाई हिस्से से खदेड़ दिया था।

जब चीन ने आरंभ किया अतिक्रमण

इस बीच 1962 में चीन ने भारतीय सीमाओं में अतिक्रमण शुरू किया। अगस्त-1962 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (People’s Liberation Army) यानी PAL ने भारत पर हमला कर दिया। भारतीय सेना तैयार नहीं थी। चीन और पीएएल ने अक्साई चिन और पूर्वी सीमा (नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) पर अपनी दावेदारी दिखाते हुए थगला रिज पर कब्ज़ा कर लिया। चीनी अतिक्रमण के दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू लंदन दौरे पर थे। तत्कालीन रक्षा मंत्री वेंगलिल कृष्णन कृष्णा मेनन (Vengalil Krishnan Krishna Menon) ने 22 सितंबर, 1962 को प्रधानमंत्री नेहरू की सहमति से सेनाध्यक्ष को थगला रिज से चीन को बाहर खदेड़ने का आदेश दिया। भारतीय सेना की नई IV Corps (गजराज कॉर्प्स ) ने इस असंभव काम के लिए टुकड़ियों को इकट्ठा किया। IV कॉर्प्स 1961 में बनाई गई भारतीय सेना का एक सैन्य क्षेत्र है। आईवी कॉर्ब्स के जवान कुछ करते, उससे पहले 20 अक्टूबर, 1962 को नमखा चू सेक्टर और लद्दाख समेत पूर्वी सीमा की बहुत सारी जमीनों पर कब्जा कर लिया। इसी दिन यानी 20 अक्टूबर, 1962 को ही भारत-चीन युद्ध की अधिकृत घोषणा हो गई। अब चीनी धोला-थगला की ओर बढ़ने लगे, क्योंकि चीन को तवांग पर कब्ज़ा करना था, जो उसकी सबसे बड़ी चाहत थी। भारत के सामने अब चीनी सैनिकों को रोकना एक चुनौती बन गई। इस समस्या से लड़ने के लिए और चीनियों को तवांग पर नियंत्रण करने से रोकने के लिए भारतीय सेना ने अपनी पहली सिख बटालियन को भेजा, जिसका नेतृत्व सूबेदार जोगिंदर सिंह को सौंपा गया।

जोगी बन कर निकल पड़े जोगिंदर

जोगिंदर सिंह पूरी तैयारी के साथ अपनी पलटन को लेकर चीनियों को रोकने के लिए निकल पड़े। उस समय चीनी सेना का एक पूरा डिवीज़न बमला इलाके में जमा हो चुका था, जहाँ से तवांग सिर्फ 26 किलोमीटर की दूरी पर था। जोगिंदर ने अपनी सिख बटालियन की एक डेल्टा कंपनी को लेकर ट्विन पीक्स से एक किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में टॉन्गपेंग ला पर बेस बनाया, क्योंकि ट्विन पीक्स से खड़े होकर मैकमोहन लाइन तक चीन की हर हरक़त पर नजर रखी जा सकती थी। अब दुश्मन को बमला से ट्विन पीक्स तक पहुँचने से रोकना था। इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण जगह थी आईबी रिज, जहाँ कमांडर लेफ्टिनेंट हरीपाल कौशिक की डेल्टा कंपनी की 11वीं प्लाटून तैनात थी। सिखों की इस पलटन को तोपों और गोलाबारी से कवर देने के लिए 7वीं बंगाल माउंटेन बैटरी भी वहीं पहुँच चुकी थी। 20 अक्टूबर, 1962 की सुबह बॉर्डर के पार सैकड़ों की तादाद में चीनी फौज जमा होने लगी। असम राइफल्स की बमला आउटपोस्ट के एक जेसीओ ने जब चीनी सैनिकों को जमा होते देख, तो तुरंत उसने 11वीं प्लाटून को सावधान किया। जोगिंदर सिंह ने भी हलवदार सुचा सिंह के नेतृत्व में एक सेक्शन बमला पोस्ट भेजा। फिर उन्होंने अपने कंपनी हेडक्वार्टर से ‘सेकेंड लाइन’ गोला-बारूद मुहैया कराने के लिए कहा। 23 अक्टूबर, 1962 की तड़के 4 बज कर 30 मिनट पर चीनी सेना ने मोर्टार और एंटी-टैंक बंदूकों का मुँह खोल दिया, जिससे भारतीय बंकर नष्ट किए जा सकें। सुबह 6 बजे तक चीनियों ने असम राइफल्स की पोस्ट पर हमला कर दिया और सुचा सिंह ने उनका जम कर मुक़ाबला किया। जब स्थिति उनके हाथ से निकलने लगी, तो वे आईबी रिज की पलटन में लौट आए। अगले दिन यानी 24 अक्टूबर, 1962 की सुबह चीनी सेना ने ट्विन पीक्स पर कब्ज़ा करने के लिए आईबी रिज पर आक्रमण कर दिया।

‘हर गोली का हिसाब होना चाहिए’

जोगिंदर सिंह भी पूरी योजना से साथ ट्विन पीक्स पर तैनात थे। उन्हें यहाँ की भौगोलिक स्थिति की बहुत अच्छे से समझ थी और स्थानीय संसाधनों का अच्छा प्रयोग करना जानते थे। आईबी रिज पर उन्होंने पहले से ही चतुर प्लानिंग के साथ बंकर और खंदकें बना ली थीं। उनकी पलटन के पास सिर्फ चार दिन का राशन था। उन लोगों के जूते और कपड़े सर्दियों और उस स्थान के अनुकूल नहीं थे। हिमालय की ठंड रीढ़ में सिहरन दौड़ाने वाली थी परंतु जोगिंदर ने अपने साथियों में जोश भरा, उन्हें लक्ष्य पर नजर बनाए रखने के लिए प्रेरित किया। जोगिंदर ने साथियों में इतना जोश भरा और लड़ाई के लिए तैयार किया कि वे नये होने के बावजूद एक अऩुभवी सिपाही की तरह चीनी सैनिकों (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) को एक अविस्मरणीय टक्कर दे सकें। सूबेदार जोगिंदर सिंह को ये पता था कि चीनी फौज बमला से तीखी चढ़ाई करके आ रही है और वे लोग अधिक मजबूत आईबी रिज पर बैठे हैं यानी सिख पलटन अपनी पुरानी ली एनफील्ड 303 राइफल्स से भी दुश्मन को कुचल सकती है। इसके अलावा उनके पास गोलियाँ भी कम थीं, इसलिए जोगिंदर सिंह ने अपने सैनिकों से कहा, ‘हर गोली का हिसाब होना चाहिए, जब तक दुश्मन रेंज में न आए, तब तक फायर रोक कर रखो और उसके बाद चलाओ।’

बंदूकों को बना लिया चाकू

लड़ाई शुरू हो गई। 200 चीनी सैनिक सिख पलटन के सामने थे, परंतु जोगिंदर सिंह और उनके साथियों ने चीनी सेना का बुरा हाल कर दिया। यद्यपि उनके बहुत सारे सैनिक घायल हो गए। उनका जवाब इतना प्रचंड था कि चीनी सेना को पहले छुपना पड़ा और उसके बाद उसे पीछे हटने को विवश होना पड़ा। इसके बाद जोगिंदर ने टॉन्गपेंग ला के कमांड सेंटर से और गोला-बारूद भिजवाने के लिए कहा, परंतु जब तक मदद मिलती, तब तक और 200 चीनी सैनिक आ गए और उन्होंने सिख पलटन पर हमला कर दिया। भीषण गोलीबारी हुई। जोगिंदर को चीनी सैनिकों द्वारा मशीन गन से की जा रही गोलीबारी में एक गोली जांघ में लगी। वे एक बंकर में घुस गए। घालय होने के बाद भी जोगिंदर साथियों को चिल्ला-चिल्ला कर निर्देश देते रहे। जब उनका गनर शहीद हो गया, तो उन्होंने 2 इंच वाली मोर्टार खुद ले ली और चीनी सैनिकों पर कई राउंड गोलीबारी की। जोगिंदर की पलटन के ज्यादातर साथी शहीद हो चुके थे या बुरी तरह घायल थे। उसी दौरान डेल्टा कंपनी के कमांडर लेफ्टिनेंट हरीपाल कौशिक ने आने वाला खतरा भाँपते हुए रेडियो पर संदेश भेजा, जिसे रिसीव करके सूबेदार जोगिंदर सिंह ने ‘जी साब’ कहा, ये उनके अंतिम शब्द थे। उनकी पलटन के पास बारूद ख़त्म हो चुका था। सूबेदार जोगिंदर सिंह ने अपनी पलटन के बचे-खुचे सैनिकों को तैयार किया और अंतिम आक्रमण करने के लिए अपनी-अपनी बंदूकों पर बेयोनेट यानी चाकू लगा कर, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के नारे लगाते हुए चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया और कइयों को काट डाला। संख्या में अधिक होने कारण चीनी सैनिक आते गए और अंतत: घायल सूबेदार जोगिंदर सिंह को उन्होंने युद्ध बंदी के रूप में ग़िरफ्तार कर लिया। सूबेदार जोगिंदर सिंह का 23 अक्टूबर, 1962 को चीनी युद्ध बंदी के रूप में ही निधन हो गया।

भारत ने जोगिंदर के जज़्बे को किया सलाम

भारत सरकार ने सूबेदार जोगिंदर सिंह के अदम्य साहस के लिए उन्हें सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘मरणोपरांत परमवीर चक्र’से सम्मानित किया। चीनी आर्मी को जब पता चला कि सूबेदार सिंह को भारत ने परमवीर चक्र से सम्मानित किया है, तो चीनी सरकार ने 17 मई, 1963 को जोगिंदर की अस्थियों को पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनकी बटालियन को सौंप दिया। उनका अस्थि कलश मेरठ में सिख रेजीमेंट के सेंटर में लाया गया। अगले दिन उनकी याद में श्रद्धांजलि सभा रखी गई। उनका अस्थि कलश उनकी पत्नी गुरदयाल कौर और बेटे को सौंप दिया गया।

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