अधिनियम V/S अधिकार : कांग्रेस ने वोट बैंक के लिये इस तरह किया हिन्दुओं से ‘अन्याय’, पढ़िए पूरा मामला

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 21 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। हिन्दु राष्ट्र में हिन्दुत्व का प्रमाण माँगना वैसा ही है जैसा सूरज को दिया दिखाना। बार-बार अपने अस्तित्व की परीक्षा देना हिन्दु और हिन्दु धर्म पर एक प्रश्नचिन्ह लगा देता है। “अहं ब्रह्मास्मि” कहने वाले इस देश में ब्रह्म ही संकट में आ गए हैं, जिसका विनाशक कोई और नहीं, अपितु कांग्रेस पार्टी और उसके कर्ता-धर्ता ही हैं। भारत के महान इतिहास को मिटाने और दबाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने समय-समय पर कई ऐसे कार्य किए, जिससे हिन्दु धर्म अपने ही राष्ट्र में साक्ष्य देने पर विवश हो गया है। कांग्रेस ने सदैव हिन्दुओं को दबाने और अन्य जाति-धर्म विशेष के उत्थान के लिए कार्य किए हैं। कुछ समय पहले भी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मस्ज़िद में नमाज़ पढ़ कर इसका प्रमाण स्वयं ही दे दिया था। गुजरात विधान सभा चुनाव 2017 के दौरान एक तरफ वे जनेऊ धारण कर सोमनाथ के दर्शन करने जाते थे, तो वहीं दूसरी तरफ मस्ज़िद में जाकर स्वयं को मुस्लिम कहते थे। कांग्रेस की हिन्दुओं के प्रति नकारात्मक सोच का ही उदाहरण है अधिनियम 1991, जिसके तहत हिन्दु धार्मिक स्थलों को आज भी अपने साक्ष्य का प्रमाण देने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आइए जानते हैं क्या है अधिनियम 1991 ?

क्या है अधिनियम 1991 ?

पूर्व प्रधानमंत्री पामुलापति वेंकट नरसिंह राव

1991 में कांग्रेस सत्ता में थी, जिसकी बागडोर भले ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पामुलापति वेंकट नरसिंह राव यानी पी.वी नरसिंह राव के हाथ में थी, परंतु उसे चलाने वाले हाथ कांग्रेस के ऐसे प्रतिनिधि के थे, जो सदैव से हिन्दू धर्म के विरोधी रहे। इसीलिए एक ऐसा अधिनियम लागू किया गया, जिसने हिन्दू धर्म के धार्मिक स्थलों को सदैव के लिए समाप्ति के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। इस अधिनियम को उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 (The Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991) नाम दिया गया था। भारतीय संसद में यह अधिनियम 18 सितंबर, 1991 को पारित किया गया था और इसमें 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में आये धार्मिक पूजा स्थलों को यथास्थिति में बनाये रखने का प्रावधान किया गया था। यानि कि स्वतंत्रता के पूर्व ही कांग्रेस हिन्दुओं के विरुद्ध षड़यंत्र रचने लगी थी। अपने इसी मंसूबे को पूरा करने के लिए कांग्रेस ने बिना दोनों पक्षों (हिन्दू-मुस्लिम) से बातचीत किए तत्कालीन सरकार के माध्यम से अधिनियम (पूजा स्थल विशेष प्रावधान अधिनियम 1991) पारित कर दिया था। इस अधिनियम के तहत किसी भी धर्म के पूजा स्थल को एक आस्था से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने और किसी भी स्मारक के धार्मिक आधार पर रखरखाव पर रोक लगा दी गई थी। सूत्रों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के एक जाने-माने वकील एक पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन (PIL) यानी जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थल विशेष प्रावधान अधिनियम 1991 को चुनौती देने जा रहे हैं। इसी अधिनियम को आड़े हाथ लेते हुए शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद वसीम रिज़वी पहले भी कई बार केंद्र सरकार से इस अधिनियम को रद्द करने की माँग कर चुके हैं। रिज़वी का कहना है कि मंदिरों पर जबरन कब्ज़ा कर मस्ज़िद या ईदगाह बनाए जाने के ऐतिहासिक प्रमाण वाली जगहें वापस मूल अधिकार वालों को सौंप दी जानी चाहिए। सोचने वाली बात यह है कि ये अधिनियम ही इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा है, क्योंकि जब सरकार इस अधिनियम को रद्द करेगी, तभी देश भर में ऐसे विवादित धार्मिक स्थलों को उनके मूल अधिकारियों और उपासकों को वापस सौंपना कानूनी रूप से भी आसान हो पाएगा।

बाबरी मस्ज़िद

यह कानून बाबरी संरचना को ध्वस्त करने से पहले लाया गया था और 11 जुलाई, 1991 को लागू हुआ था। इस अधिनियम के अनुच्छेद 3, 6 और 8 तत्काल ही लागू कर दिये गए थे, जिसकी धारा 3 में पूजा स्थलों का रूपांतरण होना शामिल था। इस अधिनियम के तहत अपराध करने पर 3 वर्ष की जेल और अर्थदंड का प्रावधान रखा गया है। इस अपराध को जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8 (खंड “ज” के रूप में) में शामिल किया गया। चूँकि मुगल काल में ही धार्मिक मंदिरों को तोड़ कर मस्ज़िदों में परिवर्तित किया गया था, अतः हिन्दू मंदिरों के पुनः निर्माण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग गया। हालाँकि यह अधिनियम उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या में स्थित राम जन्म भूमि-बाबरी मस्ज़िद और उक्त स्थान या पूजा स्थल से संबंधित किसी भी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही के लिए लागू नहीं होता है। इस अधिनियम ने स्पष्ट रूप से अयोध्या विवाद से संबंधित घटनाओं को वापस करने की अक्षमता को स्वीकार किया। मंदिर को तोड़ कर मस्ज़िद बनाने के कई उदाहरण आपको मिल जाएँगे, जिनमें से कुछ उदाहरण हम आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहे हैं।

भारत के विवादित मंदिर-मस्ज़िद

देश भर में अयोध्या में राम जन्मभूमि के अलावा मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान, काशी विश्वनाथ मंदिर, विदिशा में विजय मंदिर, गुजरात के पाटण में रुद्र महालय, अहमदाबाद में भद्रकाली मंदिर, राजा भोज की प्राचीन नगरी धारा यानी धार में भोजनशाला जैसे आस्था स्थलों को मुगल काल में मनमाने और गैरकानूनी रूप से तोड़ कर मस्ज़िद, दरगाह या फिर ईदगाह बना दिये गये, जिन पर सामाजिक और आग्मिक विवाद चल रहे हैं।

गुजरात का सोमनाथ मंदिर

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक गुजरात के सोमनाथ मंदिर की बात करें, तो इसे अफगान शासक महमूद गजनवी ने 17 बार लूटा था। स्वतंत्रता के बाद ये मंदिर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच भी रोड़ा बना, जिस जूनागढ़ राज्य (अब गीर सोमनाथ जिले) में ये मंदिर स्थापित है, वहाँ के राजा ने इस राज्य को पाकिस्तान में शामिल करने का मन बनाया था, परंतु सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी सूझ-बूझ से इसे भारतीय संघ में शामिल किया था। ई. स. 1026 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट कर दिया था। कहते हैं कि अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने एक यात्रा वृतान्त में इस मंदिर का उल्लेख किया था, जिसे पढ़ कर गजनवी ने लगभग 5 हजार साथियों के साथ इस मंदिर पर हमला कर इसे नष्ट कर दिया था। इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया, हालांकि गजनवी से पहले भी सोमनाथ मंदिर पर कई हमले हो चुके थे और उसके बाद भी मंदिर पर कई हमले किए गए। ई. स. 1706 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः तोड़ दिया। इसके बाद ई. स. 1947 में भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस मंदिर का पुनः निर्माण कराया था।

श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान द्वार

गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर की भाँति मथुरा के श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान पर भी आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने हमला किया था और मंदिर को लूट कर इसे तोड़ दिया था। यह मंदिर तीन बार तोड़ा गया और चार बार दोबारा बनाया जा चुका है। अभी भी इस जगह पर मालिकाना हक के लिए दो पक्षों में कोर्ट में वाद चल रहा है। जिस जगह पर कृष्‍ण का जन्‍मस्‍थान है, उस जगह पर 5 हजार वर्ष पहले मल्‍लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में राजा कंस का कारागार हुआ करत था। इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान कृष्‍ण ने जन्‍म लिया था। कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था। स्थल से मिले शिलालेखों पर ब्राह्मी-लिपि में लिखे लेखों से पता चलता है कि यहाँ शोडास के राज्य काल में वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक मंदिर, उसके तोरण-द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। लगभग 125 वर्ष बाद जहाँगीर के शासनकाल में ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इसी स्थान पर चौथी बार मंदिर बनवाया था। इस मंदिर की भव्यता से चिढ़ कर औरंगजेब ने ई. स. 1669 में इसे तुड़वा दिया और इसके एक भाग पर ईदगाह का निर्माण करवा दिया था। इस परिसर को लेकर कई वर्ष तक अदालत में मामला चला, परंतु दोनों धर्मों के विद्वानों ने ई. स. 1968 में एक समझौता किया था। अदालत के बाहर हुए इस समझौते को अदालत की मान्यता भी मिली है। इसके तहत फ़ैसला किया गया था कि इससे संबंधित सभी मामले समाप्त किए जाएँ। एक मंदिर की स्थापना हो और मस्ज़िद में भी काम चलता रहे।

काशी विश्वनाथ मंदिर

ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में स्थित है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है। इसीलिए आदिलिंग के रूप अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। इस मंदिर को 11वीं सदी में राजा हरिशचन्द्र ने बनवाया था। ई. स. 1194 में मोहम्मद ग़ोरी ने इस मंदिर को लूटने के बाद तुड़वा दिया था, परंतु पुनः इसका निर्माण कराया गया था । इसके बाद ई. स. 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने इसे एक बार फिर तोड़ा। ई. स. 1585 में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट ने इस स्थान पर फिर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। ई. स. 1632 में शाहजहाँ ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेजी थी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को नहीं तोड़ सकी, परंतु काशी के 63 अन्य मंदिरों को तोड़ दिया गया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया था। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साक़ी मुस्तइद खां द्वारा लिखित ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस ध्वंस का वर्णन किया गया है। औरंगजेब के आदेश पर यहाँ का मंदिर तोड़ कर ज्ञानवापी मस्ज़िद बनाई गई थी। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरंगजेब ने प्रति दिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था। आज उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज ब्राह्मण हैं। 7 अगस्त, 1770 को महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति करने का आदेश जारी करवा लिया, परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था। इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया। ई. स. 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर का पुनःनिर्माण करवाया था।

विजय मंदिर या बीजा मंडल

मध्य प्रदेश के विदिशा के किले की सीमा के अंदर पश्चिम की तरफ अवस्थित भेल्लिस्वामिन (सूर्य) मंदिर के नाम पर ही विदिशा का नाम भेलसा पड़ा। सर्वप्रथम इसका उल्लेख ई. स. 1024 में महमूद गजनी के साथ आये विद्धान अल बरुनी ने किया था। अपने समय में यह देश के विशालतम मंदिरों में से एक माना जाता था। साहित्यिक साक्ष्यों के अनुसार यह आधा मील लंबा-चौड़ा था तथा इसकी ऊँचाई 105 गज थी, जिससे इसके कलश दूर से ही दिखते थे। यहाँ सालों-साल यात्रियों का मेला लगा रहता था तथा दिन-रात पूजा-आरती होती थी। इस मंदिर का निर्माण चालुक्य वंशी राजा कृष्ण के प्रधानमंत्री वाचस्पति ने अपनी विदिशा विजय के उपरांत कराया था। मंदिर की वास्तुकला तथा मूर्तियों की बनावट संकेत देते हैं कि 10वीं-11वीं सदी में शासकों ने इस मंदिर का पुननिर्माण किया था। मुस्लिम शासकों के धर्मांध आक्रमणों की शुरुआत परमार काल से आरंभ हो गयी थी। पहला आक्रमण ई. स. 1233-34 में दिल्ली के गुलावंश के शासक इल्तुतमिश ने किया था। उसने पूरे नगर में लूट- खसोट की थी। ई. स. 1250 में इसका पुनर्निर्माण किया गया, परंतु ई. स. 1290 में पुनः अलाउद्दीन खिलजी के मंत्री मलिक काफूर ने इस पर आक्रमण कर लूटपाट की। वहाँ की 8 फुट ऊँची अष्ट धातु की प्रतिमा को दिल्ली स्थित बदायूँ दरवाजे की मस्ज़िद की सीढ़ियों में जड़ दिया गया। ई. स. 1459-60 में मांडू के शासक महमूद खिलजी ने इस मंदिर को लूटा, साथ ही भेलसा नगर व लोह्याद्रि पर्वत के अन्य मंदिरों को भी निशाना बनाया था। इसके बाद ई. स. 1532 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने मंदिर का पुनर्विनाश किया। अंत में धर्मांध औरंगजेब ने ई. स. 1682 में इसे तोपों से उड़वा दिया। शिखरों को तोड़ दिया गया। मंदिर के अष्टकोणी भाग को चुनवा कर चतुष्कोणी बना दिया गया। अवशेष पत्थरों का प्रयोग करके दो मीनारें बनवा दीं तथा उसे एक मस्ज़िद का रूप दे दिया था। मंदिर के पार्श्व भाग में तोप के गोलों के स्पष्ट निशान आज भी मौजूद हैं। औरंगजेब के मृत्योपरांत वहाँ की टूटी- फूटी मूर्तियों को फिर से पूजा जाने लगा। ई. स. 1760 में पेशवा ने इसका मस्ज़िद स्वरूप नष्ट कर दिया। अब भोई आदि (हिंदुओं की निम्न जाति) इसे माता का मंदिर समझ कर भाजी- रोटी से इसकी पूजा करने लगे। स्तंभ पर मिला एक संस्कृत अभिलेख स्पष्ट करता है कि यह मंदिर चर्चिका देवी का था। संभवतः इसी देवी का दूसरा नाम विजया था, जिसके नाम से इसे विजय मंदिर के रूप में जाना जाता रहा। यह नाम “बीजा मंडल’ के रूप में आज भी प्रसिद्ध है।

गुजरात में पाटण जिले के सिद्धपुर में स्थित रुद्र महालय मंदिर या रुद्रमल मंदिर के भग्नावशेष आज भी विद्यमान हैं। चौलुक्या राजवंश के मुला राजा ने इस मंदिर का निर्माण ई. स. 943 में शुरू करवाया था और ई. स. 1140 में जयसिम्हा सिद्दराजा के कार्यकाल में यह निर्माण पूरा हुआ था। पहले अलाउद्दीन खिलजी और बाद में अहमद शाह प्रथम ने ई. स. 1410-44 के बीच इस मंदिर को तुड़वा दिया। यही नहीं, मंदिर के कुछ हिस्से को तोड़ कर यहाँ जामा मस्जिद भी बनवा दी गई। मंदिर से जुड़े कई अवशेष आज भी यहाँ मौजूद मस्ज़िद में दिखायी देते हैं।

अहमदाबाद स्थित जामा मस्ज़िद का निर्माण ई. स. 1424 में अहमद शाह ने करवाया था। इस मस्ज़िद को लेकर भी बड़ा विवाद है। यह मस्ज़िद जिस स्थान पर बनायी गई है, वहाँ पहले हिंदू देवी भद्रकाली का मंदिर था। विभिन्न काल में अहमदाबाद का पुराना नाम भद्रा, कर्णावती, राजनगर और असावल रहा है। बाद में मुस्लिम शासकों के काल में यह नाम बदल कर अहमदाबाद कर दिया गया। इस शहर का नाम भद्रा यहाँ की देवी भद्रकाली के नाम पर ही रखा गया था। भद्रकाली का मंदिर का निर्माण यहाँ पर मालवा (राजस्थान) के राजपूत परमार राजाओं ने करवाया था, जिन्होंने 9वीं से 14वीं सदी तक यहाँ राज किया था।

भोजशाला मंदिर

भोपाल और उज्जैन भोज राजाओं की राजधानी थी। राजा भोज सरस्वती के उपासक थे। इसलिए उन्होंने धार में सरस्वती का एक भव्य मंदिर बनवाया था। इतिहासकार शिवकुमार गोयल के अनुसार ई. स. 1305 में इस भोजशाला मंदिर को अलाउद्दीन खिलजी ने ध्वस्त कर दिया था। राजा भोज ने ई. स. 1034 में माँ सरस्वती की अनूठी मूर्ति का निर्माण करवा कर भोजशाला में प्रतिष्ठित किया था। तभी से वसंत पंचमी के दिन सरस्वती जन्मोत्सव मनाया जाता है, परंतु पिछले कुछ वर्षों से यहाँ विवाद इतना गहरा गया है कि पूजा तो दूर मंदिर को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। खिलजी द्वारा ध्वस्त कराई गई भोजशाला के एक भाग पर ई. स. 1401 में दिलावर खां ग़ोरी ने एक मस्ज़िद बनवाई थी। यह एक महाविद्यालय था, जो बाद में भोजशाला के नाम से विख्यात हुआ। ई. स. 1456 में महमूद खिलजी ने मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवाया। ई. स. 1514 में महमूद शाह खिलजी ने शेष भाग पर भी मस्ज़िद बनवा दी। भोजशाला को लेकर हिन्दू और मुस्लिम संगठनों के अपने-अपने दावे हैं। हिन्दू संगठन भोजशाला को राजा भोज कालीन इमारत बताते हुए इस पर हिन्दू समाज का अधिकार मानते हैं। हिन्दुओं का तर्क है कि राजवंश काल में यहाँ मुस्लिमों को कुछ समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। दूसरी तरफ मुस्लिम समाज का कहना है कि वे वर्षों से यहाँ नमाज पढ़ते आ रहे हैं, यह जामा मस्ज़िद है, जिसे भोजशाला-कमाल मौलाना मस्ज़िद कहते हैं। 18 फरवरी 2003 को भोजशाला परिसर में सांप्रदायिक तनाव के बाद हिंसा फैली। पूरे शहर में दंगा हुआ। राज्य में कांग्रेस और केंद्र में भाजपा सरकार थी। केंद्र सरकार ने तीन सांसदों की कमेटी बना कर जाँच करवाई, परंतु मामला आज भी सुलझ नहीं पाया है।

You may have missed