पेरीस ने बदली दी पेरीन की दिशा और कूद पड़ीं स्वतंत्रता आंदोलन में

अहमदाबाद, 12 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। हिन्दुस्तानी भाषा के प्रचार-प्रसार में अग्रणी संस्था ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की स्थापना 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़े की घोषणा के साथ ही कर दी थी। हिन्दुस्तानी (सरल हिन्दी) के साथ-साथ गांधीजी के उसूलों के प्रचार-प्रसार में भी इस संस्था ने अनेक कार्य किए। यह एक ऐसी संस्था थी, जो वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक बनी। इस संस्था को डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसी बड़ी-बड़ी हस्तियों के अलावा गुजरात की पारसी बेटी पेरीन बेन कैप्टन का भी सहयोग मिला। पेरीन ने अपने सभी ऐशो-आराम माँ भारती की स्वतंत्रता के लिए प्रति समर्पित कर दिए। पेरीन को सभा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने अपना केन्द्र बंबई (अब मुंबई) को चुना और महात्मा गाँधी के भाषाई मिशन को सफल बनाने की कोशिश में जुट गईं, वहीं आचार्य काकासाहेब कालेलकर और श्री अमृतलाल नाणावटी ने अहमदाबाद, वर्धा और दिल्ली को केन्द्र बना कर अपना काम जारी रखा। गांधीजी की अनुयायी पेरीन बेन ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत वर्ष के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। हम पेरीन बेन कैप्टन के इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 131वीं जयंती है।

पेरीन का जन्म 12 अक्टूबर, 1888 को गुजरात में कच्छ जिले के मांडवी में हुआ था। पेरीन बेन सुप्रसिद्ध ब्रिटिश भारत के एक पारसी बुद्धिजीवी, शिक्षाशास्त्री, कपास के व्यापारी तथा आरम्भिक राजनैतिक एवं सामाजिक नेता दादाभाई नौरोजी की पौत्री थीं। दादाभाई नौरोजी को ‘भारत का वयोवृद्ध पुरुष’ (Grand Old Man of India) कहा जाता है। दादाभाई नौरोजी वह व्यक्ति थे. जिनसे प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने स्वराज्य के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। दादाभाई नौरोजी की पोती होने के कारण ही कहीं न कहीं पेरीन बेन के रक्त में ही स्वराज्य की भावना विद्यमान हो चुकी थी। हालाँकि वे भारत में शिक्षा प्राप्त करने के बाद आगे के अध्ययन के लिए पेरिस गईं।

इस पेरिस यात्रा ने पेरीन के जीवन की दिशा ही मोड़ दी। पेरिस में पढ़ाई के दौरान उनकी भेंट मदाम भीखाई जी कामा, लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों से हुई। जब पुर्तगाल के समंदर में विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) को ले जा रहे थे वह कूद कर भाग गए थे, दरअसल 1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा ने विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिया था, जिस पर सावरकर ने लन्दन टाइम्स में एक लेख लिखा था और जब वह 13 मई 1910 को पैरिस से लन्दन पहुँचने तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया परन्तु 8 जुलाई 1910 को एस.एस. मोरिया नामक जहाज से जब उन्हें भारत ले जाया जा रहा था, तब वह सीवर होल के रास्ते भाग निकले। ब्रिटिश सरकार उन्हें पकड़ने के लिए व्याकुल हो उठी और उनकी खोज़ में लग गई। वीर सवारकर को बचाने का प्रयास कर रहे क्रांतिकारियों में पेरिस में रह रही पेरीन बेन भी इस कार्य में शामिल हो गईं और यहाँ से शुरू हुई उनकी स्वतंत्रता संग्राम की यात्रा।

1911 में पेरीन बेन भारत आईं और उन्हें यहाँ अंग्रेज़ों के हाथों भेदभाव का बड़ा अपमानजनक अनुभव हुआ। 1919 में पेरीन बेन की महात्मा गांधी से भेंट हुईं और वे गांधी जी की अनुयायी हो गईं। पेरीन बेन ने ‘विदेशी छोड़ो स्वदेशी अपनाओ’ के गांधीजी के अभियान का अनुसरण करते हुए खादी के वस्त्र पहनना शुरू कर दिया। पेरीन बेन खादी के प्रचार और हरिजन उद्धार के कार्यों में जुट गईं। स्वदेशी का प्रचार, मद्य निषेध और महिलाओं को संगठित करना पेरीन बेन के प्रिय विषय बन गए थे। 1921 में उन्होंने गांधीवादी आदर्शों पर आधारित औरतों के अभियान, राष्ट्रीय स्त्री सभा के गठन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1925 में पेरीन ने धुनजीशा एस. कैप्टेन से विवाह किया, जो एक वकील थे। विवाह के बाद भी वे राजनितिक गतिविधियों में सक्रिय रहीं। 1930 में वे बॉम्बे (अब मुंबई) प्रांतीय कांग्रेस कमिटी की अध्यक्ष पद के लिए चुनी जाने वाली पहली महिला बनीं। उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा शुरू किये गये जन असहयोग आंदोलन में भाग लिया और जिसके चलते उन्हें 1930 में गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया था। 1932 में जेल से मुक्त होने के बाद पेरीन बेन ने ‘गांधी सेवा सेना’ के सचिव के रूप में काम किया और 1935 में स्थापित ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के काम में भी जुड़ गईं। मुंबई प्रदेश कांग्रेस की संघर्ष समिति की वे प्रथम महिला अध्यक्ष थीं। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में राष्ट्रपति ने पेरीन बेन को पद्मश्री से सम्मानित भी किया था।

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