निर्धनता में जले सफलता के दीप : देखिए इन युवाओं को, जो ‘अग्निपथ’ पार कर बने IAS अधिकारी

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 2 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। मीठे फल भी उन्हीं पेड़ों पर लगते हैं, जो आँधी, तुफान, बारिश और कड़ी धूम में भी झुक कर खड़े होते हैं, आकाश की और देखते हुए और तन के खड़े पेड़, तो हल्की से वायु के झोके से भी टूट जाते हैं। मनुष्य भी कुछ इसी प्रवृत्ति का प्राणी है, जिसने जीवन के विषम परिस्थितियों को हँसकर झेल लिया सफलता उसी के पैरों में आ गिरती है, अन्यथा परिस्थिति अस्वीकार करने और उससे घबरा कर हौसला त्याग देने वाले लोग अक्सर टूट जाया करते हैं। आज हम इस लेख में आपको कुछ ऐसे ही लोगों से परिचित कराने जा रहे हैं, जिन्होंने विषम परिस्थिति को कभी अपने मार्ग की बाधा नहीं बनने दी।

प्रदीप सिंह

संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) UPSC परीक्षा में 93 रैंक लाने वाले बिहार के प्रदीप सिंह का कहना है कि जब उनका परिणाम आया तो वह रात भर सोए ही नहीं, उन्हें लगा कि सब सपना है और यदि वो सोए तो उनका सपना टूट न जाए। 22 वर्षीय प्रदीप सिंह ने अपने प्रथम प्रयास में ही सफलता प्रप्त कर ली। प्रदीप के पिता मनोज सिंह मध्य प्रदेश में एक पेट्रोल पंप पर काम करते हैं। पिता 1992 में नौकरी की तलाश में मध्य प्रदेश आए और यहाँ के एक पेट्रोल पंप पर नौकरी करने लगे। प्रदीप की पढ़ाई इंदौर में हुई, परंतु गाँव से उनका जुड़ाव सदैव बना रहा। प्रदीप के भाई संदीप एक प्राइवेट जॉब करते हैं। प्रदीप ने 10वीं और 12वीं की परीक्षा CBSE बोर्ड से 81 प्रतिशत नंबरों के साथ पास की। उन्होंने सिविल परीक्षा की तैयारी के लिए बीकॉम ऑनर्स के साथ अंडरग्रैड प्रोग्राम जॉइन किया, इसके बाद एक वर्ष तैयारी की और अपने प्रथम प्रयास में ही परीक्षा पास कर ली।

तपस्या परिहार

मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर की रहने वाली तपस्या परिहार 2018 में यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में 28वाँ रैंक प्राप्त किया था। तपस्या ने 8वीं से 12वीं तक की पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय से की है। तपस्या के पिता विश्वास परिहार पेशे से किसान हैं और उनका माँ ज्योति परिहार गाँव की सरपंच हैं। तपस्या ने दिल्ली से UPSC का कोचिंग की थी।

अनु कुमारी

सोनीपत के विकास नगर की अनु कुमारी यूपीएससी 2017 की सेकेंड टॉपर हैं। अनु ने 12वीं तक की पढ़ाई सोनीपत के स्कूल से की, फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दू कॉलेज की फिजिक्स ऑनर्स से पढ़ाई की। अनु ने आईएमटी नागपुर से एमबीए भी किया है।अनु ने आईएएस बनकर देश की सेवा का सपना बचपन से ही देखा था, परंतु इस सपने के पूरा होने से पहले उसकी शादी हो गई और एक बच्चा भी। इसके बावजूद अनु ने हिम्मत नहीं हारी और परिवार के सहयोग से अपने सपने को पूरा करने की ओर कदम बढ़ाया। अनु पिछले 9 वर्षों से गुड़गांव में एक प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनी में नौकरी कर रही थी, परंतु एग्जाम की तैयारी के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। साथ ही अपने ढाई वर्ष के बेटे को माँ को सौंपा और स्वयं मौसी के घर रहकर पढ़ाई करनी शुरू की। लगभग डेढ़ वर्ष कर यूपीएससी की तैयारी की और यूपीएससी का प्री एग्जाम दिया, परंतु विफल रही थीं, फिर पूरी तैयारी के साथ पुनः परीक्षा दी इस बार वह सफल रहीं।

शिवागुरू प्रभाकरन

तमिलनाडु के तंजावुर जिले के रहने वाले एम शिवागुरू प्रभाकरन ने घर की जिम्मेदारियों के चलते 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। शिवागुरू के घर की आर्थिक स्थिती तो बदतर थी ही, उनके पिता भी एक शराबी थे, जिसकी वजह से छोटी उम्र में ही घर की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। पढ़ाई छोड़ने के बाद प्रभाकरन ने 2 वर्ष तक आरा मशीन में लकड़ी काटने का काम किया। घर में किसी तरह की कमी ना रह जाए इसके लिए उन्होंने खेतों में मजदूरी भी की। इतना ही नहीं, उन्होंने न सिर्फ अपने भाई को पढ़ाया, अपितु बहन की भी शादी भी की। इतनी विषम परिस्थिति के बाद भी प्रभाकरन ने अपने सपने को मरने नहीं दिया। प्रभाकरन इंजीनियरिंग करना चाहते थे। प्रभाकरन दिन में पढ़ाई करते और रात में सेंट थॉमस रेलवे स्टेशन पर बिताया करते थे। दिन रात की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें आईआईटी में दाखिला मिल गया। आईआईटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रभाकरन ने एमटेक में एडमिशन लिया। यहां भी उन्होंने टॉप रैंक हासिल की। इसके बाद उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की। 2017 में एम शिवागुरू प्रभाकरन ने यूपीएससी की परीक्षा में 101वीं रैंक हासिल किए। प्रभाकरन ने ये स्थान 990 कैंडिडेट्स के बीच प्राप्त किया था। सिविल सर्विस की परीक्षा को पास करना प्रभाकरन के लिए किसी सपने से कम नहीं था। उन्होंने ये रैंक चौथी बार में प्राप्त किया। इससे पहले उन्हें तीन बार असफलता का मुँह देखना पड़ा था।

अभिषेक सुराना

अभिषेक सुराना ने यूपीएससी सिविल सर्विस परीक्षा में 10वीं रैंक प्राप्त की है। सुराना पहले भी यह परीक्षा पास कर चुके हैं, परंतु आईएएस बनने के लिए उन्होंने एक बार फिर परीक्षा दी और अपना सपना पूरा कर लिया। राजस्थान के भीलवाड़ा के रहने वाले सुराना ने आईआईटी से ग्रेजुएशन किया है। उसके बाद वो विदेश चले गए, हालाँकि विदेश में ज्यादा दिन नहीं रुक पाए, उन्होंने देश के लोगों के बारे में कुछ करने की सोची और भारत लौट आए। वे इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और उनकी सिंगापुर के एक बैंक में नौकरी लग गई थी। उसके बाद उन्होंने दो दोस्तों के साथ कंपनी खोलकर व्यापार भी किया और लंदन के एक बैंक में नौकरी भी की। उन्होंने यूपीएससी की तीन बार परीक्षा दी। दो बार तो वे असफल रहे, तीसरे प्रयास में 10वीं रैंक के साथ परीक्षा उत्तीर्ण की। इससे पहले 2016 में उन्होंने परीक्षा दी और उन्हें 250वीं रैंक मिली और वे आईपीएस बन गए और सरदार वल्लभ भाई पटेल नेशनल पुलिस अकादमी में ट्रेनिंग करने लगे। उन्होंने आईएफएस की परीक्षा भी दी, जिसमें उन्होंने दूसरी रैंक प्राप्त की, परंतु उन्होंने आईएएस बनने का निर्णय लिया और 2017 में एक बार फिर यूपीएससी की परीक्षा दी और 10वीं रैंक प्राप्त की।

हरि चंदना दसारी

आईएएस हरि चंदना दसारी सदैव महिलाओं को समाज में आगे आने और आत्म-निर्भर बनने के लिए उत्साहित रहती हैं। हैदराबाद में महिलाओं का एक पूरा तबका आईएएस हरि चंदना दसारी को मैडम के नाम से जानता है। चंदना 2018 में जीएचएमसी सेरीलिंगमपल्ली की जोनल कमिश्नर बनकर आईं थीं। 2010 बैच की आईएएस ऑफिसर हरि चंदना ने वर्ल्ड बैंक से की जॉब छोड़ कर सिविल सर्विस में आ गईं।

वरुण बरनवाल

भारतीय प्रशासनिक सेवा (Indian Administrative Service) IAS ऑफिसर वरुण बरनवाल, जो कभी साइकिल के पंक्चर की दुकान में काम करते थे, पैसों की कमी, बिना किसी सुविधा के यूपीएससी की पढ़ाई की और एक आईएएस बनकर दिखाया। वरुण महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर बोइसार के रहने वाले हैं, जिन्होंने 2013 में हुई यूपीएससी की परीक्षा में 32वाँ स्थान हासिल किया। वरुण की जिंदगी में उनकी माँ, दोस्त और रिश्तेदारों का अहम रोल रहा हैं। वरुण ने अपने संघर्ष भरे जीवन को बेहद ही गरीबी में बीताया है। पढ़ने का मन था, परंतु पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे। 10वीं की पढ़ाई करने के बाद मन बना लिया था अब साइकिल की दुकान पर काम ही करूँगा, क्योंकि आगे की पढ़ाई के लिए पैसे जुटा पाना मुश्किल था, परंतु उनका किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, उन्होंने 2006 में 10वीं की परीक्षा दी थी, परीक्षा का जब रिजल्ट आया तो उन्होंने स्कूल में टॉप किया था। घरवालों ने के सहयोग और माँ के कहने पर पढ़ाई जारी रखी। 11वीं-12वीं में पढ़ाई के दौरान वह 6 बजे उठकर स्कूल जाते थे, उसके बाद दोपहर 2 से रात 10 बजे तक ट्यूशन करते थे और फिर दुकान में हिसाब का काम करते थे। उसी दौनान वरुण को पिता बीमार पड़ गए, इनके उपचार के लिए पैसे की कमी होने लगी और उपचार न मिलने का कारण उनका निधन हो गया। एक बार उनके पिता का उपचार करने वाले डॉक्टर उनकी दुकान के बाहर से जा रहे थे, उन्होंने वरुण से सारी बात पूछी और पढ़ाई के लिए उसे 10 हजार रुपये दिए। उनकी स्थिति देखते हुए उनके टीचर ने उनकी 2 वर्षों की पूरी फीस दे दी। फिर उन्होंने इंजीनियिरिंग में दाखिला लिया, जिसकी फीस उनकी माँ ने जुटाई। जिसके बाद फीस मेरे दोस्तों ने दी। इसके बाद उन्होंने यूपीएस की परीक्षा दी और 32वाँ स्थान प्राप्त किया।

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