तो क्या अमेठी के लोगों ने ‘हार’ पर मुहर लगाई ?

मतदान का पिछले 15 वर्षों का रिकॉर्ड टूटा, किस पर फूटेगा गुस्सा ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अमेठी और कांग्रेस का संबंध ऐतिहासिक है और इसमें भी जब कांग्रेस के साथ गांधी परिवार की शक्ति लगी, तो अमेठी के लोगों ने कांग्रेस सहित पूरे गांधी परिवार को भरपूर प्रेम और स्नेह के साथ अपना बना लिया। यह इतिहास संजय गांधी से लेकर सोनिया गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी तक अमेठी के अपनत्व को दोहराता रहा है, परंतु आज हम बात बहुत पुराने इतिहास की नहीं करेंगे। हम बात करेंगे अमेठी के 2004 से 2019 तक के उस काल खंड की, जिसमें वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और भाजपा की फायर ब्रांड नेता स्मृति ईरानी का प्रवेश हुआ।

इतिहास से पहले वर्तमान की बात करें, तो लोकसभा चुनाव 2019 में पाँचवें चरण में अमेठी लोकसभा सीट के लिए सोमवार को मतदान सम्पन्न हो गया है। लोकसभा चुनाव 2014 की तरह लगातार दूसरी बार अमेठी में मुख्य मुकाबला राहुल गांधी और स्मृति ईरानी के बीच ही था। मतदाताओं ने अपने सांसद पर मुहर लगा दी है। चुनाव आयोग (EC) के अद्यतन आँकड़ों के अनुसार अमेठी में लगभग 53.48 प्रतिशत मतदान हुआ है। यह अंतिम आँकड़े नहीं है। इसका अर्थ यह है कि मतदान का अंतिम प्रतिशत 54-55 प्रतिशत तक भी जा सकता है। वास्तविक आँकड़ों के लिए कुछ दिन प्रतीक्षा करनी होगी, परंतु प्राथमिक आँकड़ों से स्पष्ट है कि अमेठी ने मतदान के मामले में पिछले 15 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यह रिकॉर्ड तोड़ मतदान अपने भीतर परिणाम छिपाए हुए है। हालाँकि रिकॉर्ड भले टूटा हो, परंतु मतदान का प्रतिशत 60 तक भी न पहुँच पाना अमेठी के आलस्य को फिर एक बार उजागर कर गया है।

मतदाताओं की उदासीनता का क्या है संकेत ?

अब तक उपलब्ध मतदान का आँकड़ा भले ही कुल मिला कर यह दर्शाता हो कि अमेठी के मतदाता निरंतर आलस्य दिखाते रहे हैं और इस बार भी मतदान को लेकर कोई बड़ी जागृति नहीं देखी गई। इतनी महत्वपूर्ण सीट पर केवल 53.48 प्रतिशत मतदान होने का अर्थ है कि एक तरफ संभवित प्रधानमंत्री पद के दावेदार और दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री जैसे दिग्गज उम्मीदवार होने के बावजूद अमेठी के लगभग 46 प्रतिशत मतदाता मतदान करने के लिए बाहर नहीं निकले। अमेठी में अपने पक्ष में मतदान करवाने के लिए कांग्रेस के पास जहाँ एक ओर राहुल गांधी की उम्मीदवारी सबसे बड़ा फैक्टर था, वहीं कांग्रेस में नई-नई राजनीतिक एंट्री करने वालीं प्रियंका गांधी वाड्रा भी राहुल की अनुपस्थिति में अमेठी की खाक़ छान रही थीं। दूसरी तरफ 2014 में राहुल को कड़ी टक्कर देने वालीं स्मृति ईरानी पाँच वर्षों से अमेठी में सक्रिय थीं और चुनाव प्रचार में उन्होंने पूरी ताक़त झोंक दी थी। इसके बावजूद मतदाता क्यों उदासीन रहे ? यदि अमेठी में विकास होने के कांग्रेस और राहुल के दावे में सच्चाई है, तो मतदाताओं को बढ़-चढ़ कर मतदान में भाग लेना था और यदि विकास नहीं होने के स्मृति के दावे में सच्चाई है, तो भी मतदान का प्रतिशत बढ़ना चाहिए था, परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

अमेठी ने ली ‘अंगड़ाई’, किसकी शामत आई ?

यह तो बात हुई 2019 के मतदान की, परंतु 2014 से तुलना की जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि आलसी अमेठी ने इस बार थोड़ी-सी अंगड़ाई अवश्य ली है, क्योंकि लोकसभा चुनाव 2014 में अमेठी में 52.40 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसका अर्थ यह है कि 2019 में अब तक के आँकड़ों के अनुसार मतदान में लगभग 1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इतना ही नहीं, अंतिम आँकड़ों में यदि मतदान का प्रतिशत 54-55 तक जाता है, तो स्पष्ट संदेश होगा कि अमेठी ने यदि अंगड़ाई ली है, तो अवश्य किसी न किसी की शामत आने वाली है, परंतु किसकी ? क्या मतदान में वृद्धि का यह अर्थ है कि अमेठी के मतदाताओं ने 2014 में भाजपा और स्मृति के पक्ष में जो ज़ोर लगाया था, उस ज़ोर में वृद्धि हुई है ? क्या अधिक मतदान का यह अर्थ है कि अमेठी के लोगों ने अनेक आरोपों के बावजूद गांधी परिवार के साथ रहते हुए राहुल के पक्ष में ही वोट डाला है ? दोनों संभावनाएँ हैं। उत्तर 23 मई को मिलेगा, परंतु उससे पहले हम आपको परिणाम के अत्यंत निकट ले जाने का अवश्य प्रयास करेंगे।

मतदान के प्रतिशत में ही छिपा है परिणाम !

अब आते हैं शीर्षक पर कि क्या अमेठी ने ‘हार’ पर मुहर लगाई है ? वैसे हार को इनवर्टेड कॉमा में लिखने का तात्पर्य यही है कि क्या अमेठी में ‘सत्ता’ विरोधी लहर थी ? यहाँ ‘सत्ता’ को इनवर्टेड कॉमा में लिखने का तात्पर्य है निवर्तमान सांसद राहुल गांधी से। अमेठी के राहुल गांधी के 2004 से और स्मृति ईरानी के 2014 से जुड़े इतिहास और मतदान के आँकड़ों से कुछ-कुछ अंदेशा यही निकलता है कि अमेठी के लोगों ने कदाचित राहुल की हार पर मुहर लगाई होगी। अब बताते हैं कैसे ? राहुल गांधी ने अमेठी से पहली बार 2004 में चुनाव लड़ा। 2004 में अमेठी के लोगों ने सिर्फ 44.50 प्रतिशत मतदान किया, जो 1999 के 57.50 प्रतिशत मतदान से लगभग 13 प्रतिशत कम मतदान था। 1999 में सोनिया गांधी कांग्रेस उम्मीदवार थीं और 3 लाख 12 हजार मतों से भाजपा से विजयी हुई थीं, परंतु 2004 में राहुल के उम्मीदवार बनने के बाद सिर्फ 44.50 प्रतिशत मतदान का अर्थ है 55 प्रतिशत से अधिक लोगों ने मतदान नहीं किया। इसके बावजूद राहुल गांधी 2 लाख 90 हजार 853 मतों के भारी अंतर से चुनाव जीते, परंतु आगे की कहानी राहुल के लिए ख़तरे की घंटी समान है। 2009 में राहुल दूसरी बार अमेठी से चुनाव मैदान में उतरे। इस बार यहाँ 2004 के मुकाबले 1 प्रतिशत मतदान बढ़ कर 45.20 प्रतिशत हुआ। यद्यपि राहुल की लीड बढ़ कर 3 लाख 70 हजार 198 हो गई। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि 2004 और 2009 में राहुल के विरुद्ध कोई दमदार प्रत्याशी मैदान में नहीं था, परंतु 2014 में बाज़ी काफी हद तक पलट गई, जब भाजपा ने स्मृति ईरानी को मैदान में उतार दिया। अभी भी हम आकलन मतदान प्रतिशत के आँकड़ों से ही करेंगे। 2014 में मोदी लहर में भी अमेठी ने राहुल का साथ दिया, परंतु मतदान प्रतिशत फिर एक बार बढ़ा। 2014 में अमेठी ने 52.40 प्रतिशत मतदान किया, जो 2009 के मुकाबले लगभग 7 प्रतिशत अधिक था। मतदान का प्रतिशत बढ़ने से कांग्रेस-राहुल की लीड में कमी भारी कमी आई और 2014 में राहुल की जीत का अंतर यहाँ 1 लाख 7 हजार 903 मतों तक सिमट गया। एक तरफ राहुल को मिले मतों में 2009 के मुकाबले 25 प्रतिशत की कमी आई, तो दूसरी तरफ भाजपा और स्मृति ईरानी को मिले मतों का प्रतिशत 25 प्रतिशत बढ़ गया। अब जबकि 2019 में 2014 के मुकाबले लगभग 1 से 2 प्रतिशत मतदान बढ़ा है, तो एक स्पष्ट आकलन यह लगाया जा सकता है कि भाजपा के देश में मोदी के प्रति लहर होने के दावों के बीच क्या अमेठी में सांसद विरोधी लहर थी ? अमेठी ने मतदान में पिछले 15 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ कर क्या राहुल की हार पर मुहर लगाई है ? उत्तर आप स्वयं इस विश्लेषण के आधार पर ढूँढ लीजिए।

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