दीदी के बाद अब दादा के चर्चे : बीसीसीआई का अध्यक्ष बनना सौरव की सफलता या अमित शाह का मास्टर स्ट्रोक ?

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 17 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय क्रिकेट टीम के आक्रामक और सफल कप्तानों में से एक और ‘दादा’ का टैग पाने वाले पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली दुनिया के सबसे रईस क्रिकेट बोर्ड यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के नये कप्तान बनने जा रहे हैं। वैसे तो बीसीसीआई के अध्यक्ष पद के चुनाव के लिये उनके सिवाय किसी और ने पर्चा नहीं भरा है, इसलिये उनका निर्विरोध निर्वाचित होना निश्चित ही है और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष राजीव शुक्ला ने सोमवार को मुंबई में इस बात की घोषणा भी कर दी है कि गांगुली बीसीसीआई के नये अध्यक्ष होंगे। इसके बावजूद औपचारिक घोषणा 23 अक्टूबर को की जाएगी। गांगुली 10 महीने के लिये बोर्ड के एक्टिव अध्यक्ष होंगे और इसके बाद उन्हें अनिवार्य रूप से 3 साल का ‘कूलिंग ऑफ’ पीरियड बिताना होगा, क्योंकि नियमानुसार क्रिकेट से जुड़े प्रशासनिक पदों पर लगातार 6 वर्ष तक ही रहा जा सकता है और गांगुली पिछले 5 वर्ष 2 महीने से पश्चिम बंगाल क्रिकेट संघ के अध्यक्ष भी हैं। इस प्रकार गांगुली के 6 वर्ष का कार्यकाल आगामी सितंबर 2020 में समाप्त हो जाएगा।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे रईस क्रिकेट बोर्ड है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वर्ष 2018-19 में इसकी नेटवर्थ लगभग 12 हजार करोड़ रुपये थी, जो वर्ष 2017-18 में 11,916.8 करोड़ रुपये थी। उससे पहले 2016-17 में 8,431.9 करोड़, 2015-16 में 7,847.1 करोड़ और 2014-15 में 5,438.7 करोड़ रुपये की कमाई की थी। बीसीसीआई ने 2008 से 2018 तक 10 वर्ष में लगभग 3,500 करोड़ रुपये बतौर टैक्स जमा कराये हैं, जो कि वार्षिक लगभग 350 करोड़ रुपये होता है।

गांगुली के पीछे अमित शाह को देखने की कोशिश !

गांगुली के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है और इसे गांगुली की सफलता कम बल्कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मास्टर स्ट्रोक के रूप में ज्यादा देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि बीसीसीआई के अध्यक्ष पद के लिये गांगुली के विरुद्ध कोई और पर्चा नहीं भरा गया, जिससे वे निर्विरोध निर्वाचित घोषित होने वाले हैं। कोई पर्चा क्यों नहीं भरा गया, इसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं और यहीं पर ऐसा माना जाता है कि अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में आगामी 2021 में आने वाले विधान सभा चुनावों में भाजपा के फायदे के लिये ‘दीदी बनाम दादा’ का मास्टर स्ट्रोक खेला। यह तो सभी जानते हैं कि और अमित शाह व गांगुली ने भी कहा है कि उनके बीच मुलाकात हुई, परंतु दोनों ही जाहिर तौर पर इस बात से इनकार करते हैं कि उनके बीच बीसीसीआई में किसी पद के लिये कोई डील हुई है या उनके बीच कोई राजनीतिक चर्चा हुई। राजनीति में सब जानते हैं कि इसमें खाने के दांत और तथा दिखाने के दांत और होते हैं। गांगुली को इस पद पर बैठाने के साथ ही अमित शाह ने एक बाजी तो जीत ली है और बीसीसीआई पर बीजेपी का प्रभुत्व हासिल कर लिया है।

बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर केन्द्र सरकार में वित्त राज्यमंत्री हैं। उनके बड़े भाई अरुण धूमल बीसीसीआई के कोषाध्यक्ष पद के उम्मीदवार हैं। गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रहे केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह बीसीसीआई के सचिव पद के उम्मीदवार हैं। इसके अलावा सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष निरंजन शाह के बेटे जयदेव शाह बीसीसीआई के संयुक्त सचिव के पद के उम्मीदवार हैं, यह सब भी आगामी 23 अक्टूबर को निर्विरोध निर्वाचित घोषित होने वाले हैं। विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो गांगुली को लेकर बीसीसीआई के सदस्य दो गुटों में बँट गये थे। इनमें एक गुट अनुराग ठाकुर और दूसरा एन. श्रीनिवासन का था। श्रीनिवासन गुट पूर्व क्रिकेटर बृजेश पटेल को अध्यक्ष बनाना चाहता था, परंतु केन्द्रीय मंत्री होने के चलते राजनीतिक प्रभाव रखने वाले अनुराग ठाकुर की चली और गांगुली अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। यह दर्शाता है कि भले ही खुले तौर पर इनकार किया जा रहा हो कि शाह और गांगुली की मुलाकात के दौरान कोई डील नहीं हुई और कोई राजनीतिक चर्चा भी नहीं हुई, परंतु बीसीसीआई पर बीजेपी और अमित शाह के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता।

क्या अमित शाह खेल रहे ‘दीदी बनाम दादा’ का दाँव ?

अब सवाल यह उठता है कि एक पूर्व क्रिकेटर गांगुली के माध्यम से अमित शाह पश्चिम बंगाल में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री चुनी गई तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बैनर्जी पर फतह कैसे हासिल कर सकते हैं ? पहले जब 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पश्चिम बंगाल में मात्र 3 सीटें प्राप्त हुई थी, तब 2019 के लोकसभा चुनावों में अमित शाह के उन दावों पर भरोसा करना मुश्किल होता था, जिसमें वे पश्चिम बंगाल में 23 सीटों पर जीत के दावे करते थे, परंतु दावे के आसपास यानी 18 सीटों पर जीत दर्ज करके अमित शाह ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया था कि वे चुनावी चाणक्य यूँ ही नहीं कहलाते हैं। कहा जाता है कि जब गांगुली ने बीसीसीआई के अध्यक्ष पद के लिये पर्चा भरा था, तब अमित शाह ने अपने ट्रबलशूटर यानी संकट मोचक असम के बड़े नेता हिंमत बिस्वा सरमा को बुला कर उन्हें मुंबई जाने के लिये कहा था। इसके बाद हिंमत बिस्वा सरमा ने रविवार देर रात तक फोन पर कई जगह बात की थी, जिसके परिणाम स्वरूप ही शेष सभी प्रत्याशी पीछे हट गये थे। इस प्रकार शाह ने गांगुली पर कोई अहसान न करते हुए भी अहसान कर दिया।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी को चाहिये दमदार चेहरा !

अब शाह का अगला टारगेट पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और ममता बैनर्जी को हराना है। इसके लिये बीजेपी को एक्स फैक्टर वाले चेहरे की जरूरत है। भाजपा के पश्चिम बंगाल के वर्तमान प्रमुख मुकुल रॉय वर्ष 2017 में ममता बैनर्जी की पार्टी से अलग होकर ही भाजपा में आये थे। उन्होंने कड़ी मेहनत से सूबे में बीजेपी का मजबूत ढाँचा तैयार किया है और टीएमसी के कई बड़े नेताओं को भी तोड़ कर बीजेपी में लाये हैं। इस प्रकार उन्होंने पश्चिम बंगाल में पासा तो पलटा है और ममता बैनर्जी को सोचने पर मजबूर भी किया है। टीएमसी को चुनावी नुकसान भी पहुँचाया है और भाजपा के लिये फायदा भी अर्जित किया है, परंतु पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी को सत्ता से दूर करने और बीजेपी को सत्ता पर काबिज करने के लिये मुकुल रॉय अकेले सक्षम नहीं हैं, जैसे केन्द्र में बीजेपी को स्थापित करने के लिये मोदी जैसे कद्दावर चेहरे को आगे लाया गया था, वैसा ही कुछ पश्चिम बंगाल में करने की बीजेपी को जरूरत महसूस हो रही है। 10 महीने के बाद गांगुली का 6 साल तक प्रशासनिक पद पर रहने का समय पूरा हो जाएगा। इसके बाद उन्हें कम से कम 3 साल तक कूलिंग ऑफ पीरियड में रहना पड़ेगा। इसी पीरियड का फायदा उठाकर बीजेपी दादा को दीदी के खिलाफ मुखर रूप से पेश करने की चुनावी रणनीति पर काम कर रही हो सकती है।   

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