11 मार्च, 2001 को ऐसा क्या हुआ, जिसने 6 साल की उस सिंधु को ‘सागर’ बना दिया ?

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 26 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। पुसरला वेंकट सिंधु यानी पी. वी. सिंधु को आज पूरा राष्ट्र गर्व और सम्मान के साथ प्रणाम और सलाम कर रहा है। सिंधु ने रविवार को एक ऐसा इतिहास रचा, जिसने उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, खेल मंत्री किरण रिजिजू सहित पूरे देश को नतमस्तक कर दिया।

सिंधु ने यह इतिहास भारत से 6,166 किलोमीटर स्विट्जरलैण्ड में आयोजित बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (BWF) वर्ल्ड चैम्पियनशिप 2019 जीत कर रचा। इतना ही नहीं, यह चैम्पियनशिप जीत कर सिंधु बीएफडब्ल्यू वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी भी बन गईं। सिंधु ने जापान की नोजुमी ओकुहारा को 21-7, 21-7 से हरा कर वर्ष 2017 का बदला भी ले लिया। दो साल हले वर्ल्ड चैम्पियनशिप के फाइनल में ओकुहारा ने सिंधु का सपना तोड़ा था, परंतु सिंधु ने रविवार को यह बीडब्ल्यूएफ बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीत कर न केवल ओकुहारा से दो साल पुराना बदला लिया, बल्कि 136 करोड़ भारतीयों का दिल जीत लिया।

आज हम आपको पी. वी. सिंधु की बैडमिंटन खेल क्षेत्र में हासिल उपलब्धियों के रिकॉर्ड्स के बारे में नहीं बताएँगे, अपितु हम आपको उस पी. वी. सिंधु के बारे में बताएँगे, जो कभी 6 साल की ‘नदी’ समान सिंधु थी और 11 मार्च, 2001 को एक ऐसी घटना घटी, जिसने नदी समान सिंधु को विराट सागर बनने की प्रेरणा दी। जी हाँ, यदि 11 मार्च, 2001 को वह घटना न घटी होती, तो कदाचित सिंधु आज उपलब्धियों के इस मुकाम तक न पहुँची होतीं।

गोपीचंद के एक इतिहास ने सँवारा सिंधु का वर्तमान

सिंधु के बारे में अपने यह तो सभी जगह पढ़ा होगा कि वह बचपन से ही बैडमिंटन में दिलचस्पी रखती थीं और मात्र 8 वर्ष की आयु से उन्होंने बैडमिंटन खेलना भी शुरू कर दिया था, परंतु हम आपको और 2 साल पीछे लिए चलेंगे। सिंधु का जन्म सम्पन्न परिवार में हुआ था। 5 जुलाई, 1995 को तत्कालीन अखंड आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में पूर्व वॉलीबॉल खिलाड़ी दम्पति पी. वी. रमण और पी. विजया के घर जन्मीं सिंधु को खेल तो विरासत में मिले थे, परंतु उन्होंने माता-पिता के खेल वॉलीबॉल को नहीं चुना। जब सिंधु के माता-पिता वॉलीबॉल खेल रहे थे, तब सिंधु ने बैडमिंटन खेलने का निर्णय किया और इस निर्णय के पीछे 11 मार्च, 2001 को घटी एक घटना सबसे बड़ी प्रेरणा बनी। वास्तव में हुआ यूँ कि जब सिंधु महज 6 वर्ष की थीं, तब बर्मिंघम में 7 से 11 मार्च, 2001 के दौरान ऑल इंग्लैण्ड ओपन बैडमिंटन चैम्पियनशिप्स का 91वाँ संस्करण 2001 योनेक्स ऑल इंग्लैण्ड ओपन टूर्नामेंट चल रहा था। इस टूर्नामेंट में 11 मार्च, 2001 को पुरुष एकल के फाइनल मुकाबले में भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी पुल्लेला गोपीचंद ने चीन की विख्यात खिलाड़ी चेन होंग को 15-12, 15-6 से ज़ोरदार शिकस्त देकर ख़िताबी जीत हासिल की थी। गोपीचंद की इस जीत से 6 सिंधु इतनी उत्साहित हुईं कि उन्होंने बैडमिंटन को ही अपना करियर बनाने का दृढ़ संकल्प कर लिया। 11 मार्च, 2001 को गोपीचंद की ऑल इंग्लैण्ड ओपन चैम्पियनशिप में हुई ख़िताबी जीत की इस घटना ने सिंधु को माता-पिता की वॉलीबॉल विरासत को अपनाने की बजाए बैडमिंटन खेल का चयन करने का निर्णय करने पर विवश कर दिया।

गोपीचंद को ही बना लिया गुरु

गोपीचंद की इस उपलब्धि से सिंधु इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने 8 वर्ष की आयु में ही बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया। पी. वी. सिंधु ने पहले महबूब अली के प्रशिक्षण में इस खेल की मूलभूत जानकारियाँ हासिल कीं और इसके बाद सिकंदराबाद स्थित भारतीय रेलवे के संस्थान में प्रशिक्षण लिया। इसके तुरंत बाद सिंधु ने पुल्लैला गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी जॉइन कर ली। यह अकादमी सिंधु के घर से 56 किलोमीटर दूर थी, परंतु सिंधु की अपार इच्छा शक्ति और कुछ कर गुज़रने की चाह ने उन्हें कठिन परिश्रम करने पर विवश कर दिया और आज सिंधु एक सफल बैडमिंटन खिलाड़ी बन चुकी हैं।

सिंधु के नाम उपलब्धियों का पहाड़

पुसरला वेंकटा सिंधु (पी सिंधु) का जन्म 5 जुलाई 1995 को हुआ। उनकी शिक्षा गुंटुर में हुई है। पी सिंधु हैदराबाद में गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी में ट्रेनिंग लेती हैं और उन्हें ‘ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट’ नाम की एक नॉन-प्रोफिट संस्था सपोर्ट करती हैं। 10 अगस्त 2013 को सिंधु ऐसी पहली भारतीय महिला बनीं, जिन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप्स में मेडल जीता। 2015 में सिंधु को भारत के चार उच्चतम नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 2012 में सिंधु ने बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की टॉप 20 रैंकिंग में जगह बनाई। सिंधु के पिता रमण स्वयं अर्जुन अवार्ड विजेता हैं। पुलेला गोपीचंद ने सिंधु की तारीफ करते हुए एक बार कहा था कि उनके खेल की खास बात उनका एटीट्यूड और कभी न खत्म होने वाला जज़्बा है। 2014 में सिंधु ने एफआईसीसीआई ब्रेकथ्रू स्पोर्ट्स पर्सन ऑफ द इयर 2014 और एनडीटीवी इंडियन ऑफ द इयर 2014 का अवार्ड जीता। वर्तमान में भी पुल्लैला गोपीचंद ही सिंधु के कोच हैं एवं वे ही भारतीय बैडमिंटन टीम के मुख्य कोच भी हैं। सिंधु एक बहुत ही कठिन परिश्रमी एथलीट हैं। वे कठोर प्रशिक्षण कार्यक्रम का पालन करती हैं। वह हर सुबह 4.15 बजे बैडमिंटन का अभ्यास शुरू कर देती हैं। वर्ष 2000 में उनके पिता रमण को राष्ट्रीय वॉलीबॉल के प्रति उनके योगदान के लिए अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सिंधु इससे पहले का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2012 ली निंग चीन मास्टर्स सुपर सीरीज प्रतियोगिता में आया, जब उन्होंने चीन के 2012 लंदन ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता ली Xuerui पराजित को किया।

30 मार्च, 2015 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने पी. वी. सिंधु को पद्म श्री से सम्मानित किया गया। सिंधु ने 2010 में ईरान फज्र इंटरनेशनल बैडमिंटन चैलेंज में महिला एकल में रजत जीता। 7 जुलाई, 2012 को उन्होंने एशिया यूथ अंडर -19 चैम्पियनशिप जीती। सिंधु ने 2016 में गुवाहाटी दक्षिण एशियाई खेलों (महिला टीम) में एक स्वर्ण पदक और इससे पहले 2013 और 2014 में लगातार विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक हासिल किया। सिंधु को पद्म श्री के अलावा 2015 में द यूथ हाईएस्ट सिविलियन अवार्ड ऑफ़ इंडिया, 2013 में अर्जुन अवॉर्ड, 2014 में FICCI ब्रेकथ्रू स्पोर्ट्स पर्सन ऑफ़ द ईयर, 2014 में NDTV इंडियन ऑफ़ द ईयर, वर्ष 2015 में मकाऊ ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतने के बाद बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की ओर से 10 लाख रूपये पुरस्कार राशि, ओलंपिक पार्टिसिपेंट के रूप में क्वॉलीफाई करने पर अभिनेता सल्मान खान की ओर से 1.01 लाख रूपये प्रदान किये गये। इस प्रकार सिंधु ने विभिन्न प्रतियोगिताएँ जीत कर स्वयं तो सफलता हासिल की ही हैं, साथ ही अपने देश भारत का नाम भी विश्व में रोशन किया है।

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