ये कैसा यमराज ? 49 लोगों को निगल गया और ‘डकार’ तक नहीं ली !?

अहमदाबाद, 5 जून, 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। क्या आपने किसी ऐसी बीमारी, ऐसी दुर्घटना, ऐसी महामारी या ऐसी किसी मशीन के बारे में सुना है, जो 49 लोगों को जीते-जी निगल जाए और डकार तक न ले ? आज हम आपको एक ऐसे ही यंत्र के बारे में बताने जा रहे हैं। यह यंत्र है भारतीय वायुसेना का ट्रांसपोर्ट विमान AN-32। सोमवार दोपहर को असम के जोरहाट से अरुणाचल प्रदेश के मेंचुका के लिये उड़ान भरने वाला वायुसेना का एएन-32 विमान चीन से सटी भारतीय सीमा पर अचानक लापता हो गया, जिसका तीन दिन से चल रही खोज के बावजूद अब तक मलबा भी नहीं मिला है। इस विमान में 13 लोग भी सवार थे, जिनका भी कोई पता नहीं चल पाया है।

लापता विमान का पता लगाने के लिये भारतीय वायुसेना ने अपने विमान और हेलीकॉप्टर बेड़े को काम पर लगाया है। वायुसेना के दो MI हेलीकॉप्टर तथा 130-J और सुखोई विमान इस लापता एएऩ-32 विमान की तीन दिन से लगातार खोजबीन कर रहे हैं।

इतना ही नहीं भारतीय नौसेना ने भी अपने एक नौसैनिक समुद्री जहाज को एएन-32 विमान की खोज में लगाया है। जबकि इसरो भी RISAT सैटेलाइट यानी राडार इमेजिंग सैटेलाइट से विमान की खोज में मदद कर रहा है।

उल्लेखनीय है कि Antonov An-32 यानी एएन-32 विमान के लापता होने का यह पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी भारतीय वायुसेना के दो एएन-32 विमान लापता हो चुके हैं। उनका भी मलबा तक नहीं मिला। पहली बार 25 मार्च 1986 को हिंद महासागर के ऊपर से एएन-32 विमान लापता हुआ था, जिसमें 3 क्रू मेंबर सहित कुल 7 लोग सवार थे। यह विमान सोवियत यूनियन से ओमान के रास्ते भारत आ रहा था। इसके बाद जुलाई-2016 में भी एक एएन-32 विमान बंगाल की खाड़ी से लापता हो गया, जिसमें 29 लोग सवार थे। इस विमान को खोजने के लिये लगभग एक महीने लंबा सर्च ऑपरेशन चलाया गया था, परंतु इसका भी मलबा तक नहीं मिला था। अब यह तीसरी ऐसी घटना हुई है, जिसके बारे में भी अब तक कुछ पता नहीं चल पाया है।

विदित हो कि एएन-32 विमान रशिया द्वारा निर्मित ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है जो कठिन परिस्थितियों में भी उड़ान भरने के लिये जाना जाता है। जाँच के दौरान यह बात सामने आई है कि एएन-32 में जो SOS सिग्नल यूनिट थी वह 14 वर्ष पुरानी उपयोग हो रही थी। सोमवार को लापता हुए विमान ने दोपहर 1 बजे उड़ान भरी थी, इसके 33 मिनट बाद ही वह लापता हो गया था। इस विमान में सिंगल इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर (ELT) था जिसे एसएआरबीई-8 कहते हैं। यह ब्रिटिश फर्म सिग्नेचर इंडस्ट्री द्वारा तैयार किया गया था। इसे एएन-32 के कार्गो कंपार्टमेंट में इंस्टॉल किया गया था, जिससे यह कठिन परिस्थितियों में भी सिग्नल भेज सकता था।

डिस्ट्रेस सिग्नल को एक सैटेलाइट से पकड़ा जाता था, जो कॉसपास सारसट (इंटरनेशनल सैटेलाइट एडेड सर्च एण्ड रेस्क्यू फैसिलिटी) से जुड़ा था। इसके अलावा डिस्ट्रेस सिग्नल को खोज पर गये विमान द्वारा भी सुना गया था, जो 243 एमएचजेड पर ट्यून किया गया था, जो कि इंटरनेशनल एयर डिस्ट्रेस फ्रिक्वेंसी है। ब्रिटिश सिग्नेचर कंपनी की एक विज्ञप्ति के अनुसार उसने एसओएस सिग्नल सिस्टम को 2009 तक पुराने हो जाने को लेकर आगाह किया था और उन्हें रिप्लेस करने के निर्देश दिये थे। इसके बावजूद भारतीय वायुसेना के इन विमानों में यह सिस्टम रिप्लेस नहीं की गई है। भारतीय वायुसेना जो एएन-32 की लॉन्च कस्टमर है, उसने 1986 में इसकी शुरुआत की थी। वर्तमान में भारतीय वायुसेना 105 विमानों को संचालित करती है जो ऊंचे इलाकों में भारतीय सैनिकों को सुविधाओं से लैस करने और उनके लिये स्टॉक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 2009 में भारत ने यूक्रेन के साथ 400 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रेक्ट किया था, जिसमें एएन-32 की ऑपरेशन लाइफ को अपग्रेड और एक्सटेंड करने की बात की गई थी। अपग्रेड किये गये एएन-32 आरई एयरक्राफ्ट 46 में 2 कॉन्टेम्पररी इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर्स शामिल किये गये हैं, परंतु एएन-32 को अभी तक अपग्रेड नहीं किया गया है।

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