तो यह निश्चित मानिए कि ‘दीदी’ का सिंहासन डोल रहा है ! VOTING PATTERN के आधार पर 23 मई से पहले जानिए परिणाम !

परिवर्तन का भूतकाल दे रहा है वर्तमान का संकेत

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 15 मई, 2019। लोकसभा चुनाव 2019 में इस बार सबसे चर्चित राज्य पश्चि बंगाल बन चुका है। सात में से छह चरणों के चुनावों में हुई हिंसा, चुनाव प्रचार में जगह-जगह राजनीतिक झड़पों, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और तीन ही वर्षों में मुख्य विपक्षी दल बन चुकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) के बीच काँटे की टक्कर, टीएमसी प्रमुख और पिछले 8 वर्षों से मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बीच जबर्दश्त ज़ुबानी जंग ने इस बार के चुनाव में पश्चिम बंगाल को सबसे हॉट स्टेट बना दिया है। कई राजनीतिक विश्लेषकों और भाजपा का दावा है कि पश्चिम बंगाल में इस बार भाजपा अपना ऐतिहासिक प्रदर्शन करने जा रही है और टीएमसी की राजनीतिक ज़मीन खिसक रही है।

प्रश्न यह उठता है कि क्या सचमुच पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 यानी 34 वर्षों के शासन को उखाड़ फेंकने वाली ममता बैनर्जी और टीएमसी की सत्ता के विरुद्ध कोई लहर चल रही है ? ममता ने कांग्रेस से अलग होकर 1998 में टीएमसी बनाई और 13 वर्षों तक वामपंथी शासन के विरुद्ध कड़ा संघर्ष करने के बाद विधानसभा चुनाव 2011 में बंगाल की गद्दी पाने में सफलता हासिल की। पश्चिम बंगाल सहित पूरे देश में दीदी के उपनाम से विख्यात ममता बैनर्जी का जादू विधानसभा चुनाव 2016 में भी बरकरार रहा और वे कांग्रेस और वामपंथियों को शिकस्त देकर दूसरी बार भी मुख्यमंत्री बनीं।

विधानसभा चुनाव 2016 तक पश्चिम बंगाल में टीएमसी और ममता को चुनौती देने वाले कांग्रेस और वामपंथी दल लगभग ढेर हो चुके थे। अब टीएमसी-ममता के समक्ष कोई चुनौती नहीं थी, परंतु अचानक भाजपा की धमाकेदार एंट्री हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मारक रणनीति के चलते बहुत तेजी से पश्चिम बंगाल में भाजपा का विस्तार हुआ और भाजपा टीएमसी के विरुद्ध बड़ी चुनौती बन गई। तीन वर्षों में ही भाजपा ने पश्चिम बंगाल में इतनी ताक़त झोंक दी कि आज टीएमसी और ममता बैनर्जी भाजपा की चुनौती से बौखला गई हैं। यही कारण है कि वामपंथियों के शासन को हटाने में ममता और टीएमसी को जिस तरह की चुनावी हिंसा का सामना करना पड़ा, ठीक वैसी ही चुनावी हिंसा इस बार लोकसभा चुनाव में देखने को मिल रही है। तो क्या इसका यह अर्थ निकाला जाए कि बंगाल में सत्तारूढ़ दल को जब हार की आशंका होती है, तब वह हिंसा पर उतारू हो जाता है, जैसा कि ममता ने सत्ता पाने से पहले 13 वर्षों के संघर्ष के दौरान वामपंथियों की हिंसा का सामना किया ? यदि इसका उत्तर हाँ है, तो क्या यह भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि ममता-टीएमसी भी हार की आशंका के चलते सत्ता बचाने के लिए वामपंथी स्टाइल में चुनावी हिंसा का सहारा ले रही हैं।

मतदान के आँकड़ों में छिपा है संकेत

पश्चिम बंगाल में सत्ता विरोधी लहर है या नहीं, इसका अनुमान वहाँ हुए अब तक के विधानसभा चुनावों में हुए मतदान के आँकड़ों से लगाया जा सकता है। पश्चिम बंगाल में 1946 से 2011 तक हुए विधानसभा चुनावों के मतदान के आँकड़े दर्शा देते हैं कि बंगाल की जनता जब-जब राजनीतिक अस्थिरता और चुनावी-राजनीतिक हिंसा से त्रस्त हुई, तब-तब उसने सत्तारूढ़ दल को उखाड़ फेंका। 65 वर्षों के विधानसभा चुनावी इतिहास में बंगाली मतदाताओं ने कुल चार बार सत्ता के विरुद्ध मतदान किया, जिसमें पहला सबसे बड़ा परिवर्तन 1977 में और दूसरा सबसे बड़ा परिवर्तन 2011 में हुआ, परंतु 2011 की सत्ता विरोधी लहर राज्य की अब तक की सबसे बड़ी सत्ता विरोधी लहर रही, जिसमें लोगों ने भारी मतदान किया और वामपंथियों की जगह टीएमसी-ममता बैनर्जी को सत्ता सौंपी। अब जबकि 2019 में भी चुनावी-राजनीतिक हिंसा के बीच भारी मतदान हो रहा है, तो कयास लगाया जा सकता है कि टीएमसी की कथित वामपंथी स्टाइल वाली चुनावी-राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध लोग भारी मतदान कर रहे हैं।

1967 में भारी मतदान से हुआ पहला सत्ता परिवर्तन

पश्चिम बंगाल में पहला विधानसभा चुनाव 1946 में हुआ और कांग्रेस सत्ता में आई। कांग्रेस का शासन 16 वर्षों तक रहा, परंतु पहली बार परिवर्तन की लहर चौथे विधानसभा 1967 में दिखाई दी। 1967 के चुनाव में मतदाताओं ने कांग्रेस शासन को उखाड़ फेंकने के लिए 66.10 प्रतिशत मतदान किया, जो 1962 के मुकाबले 55.55 प्रतिशत से लगभग 11 प्रतिशत अधिक था। 1967 में बांग्ला कांग्रेस सत्ता पर आई। बीच में ही सत्ता की लड़ाई के चलते प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चा (PDF) ने सत्ता संभाली। राजनीतिक अस्थिरता के बीच राष्ट्रपति शासन लागू हुआ और 1969 के विधानसभा चुनाव में फिर बांग्ला कांग्रेस ही सत्ता में लौटी। राजनीतिक अस्थिरता के चलते यह सरकार भी एक साल ही चल सकी और 1971 में फिर चुनाव हुए। मतदाता राजनीतिक अस्थिरता से परेशान थे और इसलिए उनमें मतदान के प्रति उदासीनता देखी गई। यही कारण है कि 1971 के चुनाव में 62.03 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 1969 में हुए 66.51 प्रतिशत मतदान से लगभग 4 प्रतिशत कम था। यद्यपि जिन लोगों ने मतदान किया, वे परम्परागत कांग्रेसी मतदाता थे और इसलिए लोगों ने राजनीतिक स्थिरता के लिए कांग्रेस पर मुहर लगा दी। निष्कर्ष यह निकलता है कि कम मतदान तभी होता है, जब लोग अन्य दलों से तंग आ जाते हैं और दोबारा कांग्रेस को ही मौका देते हैं। इस तरह कम मतदान करके भी लोगों ने सत्ता परिवर्तन कर दिया, परंतु कांग्रेस भी राजनीतिक स्थिरता न दे सकी और दो महीने में ही राष्ट्रपति शासन आ गया। विधानसभा चुनाव 1972 में फिर कांग्रेस ही जीती और इस बार पाँच वर्ष उसका शासन चला।

1977 में दूसरा सत्ता परिवर्तन

पश्चिम बंगाल में 1946 से लेकर 1977 तक कांग्रेस और बांग्ला कांग्रेस के बीच मुख्य लड़ाई थी, परंतु इन दोनों ही दलों की सिरफुटव्वल से जनता त्रस्त हो गई थी। इसीलिए 1977 के चुनाव में पश्चिम बंगाल ने पहली बार बड़ा उलटफेर करते हुए कांग्रेस-बांग्ला कांग्रेस दोनों को धूल चटा दी और वामपंथी दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा-CPM) को सत्ता सौंप दी। यद्यपि यह बड़ा सत्ता परिवर्तन भारी मतदान से नहीं हुआ, बल्कि कांग्रेस के परम्परागत मतदाताओं की निराशा के कारण हुआ। 1977 में सिर्फ 56.15 प्रतिशत मतदाताओं ने ही वोट डाला, जो 1971 के 62.03 प्रतिशत से लगभग 6 प्रतिशत कम था। निष्कर्ष यह निकलता है कि जिन लोगों ने वोट डाला, वे कांग्रेस-बांग्ला कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई से तंग आ गए थे और इसीलिए उन्होंने सीपीएम के पक्ष में मतदान किया

बसु ने बनाया रिकॉर्ड, 34 वर्ष रहा वामपंथियों का दबदबा

21 जून, 1971 को पहली बार सीपीएम नेता ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और उन्होंने 5 नवम्बर, 2000 को अपने निधन तक इस पद पर बने रह कर बंगाल में 23 वर्ष 127 दिन शासन करने का रिकॉर्ड बनाया, जो आज भी कायम है। बसु के निधन के बाद भी 11 वर्षों तक सीपीएम का दबदबा कायम रहा और बसु के बाद सीपीएम के बुद्धदेब भट्टाचार्यय 14 मई, 2001 से 13 मई, 2011 तक मुख्यमंत्री रहे।

2011 में भारी मतदान से हुआ सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन

बसु के निधन के साथ ही बंगाल में सीपीएम कमज़ोर पड़ती गई, तो दूसरी तरफ कांग्रेस से अलग होकर 1998 में ही टीएमसी का गठन करने वालीं ममता ने राजनीतिक शक्ति बढ़ाना शुरू किया। 13 वर्षों के कड़े संघर्ष के बाद 2011 में बंगाल में अब तक का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन करने में ममता को सफलता मिली। बंगाल के मतदाताओं ने विधानसभा चुनाव 2011 में भारी मतदान करके वामपंथियों को उखाड़ फेंका और टीएमसी-ममता को सत्ता सौंपी। यह बड़ा परिवर्तन भारी मतदान से संभव हुआ, क्योंकि 2011 में 84.33 प्रतिशत मतदान हुआ, जो पिछले चुनाव 2006 में हुए 81.92 प्रतिशत मतदान से लगभग 3 प्रतिशत अधिक था। निष्कर्ष यह निकलता है कि मतदाताओं ने परिवर्तन के लिए बड़ी संख्या में वोट किया। 2016 के चुनाव में भी मतदाताओं को कोई परिवर्तन नहीं करना था। इसलिए 2016 में 82.66 प्रतिशत भारी मतदान हुआ, परंतु 2011 के मुकाबले 84.33 प्रतिशत मतदान से लगभग 2 प्रतिशत कम था।

तो क्या बंगाल में फिर चल रही परिवर्तन की लहर ?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के मतदान के आँकड़ों की यदि लोकसभा चुनाव 2019 से तुलना की जाए, तो स्पष्ट लगता है कि बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी-ममता के विरुद्ध परिवर्तन की लहर चल रही है, क्योंकि बंगाल के लोगों को जब-जब हिंसा और त्रासदी का सामना करना पड़ा, उन्होंने नए विकल्प को मौका दिया। प्रारंभिक दौर में कांग्रेस और बांग्ला कांग्रेस की अस्थिरता से त्रस्त मतदाताओं ने वामपंथियों को शासन धुरा सौंपी। वामपंथियों ने भी कांग्रेस और बाद में टीएमसी के विरुद्ध उसी राजनीतिक हिंसा का सहारा लिया, तो 2011 में वामपंथियों के 34 वर्षों के शासन को उखाड़ फेंका। अब जबकि 2011 से टीएमसी-ममता के शासन काल में भी तीन साल पहले प्रमुख राजनीतिक विरोधी के रूप में भाजपा के प्रवेश के साथ ही चुनावी और राजनीतिक हिंसा शुरू हुई है, तब मतदाता भारी मतदान कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2019 के छह चरणों में पश्चिम बंगाल में 80 से 85 प्रतिशत तक अनुमानित मतदान हुआ है, जो न केवल लोकसभा चुनाव 2014 में हुए 82.20 प्रतिशत मतदान से, अपितु विधानसभा चुनाव 2016 में हुए 82.66 प्रतिशत से अधिक है। यदि यह विश्लेषण सटीक बैठता है, तो फिर टीएमसी और ममता के गढ़ पश्चिम बंगाल में भाजपा की ओर से सेंध लगाया जाना निश्चित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed