अयोध्या विवाद का ‘निर्विकल्प’ अंत या ‘रिव्यू-क्यूरेशन’ का चलेगा सिलसिला ?

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 9 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत के सबसे पुराने और संवेदनशील राम जन्म भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय ‘निर्विकल्प या अंतिम’ नहीं होगा, क्योंकि इस निर्णय के बाद भी असंतुष्ट पक्ष के पास दो विकल्प होंगे, परंतु प्रश्न यह उठता है कि देश की हर सरकार, देश का हर नागरिक देश के जिस सबसे बड़े न्यायालय के प्रत्येक निर्णय को सिर-माथे चढ़ाता है, आज भी वैसा ही होगा या फिर इस निर्णय से असंतुष्ट पक्ष शेष दो विकल्पों की ओर बढ़ेंगे ?

वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के किसी भी निर्णय को एक बार तो अंतिम ही माना जाता है। लंबी सुनवाई और गहन मंथन के बाद जब देश की सबसे बड़ी अदालत किसी मामले पर निर्णय देती है, तो उसमें मीन-मेख निकालने की गुंजाइश न के बराबर रह जाती है, परंतु हमारे संविधान की यही विशेषता है कि वह इस अंतिम और लगभग निर्विकल्प परिस्थिति में भी स्वयं के साथ अन्याय की अनुभूति करने वाले को न्याय प्राप्ति का एक या उससे अधिक अवसर देती है। यहाँ तक कि दुर्दांत लोगों को भी सुप्रीम कोर्ट से फाँसी की सजा मिलने के बाद राष्ट्रपति के समक्ष दया याचना करने का अधिकार दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद पर आज जो निर्णय आ रहा है, उससे सभी पक्षों का संतुष्ट होना कदाचित संभव नहीं भी होगा। ऐसी स्थिति में असंतुष्ट पक्ष के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के प्रति असंतोष व्यक्त करने के दो विकल्प होंगे। एक विकल्प रिव्यू पिटिशन का और दूसरा विकल्प क्यूरेशन पिटिशन का। रिव्यू पिटिशन अर्थात् असंतुष्ट पक्ष इस याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की याचना कर सकता है। क्यूरेशन पिटिशन अर्थात् सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सुनाने वाले जजों के साथ तीन और जज मिल कर असंतुष्ट पक्ष की बात सुन कर निर्णय पर पुनर्विचार कर सकते हैं।

रिव्यू पिटिशन और क्यूरेशन पिटिशन दोनों ही निर्णय के बाद 30 दिन के भीतर दाखिल की जा सकती हैं। यद्यपि इन पिटिशनों से असंतुष्ट पक्ष को केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय से संतुष्ट करने, उन्हें समझाने का ही प्रयास किया जाता है। रिव्यू पिटिशन के दौरान साधारण सुनवाई की तरह वक़ीलों के बीच जिरह नहीं होती, अपितु पूर्व में दिए गए निर्णय और सारे रिकॉर्ड्स पर ही विचार किया जाता है। यदि किसी पक्ष को रिव्यू पिटिशन पर दिए गए निर्णय पर भी आपत्ति हो, तो वह क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल कर सकता है, जिसकी सुनवाई में किसी तथ्य पर विचार नहीं होता, अपितु कानूनी-संवैधानिक पहलुओं पर ही विचार किया जाता है। विधि विशेषज्ञों के अनुसार क्यूरेटिव पिटिशन से तात्पर्य सुप्रीम कोर्ट के जजों की बड़ी पीठ के समक्ष सुनवाई है। क्यूरेटिव पिटिशन पर सुप्रीम कोर्ट के कुल 6 जज सुनवाई करते हैं, जिनमें तीन जज सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम् जज होते हैं, जबकि शेष तीन जज निर्णय सुनाने वाले जजों में से शामिल किए जाते हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि आज राम जन्म भूमि विवाद का निर्विकल्प अंत होगा या इस विवाद को रिव्यू-क्यूरेशन पिटिशनों की प्रक्रियाओं से भी गुज़रना पड़ेगा।

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