किस दीवार का जिक्र करके पीएम मोदी ने जोड़ने, जुड़ने और जुड़ कर जीने का दिया संदेश ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। अयोध्या के सदियों पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया, जिसमें उन्होंने आज ही के दिन बर्लिन की दीवार गिरने का जिक्र करते हुए एक जुट होकर नये राष्ट्र निर्माण के लिये आगे बढ़ने का संदेश दिया। पीएम मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले और बाद में भी संपूर्ण देश में शांति बरकरार रखने के लिये देशवासियों का अभिनंदन किया और कहा कि ये तो सारा विश्व जानता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, परंतु आज के दिन प्रत्येक नागरिक ने राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए जिस एकता, भाईचारे, सहिष्णुता और सौहार्द का दृष्टांत प्रस्तुत किया है, उसने दुनिया को यह भी दिखा दिया कि भारत का लोकतंत्र कितना मजबूत है। उन्होंने करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन का जिक्र करते हुए कहा कि आज भारत और पाकिस्तान ने मिल कर मानवता का संदेश दुनिया को देने वाले गुरु नानक देव के करतारपुर साहिब मंदिर के दर्शन के लिये कॉरिडोर का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि आज ही के दिन बर्लिन की दीवार गिरी थी, जिसने बर्लिन शहर को पूर्वी और पश्चिमी टुकड़ों में विभाजित करके रखा था। इसलिये हमें भी आपसी कटुता को तिलांजलि देकर जोड़ने, जुड़ने और जुड़ कर जीने की राह अपनानी चाहिये।

शनिवार सुबह 11.30 बजे सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद देर शाम 6 बजे पीएम मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। जब पूरा देश कान लगा कर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सुन रहा था, तब पीएम मोदी पंजाब में थे और पाकिस्तान में स्थित करतारपुर साहिब गुरुद्वारा जाने के लिये बनी कॉरिडोर का उद्घाटन कर रहे थे। पीएम मोदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद हर नागरिक की राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि हमें साथ चल कर ही मंजिलें मिलेंगी। नये भारत में भय, कटुता और नकारात्मकता के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये। उन्होंने देश के अत्यंत संवेदनशील विवाद का सर्वसम्मत निर्णय सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जजों को अभिनंदन देते हुए कहा कि देश के न्यायाधीश, न्यायालय और हमारी न्यायिक प्रणाली अभिनंदन के अधिकारी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस निर्णय से सिद्ध हुआ है कि कठिन से कठिन मसले को भी संविधान के दायरे में रह कर हल किया जा सकता है। हमें सबको साथ लेकर सबका विश्वास हासिल करके विकास करना है और नये राष्ट्र निर्माण के लिये आगे बढ़ना है।

क्या है बर्लिन की दीवार का इतिहास ?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब जर्मनी का विभाजन हुआ तो सैकड़ों कारीगर और व्यवसायी प्रति दिन पूर्वी बर्लिन को छोड़ कर पश्चिमी बर्लिन जाने लगे थे। बहुत से लोग राजनैतिक कारणों से भी पूर्वी जर्मनी को छोड़ कर पूँजीवादी पश्चिमी जर्मनी जाने लगे थे। इससे समाजवादी पूर्वी जर्मनी को आर्थिक और राजनैतिक नुकसान हो रहा था। इसलिये पलायन को रोकने के लिये 13 अगस्त 1961 को एक दीवार का निर्माण शुरू किया गया था। दीवार बनने से आवागमन कम हो गया था। 1949 से 1962 के बीच 25 लाख लोग आवागमन करते थे, जो 1962 से 1989 तक घट कर 5,000 रह गया था। आवागमन तो घटा, परंतु पश्चिमी बर्लिन के लोगों के लिये यह दीवार समाजवादी अत्याचार की प्रतीक बन गई थी। विशेष कर उन परिस्थितियों में जब काफी लोगों को सीमा पार करते समय गोली मार दी गई थी। इसके बाद लोगों ने सीमा पार करने के लिये नये-नये तरीके खोजे और गुब्बारों से, आकाशीय तारों से, तेज गाड़ियों से, सड़क अवरोधों को तोड़ते हुए और सुरंगें बना कर उस पार आना-जाना शुरू किया। 1980 के दशक में पूर्वी जर्मनी में समाजवादी सोवियत आधिपत्य का पतन हुआ और राजनैतिक उदारीकरण शुरू हुआ, जिसके बाद सीमाई नियमों को ढीला किया गया। इसके बाद 9 नवंबर-1989 को पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के लोगों ने इस दीवार को पार करके एक दूसरे से मिलना शुरू किया तो दोनों तरफ उल्लास का वातावरण निर्मित हुआ, जिसके बाद यह दीवार तोड़ दी गई थी।

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