सिर्फ 87 हजार किसानों का ‘नेता’ कैसे बन गया 27 करोड़ लोगों का ‘सरदार’ ?

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 12 जून, 2019। हर भूत भविष्य की नींव रखता है। कौन जानता था वर्ष 1927 में तत्कालीन बम्बई सरकार के अधीनस्थ सूरत जिले की बारडोली तहसील में अंग्रेजों की ओर से किसानों पर लगान में अचानक 30 प्रतिशत की वृद्धि करना अंग्रेजों को भविष्य में इतना भारी पड़ेगा। अंग्रेज ही क्या, पूरी दुनिया इस बात से अनजान थी कि बारडोली के 137 गाँवों के 87 हजार किसानों पर लगान के रूप में आरंभ किया गया अत्याचार माँ भारती की धरती में एक ऐसा बीज बोएगा, जो 27 करोड़ लोगों के सरदार के रूप में अंकुरित होगा और उसके बाद एक ऐसा वटवृक्ष बनेगा, स्वतंत्र भारत को खंड-खंड करने-रखने की अंग्रेजों की कूटनीति को ध्वस्त कर अखंड भारत का निर्मा कर लौह पुरुष कहलाएगा।

आज 12 जून है और पिछले 92 वर्षों से 12 जून का दिन बारडोली दिवस के रूप में मनाया जाता है। पहली बार बारडोली दिवस 12 जून, 1928 को मनाया गया था। वास्तव में वर्ष 1927 में जब अंग्रेजी हुकूमत ने बारडोली के 87 हजार किसानों पर लगान में 30 प्रतिशत वृद्धि कर दी, तो स्थानीय नेता मेड़ता बंधुओं कल्याणजी, कुँवरजी तथा दायलजी ने असहयोग आंदोलन के लिए जनमत जुटाना शुरू किया, परंतु ये किसान उच्च वर्ग (उजलीपराज) और निम्न, आदिवासी, अस्पृश्य और काले वर्ग (कालीपराज) में बँटे हुए थे। हालाँकि जैसे-जैसे लोग आंदोलन से जुड़ते गए, सारे धर्म-जाति के भेद मिटने लगे। यह लगान वृद्धि जून-1927 से लागू होनी थी, परंतु महात्मा गांधी ने 12 फरवरी, 1928 को बारडोली सत्याग्रह की घोषणा कर दी।

गांधीजी की अपील पर ‘खेडा सत्याग्रह’ पहुँचे वल्लभ

एक तरफ स्वाधीनता संग्राम चल रहा था। महात्मा गांधी पर पूरे देश का नेतृत्व करने का उत्तरदायित्व था। इसीलिए उन्होंने बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व उन्हीं वल्लभभाई पटेल को सौंपा, जिन्होंने 1918 में महात्मा गांधी के शुरू किए गए खेडा सत्याग्रह में भी भाग लिया था। खेडा सत्याग्रह से पहले तक वल्लभभाई पटेल निजी जीवन जी रहे थे और वक़ालत कर रहे थे, परंतु जब महात्मा गांधी ने खेडा सत्याग्रह के दौरान लोगों से स्वयंसेवक और कार्यकर्ता बन कर भाग लेने की अपील की, तो वल्लभभाई भी अहमदाबाद में चल रही वक़ालत छोड़ खेडा पहुँच गए।

‘बारडोली सत्याग्रह’ का सफल नेतृत्व कर ‘सरदार’ बने वल्लभ

खेडा सत्याग्रह की सफलता में वल्लभभाई पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका से परिचित महात्मा गांधी ने बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व वल्लभभाई पटेल को सौंपा और 4 फरवरी, 1928 को वल्लभभाई बारडोली पहुँचे। उन्होंने बारडोली सत्याग्रह को एक दमदार नेतृत्व दिया। इस सत्याग्रह में 87 हजार किसानों के साथ-साथ 137 गाँवों की महिलाओं ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। वल्लभभाई पटेल ने किसानों से बढ़ा हुआ कर नहीं भरने को कहा और अंततः अंग्रेज सरकार ने 11-12 अगस्त को लगान वृद्धि 30 प्रतिशत से घटा कर 6.03 प्रतिशत करने की घोषणा की। अंग्रेजी हुक़ूमत को झुका देने वाले वल्लभभाई पटेल से बारडोली की महिलाएँ अत्यंत प्रभावित हुईं और उन्होंने वल्लभभाई को सरदार की उपाधि दी, जिसके बाद 87 हजार किसानों के आंदोलन के सफल नेता वल्लभभाई तत्कालीन भारत के 27 करोड़ लोगों यानी पूरे देश के सरदार बन गए।

गांधी-नेहरू को मिला तीसरा दमदार साथी

बारडोली सत्याग्रह ने वल्लभभाई पटेल में पड़े सरदार यानी प्रबल नेतृत्व के गुणों के बीज को अंकुरित कर दिया। इसके बाद सरदार पटेल ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। बारडोली सत्याग्रह ने जहाँ देश को और स्वाधीनता संग्राम को एक नया सरदार यानी नेता दिया, वहीं आंदोलन का नेतृत्व कर रहे प्रमुख नेताओं महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू को तीसरा दमदार साथी दिया। इसके बाद सरदार पटेल लगातार स्वाधीनता आंदोलन में गांधी के मार्गदर्शन में सक्रिय रहे और तभी 9 अगस्त, 1942 का वह दिन आ गया, जब भारत में 200 वर्षों की अंग्रेजी दासता और हुक़ूमत की उल्टी गिनती शुरू हुई। महात्मा गांधी ने इस दिन ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ आंदोलन का प्रारंभ किया और अंततः 5 वर्ष और 6 दिनों तक चले संघर्ष के बाद भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया।

562 रजवाड़ों से बनाया ‘अखिल भारत’

ऐसा नहीं है कि अंग्रेजों ने भारत से अपना शासन समेट लिया और भारत का काम आसान हो गया। फूट डालो और राज करो की नीति अपनाने वालों ने जाते-जाते भारत में हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष का बीज बो दिया, जिसके फलस्वरूप भारत को विभाजन के दंश का मूल्य चुका कर स्वतंत्रता मिली। यहाँ तक भी ठीक था कि भारत ने मुस्लिमों के नाम पर देश मांग रहे मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान जैसा टुकड़ा सौंप कर भारत को बचा लिया, परंतु अंग्रेजों ने रजवाड़ों को भी स्वतंत्र रहने का अधिकार देकर देश के प्रथम गृह मंत्री बने सरदार वल्लभभाई पटेल के समक्ष बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। 1928 में मिली सरदार की उपाधि को उन्होंने 1947 में 562 रजवाड़ों का भारत में विलय करा कर अखंड-अखिल भारत का निर्माण कर सार्थक कर दिखाया। यद्यपि इस दौरान सरदार पटेल को जूनागढ और हैदराबाद के निज़ामों के बग़ावती तेवरों का सामना भी करना पड़ा, परंतु सरदार ने साम, दाम, दंड और भेद सहित सभी हथकंडों को देश हित में पूरा उपयोग किया और स्वयं को अखंड भारत का रचनाकार सिद्ध कर दिखाया।

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