BEFORE AND AFTER 2014 : कभी इस देश के हाथ आना ‘मौत से बदतर’ था, अब प्राण रक्षा से रिहाई तक ‘जान’ झोंकती है सरकार !

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 18 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। एक समय था जब भारतीय नागरिक हो या सैनिक, यदि वह पाकिस्तान के हाथ लगता था तो यह उसके लिये मौत से भी बदतर होता था। जबकि अब स्थिति में बदलाव देखने को मिल रहा है। भारत की वर्तमान सरकार न सिर्फ पाकिस्तान के साथ सख्ती से पेश आ रही है, बल्कि वह अपने नागरिकों और सैनिकों को पाकिस्तान की कैद से मुक्त कराने के लिये भी असरकारक सक्रियता दिखा रही है।

मोदी सरकार के आने के बाद

2014 में केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद दो भारतीय पाकिस्तान की कैद में आये। इनमें से एक भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव हैं तो दूसरे भारतीय सैनिक, विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान हैं। वर्तमान मोदी सरकार ने एक ओर कूटनीतिक दबाव बनाकर अभिनंदन वर्तमान को 55 घण्टे के भीतर पाकिस्तान की कैद से मुक्त करवा लिया, वहीं कुलभूषण जाधव की फाँसी की सजा रद्द करवाकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में कूटनीतिक जीत हासिल की है।

अभिनंदन वर्तमान

अभिनंदन वर्तमान को पाकिस्तान ने इसी साल 27 फरवरी को तब अपनी कैद में ले लिया था, जब पुलवामा आतंकी हमले के जवाब में भारतीय वायुसेना ने 26 फरवरी की देर रात पाकिस्तान के बालाकोट में घुसकर आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर एयर स्ट्राइक करके बम बरसाए थे। दूसरे दिन सुबह पाकिस्तानी एयरफोर्स ने भारत पर हवाई हमला करने का प्रयास किया तो भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान ने पाकिस्तानी एयरफोर्स के F-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया और अन्य विमानों को पाकिस्तान वापस लौटने के लिये मजबूर करके उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया। इसी दौरान अभिनंदन वर्तमान का विमान भी दुश्मन के हमले में क्रैश हो गया तो विंग कमांडर को पैराशूट के साथ विमान से नीचे छलांग लगानी पड़ी। हालांकि वह दुश्मन के इस हमले में जीवित तो बच गये, परंतु हवा के साथ उड़ते हुए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पहुंच गये थे, जहाँ पाकिस्तानी सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। हालाँकि विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की दिलेरी देखकर पूरे देश में उनकी बहादुरी चर्चा का केन्द्र बन गई और जब पता चला कि वह पाकिस्तान की कैद में हैं तो मोदी सरकार ने तत्काल प्रभाव से पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाना शुरू किया और उसे अभिनंदन वर्तमान को तुरंत रिहा करने अन्यथा इसके परिणाम भुगतने की ऐसी गर्भित चेतावनी दी कि पाकिस्तान को 1 मार्च को अभिनंदन वर्तमान को रिहा करने की घोषणा करनी पड़ी और 2 मार्च को अटारी बॉर्डर के रास्ते अभिनंदन वर्तमान की सकुशल स्वदेश वापसी हुई।

कुलभूषण जाधव

कुलभूषण जाधव मुंबई के निवासी और भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी हैं, जो बिज़नेस के सिलसिले में 2016 में ईरान गये थे, तब पाकिस्तानी एजेंसियों ने 3 मार्च-2016 को उनका अपहरण कर लिया था और उन्हें पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान से गिरफ्तार किये जाने का दावा किया था। पाकिस्तान ने कुलभूषण जादव पर पाकिस्तान में भारत के लिये जासूसी करने का आरोप लगाया, इतना ही नहीं, सिविल अदालत में मुकदमा चलाने के स्थान पर सैन्य अदालत में मुकदमा चलाकर फाँसी की सजा सुनाई। मोदी सरकार ने पाकिस्तान के इस कदम का अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक न्यायालय (ICJ) में विरोध किया। मोदी सरकार के विदेश मंत्रालय की कोशिशों के परिणामस्वरूप बुधवार को अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने पाकिस्तान को झटका देते हुए भारत के पक्ष में फैसला सुनाया और कुलभूषण जाधव की फाँसी की सजा रद्द कर दी। इस प्रकार भारत की एक बार फिर पाकिस्तान पर कूटनीतिक जीत हुई। फिलहाल कुलभूषण की फाँसी तो रुक गई है, हालाँकि उनकी पाकिस्तान की कैद से रिहाई कब होगी और वह संभव होगी भी या नहीं, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है, परंतु मोदी सरकार कुलभूषण को पाकिस्तानी कैद से मुक्त कराने के प्रयासों में भी जुटी हुई है।

1971 के युद्ध से लेकर 2013 तक !

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की क़ैद में कोई भारतीय नागरिक या जवान नरेन्द्र मोदी सरकार के आने के बाद ही आया है। इससे पहले भी कई भारतीय नागरिक और सैनिक पाकिस्तान के चंगुल में फँस चुके हैं। इनमें से कुछ ऐसे भाग्यशाली रहे जिन्हें पाकिस्तानी कैद से मुक्ति तो मिली परंतु उनका पूरा जीवन वहाँ की जेलों में बीत गया। जबकि कुछ ऐसे भाग्यशाली नहीं रहे और वह स्वदेश वापसी का सपना संजोए ही दुनिया से रुखसत हो गये।

कारगिल युद्ध के ‘अभिनंदन वर्तमान’ थे यह सैनिक

के. नचिकेता

अभिनंदन वर्तमान की तरह ही भारतीय वायुसेना के एक और फाइटर पायलट के. नचिकेता 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान द्वारा कैद कर लिये गये थे। 20 साल पहले कारगिल युद्ध के दौरान 3 जून-1999 को भारतीय वायुसेना के फाइटर पायलट के. नचिकेता को ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के दौरान MIG-27 उड़ाने का काम सौंपा गया था। उन्होंने 17 हजार फीट की ऊँचाई से दुश्मनों पर रॉकेट दागे थे। इसी बीच उनके विमान के इंजन में तकनीकी खराबी आ गई और उनका विमान क्रैश हो गया। हालाँकि के. नचिकेता इस विमान से कूद पड़े थे, परंतु पाकिस्तान आर्मी ने उन्हें बंदी बना लिया था। उस समय केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। वाजपेयी सरकार ने भी पाकिस्तान पर नचिकेता को छोड़ने का दबाव बनाया था, जिसके परिणाम स्वरूप 8 दिन के भीतर ही नचिकेता भी पाकिस्तानी कैद से मुक्त होकर स्वदेश लौट आए थे।

अजय आहूजा

हालाँकि दूसरे फाइटर पायलट अजय आहूजा अभिनंदन वर्तमान और के. नचिकेता जैसे भाग्यशाली नहीं रहे। 27 मई-1999 को कारगिल युद्ध के दौरान ही बटालिक क्षेत्र में दुश्मन के ठिकानों की टोह लेने के लिये 2 एयरक्राफ्ट उड़ाने की योजना बनाई गई थी। इस मिशन का नेतृत्व किया अजय आहूजा ने। जब उड़ान भरी गई तो अजय आहूजा को सूचना मिली कि मुंथो ढालो के पास फ्लाइट लेफ्टिनंट नचिकेता का विमान MIG-27 लापता हो गया है। यह सूचना मिलने के बाद उन्होंने नचिकेता और उनके विमान की तलाश शुरू की, वह जहाँ पर विमान की तलाश कर रहे थे वह सीमाई इलाका था और अजय आहूजा दुश्मन की रडार में आ गये। 28 मई-1999 को स्क्वाड्रन लीडर आहूजा का शव भारतीय अधिकारियों को सौंपा गया, उनके शरीर में दो गोलियाँ लगी थी। बताया गया था कि उनके घुटने का फ्रैक्चर तब हुआ था जब वह पैराशूट से नीचे कूदे थे।

सरबजीत सिंह

सरबजीत सिंह 30 अगस्त 1990 को अनजाने में ही पाकिस्तान की सीमा में पहुँच गये थे और पाकिस्तानी आर्मी ने उन्हें गिरफ्तार करके उन पर पाकिस्तान में हुए बम धमाकों के साजिशकर्ता के आरोप लगाकर जेल में डाल दिया था। वह 23 साल तक पाकिस्तानी कैद में रहे और 2 मई-2013 को उनकी मृत्यु हो गई। भारत की तरफ से कहा गया कि सरबजीत सिंह एक सामान्य किसान था, जो खेत में हल चलाता था, वह गलती से सीमा पार कर गया था। परंतु पाकिस्तान ने भारत की बात नहीं मानी और उस पर फैसलाबाद, मुल्तान तथा लाहौर सहित कई बम धमाकों के आरोप में मुकदमा दर्ज करके मौत की सजा सुना दी। सरबजीत की बहन दलबीर कौर ने भाई की रिहाई के लिये कुछ NGO के साथ मिलकर मुहिम चलाई, परंतु वह सफल नहीं हो सकी।

गुरुबख़्श राम

गुरुबख्श राम को भी पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सियों ने 1990 में अपने कब्जे में ले लिया था। वह 18 साल पाकिस्तान में रहे थे और वहाँ शौकत अली के नाम से जाने जाते थे। जब वह पाकिस्तान से भारत लौट रहे थे, तब खुफिया एजेंसियों के हाथ लग गये थे। वह 18 साल तक पाकिस्तान की जेल में बंद रहे। 2006 में अन्य 19 भारतीय कैदियों के साथ उन्हें भी रिहा किया गया और वह स्वदेश लौट आए।

सुरजीत सिंह

सुरजीत सिंह को भी पाकिस्तान ने जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया था और पहले उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई, जिसे बाद में आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया था। वह 30 साल तक पाकिस्तान की कैद में रहे और वर्ष 2012 में 69 साल की उम्र में जेल से रिहा होकर भारत लौटने में सफल हुए।

रवीन्द्र कौशिक

रवीन्द्र कौशिक वह भारतीय नागरिक थे, जिनके जीवन पर बॉलीवुड के अभिनेता सलमान खान की सुपर हिट फिल्म ‘एक था टाइगर’ बनी थी। उन पर भी पाकिस्तान ने जासूसी का आरोप लगाया था। वह 25 साल तक पाकिस्तान में रहे और इनमें से 16 साल पाकिस्तान की कई जेलों में बिताए। वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया। स्वदेश में उनके परिवारजन उनका इंतजार ही करते रह गए।

कश्मीर सिंह

कश्मीर सिंह को 1971 के युद्ध के दौरान जासूसी के आरोप में पाकिस्तान ने गिरफ्तार किया था। वह भी कई सालों तक वहाँ की जेल में रहे। उन्हें भी फाँसी की सजा सुना दी गई थी। 28 मार्च-1978 को फाँसी दिये जाने के दो दिन पहले ही उनकी सजा पर रोक लगा दी गई। उन्हें पाकिस्तान की कैद से रिहा होने में 35 साल लगे। पाकिस्तान के एक पूर्व मंत्री और कार्यकर्ता अंसार बर्नी की कोशिशों से वर्ष 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने उनकी सजा माफ की, जिसके बाद 4 मार्च 2008 को अटारी बॉर्डर के रास्ते वह भी स्वदेश लौटने में सफल हुए।

रामराज

रामराज को भी पाकिस्तान ने जासूसी के आरोप में ही गिरफ्तार किया था। वह 6 साल पाकिस्तान की कैद में रहे। 6 साल की उनकी सजा पूरी होने के बाद उन्हें रिहा किया गया और वह भी 6 साल बाद स्वदेश लौटने में सफल हुए।

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