मीरा’ की महिमा : जिसने भी सार्थक किया यह नाम, उसने पा लिया श्याम….

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 22 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। मीरा अर्थात् भक्ति का दूसरा नाम। मीरा नाम लेते ही भगवान श्री कृष्ण प्रेम दीवानी मीराबाई का ही स्मरण हो आता है, परंतु उनके बाद भी भारत में कई मीराएँ हुईं, जिनके नाम और गुण दोनों मारीबाई के समानांतर ही थे। कहते हैं मीरा नाम में ही ऐसा चमत्कार है, जिसे रखने या लेने मात्र से भगवान श्री कृष्ण से लगाव होने लगता है या यूँ कहें कि मीरा नाम श्री कृष्ण भक्ति का मार्ग है। मीरा नाम का शाब्दिक अर्थ ही भगवान श्री कृष्ण है। महासागर, सीमा और कवयित्रि के भक्त भी मीरा के ही रूप हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जिसका भी नाम मीरा है, वे सभी कृष्ण भक्त हो जाते हैं, अपितु जो व्यक्ति विशेषकर नारी मीरा नाम के अर्थ को सार्थक करने का प्रयास करती है, उस मीरा का व्यक्ति का संबंध जीवन भर के लिए भगवान श्री कृष्ण से जुड़ जाता है। महासागर के समान उसका हृदय विशाल हो जाता है। त्याग और समर्पण उसका स्वभाव बन जाता है। आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व (1498-1546) ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई…’ गाने वाली ऐतिहासिक मीराबाई को तो आप सभी भली-भाँति जानते हैं, परंतु आज हम आपको मिलवाते हैं स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की छाया बनी रहने वाली उस अंग्रेज़ी महिला से, जिन्हें गांधीजी ने भारतीय नाम मीरा दिया था। महात्मा गांधी के मार्ग पर चलने वाली इस मीरा ने ब्रिटिश मूल की होते हुए भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के सिद्धांतो से प्रभावित होकर खादी का प्रचार किया। आज मोहन की उसी मीरा की 127वीं जयंती है।

मीरा बेन का जन्म 22 नवंबर, 1892 को इंग्लैंड में हुआ था। मीरा बेन के पिता का नाम ‘ऐडमिरल सर ऐडमंड स्लेड’ (admiral, Sir Edmond Slade) था, जो मुम्बई में ‘ईस्ट इण्डिया स्क्वैड्रन’ में कार्यरत थे। मीरा बेन ने गाँधी जी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर भारत में विभिन्न स्थानों पर जाकर खादी का प्रचार किया। मीरा बेन ने मानव विकास, गांधी जी के सिद्धांतों की उन्नति और स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। मारी बेन का मूल नाम मैडलिन स्‍लेड (Madeleine Slade) था, परंतु उनके कार्यों और समर्पण को देख कर महात्मा गांधी ने मैडलिन का नाम बदल कर मीरा बेन रख दिया था। वे एक ब्रिटिश महिला थीं, परंतु भारत की स्वतंत्रता उनके लिए सर्वोपरी थी। मैडलिन स्लैड जब साबरमती आश्रम में बापू से मिलीं, तो उन्हें लगा कि जीवन की सार्थकता दूसरों के लिए जीने में ही है और वह गुजरात के साबरमती आश्रम में रहने लगीं।

महात्मा गांधी के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में किये सुधारात्मक और रचनात्मक कार्यों में मीरा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1936 में शेगाँव यानी सेवाग्राम में बापू कुटी का निर्माण भी मीरा बेन ने कराया था, जिसमें महात्मा गांधी का आसन, कार्यालय, भोजन कक्ष आदि सभी का ध्यान रखा गया था। आज भी लोग देश-विदेश से बापू के जीवन-दर्शन को समझने के लिए बापू की कुटी देखने आते हैं। 9 अगस्त, 1942 को जब मुंबई से गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा की, तब मीरा बेन इस आंदोलन में एक क्रांतिकारी की भाँति ही शामिल हुईं और गांधी जी के साथ मीरा बेन को भी बंदी बना लिया गया। मीरा बेन को मई-1944 तक पूना (वर्तमान पुणे) में आग़ा खाँ महल में बंदी बना कर रखा गया था।

महात्मा गांधी की छाया बनी रहीं मीरा

मीरा बेन आजीवन गांधी जी की छाया बनी रहीं। उन्होंने गांधी जी का साथ नहीं कभी नहीं छोड़ा। गांधी जी के निधन के बाद 18 जनवरी, 1959 को मीरा बेन भारत छोड़कर ऑस्ट्रिया के विएना (Vienna) चली गयीं, परंतु मीरा बेन ने गांधी जी के विचार और कार्यों का प्रसार जारी रखा, जिसके चलते 1982 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया। भारत के प्रति मीरा बेन का लगाव इतना अधिक हो गया था कि वह भारत को अपना देश और इंगलैंड को विदेश मानती थीं। मीरा बेन के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए ‘इंडियन कोस्ट गार्ड’ ने नए गश्ती पोत का नाम उनके नाम पर मीरा रखा है। 20 जुलाई, 1982 को मीरा बेन का विएना में निधन हो गया, परंतु मीरा बेन ने अपने कार्यों से गांधी द्वारा दिये गये अपने मीरा नाम को सार्थक कर दिखाया। मैडलिन से मीरा बनने के बाद मीराबेन का जीवन वास्तव में भक्तिमय बन गया, क्योंकि मीरा नाम की महिमा का कोई अंत नहीं है, जिसका उदाहरण आज भी देखने को मिलता है। जी हाँ, वर्तमान की एक ऐसी मीरा जिसने एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया जो न तो कभी जन्म लेता है और न ही मरता है। वर्तमान की इस मीरा को न तो पति से वियोग का कोई भय है और न ही विधवा होने का कोई भय। तात्पर्य ये है कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में रहने वाली यमुना नामक एक युवती ने भगवान श्री कृष्ण से विवाह रचा लिया है। यमुना एक प्राइवेट कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत थीं। बचपन से ही कृष्ण प्रेम दीवानी यमुना ने पूरे रीति और रिवाज़ के साथ कन्हैया की मूर्ति के साथ सात फेरे लिये। कान्हा से विवाह के पश्चात अब यह मीरा यानी यमुना कान्हा की नगरी वृंदावन जाकर अपना जीवन यापन करेंगी।

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