अमित शाह : भाजपा के ऐसे ‘चाणक्य’, जिन्होंने मोदी के लिए राजतिलक के द्वार खोले…

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 22 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय सनातन धर्म के महान ग्रंथ-महाकाव्य रामायण और उससे जुड़ी कथाएँ तो आप जानते ही होंगे, जिसमें जीवन जीने की कई सीखें छिपी हुई है। उन्हीं सीखों में एक महान सीख है भ्रातृप्रेम। रामायण में राम के प्रति तीनों भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के प्रेम के कई दृष्टांत देखने को मिलते हैं। जिस भरत को राजा बनाने के लिए माता कैकेयी ने राम को वनवास दिलवाया, वही भरत महलों में रह कर 14 वर्षों तक ज्येष्ठ बंधु राम की तरह जीवन जिए। यह भरत का भ्रातृप्रेम था। दूसरी तरफ लक्ष्मण की भ्रातृसेवा पूरे संसार में सबसे बड़ा दृष्टांत है, क्योंकि लक्ष्मण का एक ही उद्देश्य था बड़े भाई राम की सेवा। इस सेवा धर्म को निभाने के लिए लक्ष्मण ने राम को मिले वनवास को स्वयं भी धारण किया और 14 वर्षों तक उनकी परछाई बने रहे। कहते हैं कि लक्ष्मण की बंधुसेवा इतनी उत्कृष्ट थी कि वे इन 14 वर्षों में भाई राम और भाभी की सुरक्षा करते रहे और एक रात भी नहीं सोए। जब लंकापति रावण संकट बन कर आया, तो उस युद्ध में भी लक्ष्मण ने रावण के पुत्र इंद्रजीत का वध कर राम की विजय में महत्वपूर्ण योगदान किया।

आज हम आपको रामायण की कथा या रामकथा सुनाने नहीं जा रहे। हम आज भारतीय राजनीति के आधुनिक लक्ष्मण की कथा बताने जा रहे हैं। हम एक ऐसे लक्ष्मण की बात करने जा रहे हैं, जिसने अपने राम के लिए वनवास को भी सुख मान कर भोगा और उनका राजतिलक भी कराया। इस राम और लक्ष्मण के बीच रक्त संबंध नहीं है, परंतु 90 के दशक की भारतीय राजनीति में जिस तरह अटल-आडवाणी को राम-लक्ष्मण की जोड़ी कहा जाता था, उसी तरह वर्तमान भारतीय राजनीति में मोदी-शाह को राम-लक्ष्मण की जोड़ी के रूप में देखा जाता है। भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) के ‘राम’ अर्थात् प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में तो बहुत कुछ लिखा-सुना जाता है, परंतु ‘लक्ष्मण’ अर्थात् अमित शाह को केवल एक चुनावी चाणक्य की संज्ञा देकर ही उद्धृत किया जाता है, परंतु आज हम आपको ‘राम’ की नहीं, अपितु ‘लक्ष्मण’ की कथा बताएँगे, क्योंकि आज उनका 55वाँ जन्म दिवस है।

पीवीसी पाइप व्यापारी से पावरफुल पॉलिटिशियन

अमित शाह आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ पहली बार केन्द्र की सत्ता पर बैठाने में जितना योगदान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का है, उतना ही योगदान अमित शाह की रणनीति का है। 2014 में अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा को विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाने वाले अमित शाह आज केन्द्रीय गृह मंत्री बन चुके हैं और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने का पहाड़ जैसा विराट कार्य उन्होंने किया है। नरेन्द्र मोदी को लेकर तो कई भविष्यवाणियाँ मिलती हैं, परंतु 22 अक्टूबर, 1964 को अपने ननिहाल मुंबई में जन्मे अमित शाह के बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह बालक एक दिन इतने ऊँचे पद पर होगा। अमित शाह के पिता अनिलचंद्र शाह गुजरात में गांधीनगर जिले के माणसा (तब गाँव-अब शहर) के रहने वाले थे और पीवीसी पाइप के व्यापारी थे। अमित ने दसवीं तक की पढ़ाई माणसा में की। अमित जब 16 वर्ष के थे, तब उनका पूरा परिवार अहमदाबाद स्थानांतरित हो गया। अमित शाह ने अहमदाबाद में ज्योति हायर सेकेण्डरी स्कूल से उच्चतर शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद सी. यू. शाह कॉलेज से जैव-रसायन में बीएससी की डिग्री हासिल की। शिक्षा पूर्ण करने के बाद अमित शाह ने अपने पीवीसी पाइप व्यापारी पिता के कारोबार में हाथ बँटाना शुरू किया और फिर शेयर ब्रॉकर बनने से लेकर पावरफुल पॉलिटिशियन बनते हुए देश के गृह मंत्री जैसे उच्च पद पर पहुँच गए।

37 वर्ष पूर्व हुई वह भेंट बन गई ‘भेंट’

भारतीय राजनीति में वर्तमान समय में सबसे शक्तिशाली जोड़ी मानी जाने वाली मोदी-शाह की जोड़ी का इतिहास 37 वर्ष पुराना है। अमित शाह बचपन से ही महान राष्ट्रभक्तों की जीवनियों से प्रेरित थे और इसी कारण उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य मातृभूमि की सेवा को बनाया। इसके लिए उन्होंने माणसा में ही 14 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को जॉइन किया। अहमदाबाद आने के बाद वे संघ के एक सक्रिय सदस्य बन गए। अहमदाबाद में ही अमित शाह की आरएसएस कार्यालय में 1982 में तत्कालीन संघ स्वयंसेवक नरेन्द्र मोदी से पहली भेंट हुई। तब न मोदी ने और न ही शाह ने सोचा होगा कि वे 37 वर्षों के बाद देश की राजनीति के सबसे चमकते सितारे होंगे। यह भेंट शीघ्र ही मोदी-शाह की गहरी दोस्ती में बदल गई। अहमदाबाद में संघ में सक्रिय रूप से जुड़ने के एक साल बाद ही 1983 में अमित शाह ने संघ के नवगठित राजनीतिक स्वरूप भाजपा की छात्र शाखा अखिल बारतीय विद्यार्थी परिषद् (अभाविप-ABVP) जॉइन की। चार वर्षों तक एबीवीपी में काम करने के बाद अमित शाह ने 1987 में भाजपा में प्रवेश किया और इसके साथ ही उनका राजनीतिक जीवन आरंभ हुआ, जो आज बुलंदियों पर है।

अटल-आडवाणी युग में शाह का ‘संघर्ष’

अमित शाह जब नई-नई राजनीति कर रहे थे, तब भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कद्दावर नेताओं का बोलबाला था। अटल-आडवाणी की जोड़ी के जादू से भाजपा का जनाधार बढ़ रहा था, परंतु इसके पीछे अमित शाह की रणनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। अमित शाह को भाजपा में पहली बार सबसे बड़ा उत्तरदायित्व लोकसभा चुनाव 1991 में सौंपा गया। इस चुनाव में आडवाणी गांधीनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे। चूँकि आडवाणी राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्त थे, इसलिए गांधीनगर में चुनाव प्रचार का उत्तरदायित्व शाह को सौंपा गया और शाह ने इसे बख़ूबी निभा कर आडवाणी की जीत में महत्वपूर्ण योगदान किया। आडवाणी की राम रथयात्रा के बाद गुजरात में भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ रहा था। आडवाणी की राम रथयात्रा के सारथी जहाँ स्वयं मोदी थे, वहीं आडवाणी को पहली बार गांधीनगर से जिताने में शाह ने सफल भूमिका निभाई। इसके साथ ही गुजरात भाजपा में मोदी-शाह की जोड़ी ने ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का वर्चस्व समाप्त करने के लिए सघन प्रयास किए, जिसके चलते 1995 में पहली बार गुजरात में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। तत्कालीन गुजरात भाजपा महासचिव नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन केशूभाई पटेल सरकार से भारी घाटे में चल रहे गुजरात राज्य वित्त निगम (GSFC) की कमान शाह को सौंपने की सिफारिश की। शाह ने जीएसएफसी में ऐसी आर्थिक कार्यकुशलता दिखाई कि यह सरकारी उपक्रम घाटे से उबर गया। मोदी के मार्गदर्शन में शाह ने गुजरात के सहकारिता क्षेत्र में भी कांग्रेस के दबदबे को समाप्त किया। शाह अहमदाबाद जिला सहकारी (ADC) बैंक के सबसे युवा अध्यक्ष बने। घाटे में चल रहे एडीसी बैंक को शाह ने एक वर्ष में ही मुनाफे में ला खड़ा किया। फिर आई गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (GCA) की बारी, जिस पर वर्षों से कांग्रेस का कब्ज़ा था। शाह की सफल रणनीति के चलते मोदी 2014 में जीसीए के अध्यक्ष बने। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शाह ने जीसीए की कमान संभाल ली।

चुनावी अखाड़े में दिखाए दाव, पहुँचे मंत्री पद तक

शाह की शहंशाही तेजी से परवान चढ़ती जा रही थी, परंतु अब तक वे संगठन में कार्य कर रहे थे। इसी दौरान 1997 में सरखेज विधानसभा सीट के लिए उप चुनाव हुए। मोदी ने पार्टी को इस सीट से शाह को टिकट दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। संगठन के बाद पहली बार चुनावी अखाड़े में उतरे शाह ने भारी मतों से सरखेज उप चुनाव में जीत दर्ज की। इसके बाद शाह ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और विधानसभा चुनाव 1998, 2002, 2007 और 2012 बड़े अंतर से विधायक चुने जाते रहे। इधर संगठनात्मक कुशलता को देखते हुए भाजपा ने 1998 में शाह को प्रदेश सचिव और फिर प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया। 2001 में शाह को भाजपा में राष्ट्रीय सहकारिता प्रकोष्ठ का संयोजक बनाया गया। उनके कार्य को इतना सराहा गया कि कुछ लोगों ने शाह को सहकारिता आंदोलन का आधुनिक पितामाह तक कहना शुरू कर दिया। यद्यपि गुजरात में 1995 में पहली बार सत्ता में आई भाजपा की सरकार 7 महीनों में ही गिर गई, परंतु 1998 में दोबारा जनता ने केशूभाई पटेल के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया। अब तक शाह केवल संगठन के एक कार्यकर्ता और सरकार में एक विधायक के रूप में ही कार्य कर रहे थे, परंतु 7 अक्टूबर, 2001 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर संगठन से शासकीय-चुनावी राजनीति में कदम रखने वाले नरेन्द्र मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2002 के बाद नवगठित मंत्रिमंडल में पहली बार शाह को जगह दी। मोदी ने हमेशा शाह की रणनीतिक कुशलता पर भरपूर विश्वास रखा और जैसे ही उन्हें अवसर मिला, उन्होंने शाह को गृह राज्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठा दिया। इसके बाद शाह मोदी के प्रधानमंत्री बनने यानी 2014 तक गुजरात में गृह मंत्री के रूप में कार्यरत् रहे।

जब मोदी के ‘लक्ष्मण’ बन गए राम

भारतीय राजनीति और भाजपा में संगठन व शासकीय स्तर पर धारदार कार्यकुशलता से ऊँचाइयों के नए-नए शिखरों को छू रहे अमित शाह के जीवन में 2 वर्ष राजनीतिक और वैधानिक संकटों वाले भी आए। गुजरात में वर्ष 2002 में हुए गोधरा कांड व उसके आलोक में हुए साम्प्रदायिक दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जान का ख़तरा बढ़ गया था। उसी दौरान गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में काम कर रही गुजरात पुलिस ने कई एनकाउंटर्स किए, जिन्हें लेकर विवाद पैदा हुए। वर्ष 2010 में शुरू हुए राजनीतिक आरोपों के छींटे सीधे मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर उड़ाए जा रहे थे, तो वैधानिक रूप से गृह मंत्री के रूप में शाह पर सीधा कानूनी शिकंजा कसा गया। केन्द्र में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार थी और इसके चलते केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) शाह के ज़रिए मोदी के बढ़ते कद को घटाने में जुट गया। फर्जी एन्काउंटर्स को लेकर शाह को गिरफ़्तारी से लेकर जेल और गुजरात से तड़ीपार होने के दौरों से गुज़रना पड़ा। शाह ने संकट की उस घड़ी में मोदी के लिए ‘लक्ष्मण’ की भूमिका निभाई, तो मोदी ने भी ‘राम’ की तरह शाह का पूरा साथ दिया और अंतत: उच्चतम् न्यायालय (SC) ने प्रमाणों-साक्ष्यों के अभाव में शाह को निर्दोष घोषित कर दिया। इस कानूनी संकट ने मोदी-शाह की दोस्ती में एक और तथा महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया, जिसके चलते लोकसभा चुनाव 2014 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जहाँ एक ओर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, वहीं अमित शाह को उत्तर प्रदेश भाजपा प्रभारी बनाया। एक तरफ मोदी पूरे देश में छाए हुए थे, तो मोदी का राजतिलक कराने के मुख्य द्वार उत्तर प्रदेश में अमित शाह ने ऐसी शानदार रणनीति अपनाई कि सारे जातिगत समीकरण ढेर हो गए और भाजपा को 80 में 71 सीटें मिलीं, जिसके चलते मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने।

अध्यक्ष, गृह मंत्री और धारा 370 धराशायी

लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को सत्ता तक पहुँचाने और नरेन्द्र मोदी का राजतिलक करवाने के मार्ग यानी उत्तर प्रदेश पर विजय पताका फहराने वाले अमित शाह को मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया। शाह के नेतृत्व में भाजपा विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनी, तो दिल्ली की गद्दी के अलावा राज्यों में भी शाह की रणनीति ने मोदी लहर को ज़म कर हवा दी। शाह के नेतृत्व में भाजपा ने 20 से अधिक राज्यों में सत्ता हासिल की। अध्यक्ष के रूप में पाँच वर्षों के कार्यकाल में अनेक ऐसे राज्यों में भाजपा ने झंडे गाड़े, जहाँ कभी उसका कोई जनाधार नहीं था। मोदी-शाह का विजय रथ लगातार आगे बढ़ता रहा और फिर आए लोकसभा चुनाव 2019। तमाम विपक्षी दलों की तथाकथित एकजुटता, सामाजिक-जातिगत समीकरणों, साम्प्रदायिक मतभेदों के जंजालों को चीरते हुए शाह की रणनीति ने भाजपा को फिर एक बार 2014 से अधिक बहुमत के साथ बहुमत दिलाया और मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने। मोदी ने दूसरे कार्यकाल में शाह को गृह मंत्री बना कर सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी। शाह ने सबसे पहला काम जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को धराशायी करने का किया। मोदी के शक्तिशाली नेतृत्व में शाह ने 370 की ऐतिहासिक भूल को सुधार कर पूरे देश का दिल जीता। गृह मंत्री बनने के बाद एक व्यक्ति-एक पद की नीति पर चलने वाली भाजपा के समक्ष नए अध्यक्ष के चयन की चुनौती आई। मोदी ने इसमें भी बीच का रास्ता निकाला और शाह को अध्यक्ष बनाए रखते हुए जे. पी. नड्डा को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया।

You may have missed