‘विद्रोही वीरांगना’ : रानी चेन्नम्मा, जिनकी ललकार ने अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिए

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 23 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत की स्वतंत्रता आंदोलन की नींव 1857 के विद्रोह के साथ रखी गई थी, जब अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध भारतीय राजे-रजवाड़ों ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। 1857 का ज़िक्र होते ही सभी के मनोमस्तिष्क पर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का वीरांगना रूप उभर कर सामने आ जाता है, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध लोहा लिया था। आज भी जब हम ‘खूब लड़ी मरदानी, वो तो झाँसी वाली रानी थी’ कविता सुनत या गाते हैं, तो मन में एक क्रांतिकारी जोश की अनुभूति होने लगती है, परंतु क्या आप जानते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई ने नारी वीरता की इस परंपरा को किस वीरांगना की प्रेरणा से संभव कर दिखाया था ? वह वीरांगना थीं रानी चेन्नम्मा, जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई से भी पहले अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध लड़ा था और स्वतंत्रता संग्राम का एक नया अध्याय लिखा था। कर्नाटक के कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने 19वीं शताब्दी में ही अंग्रेजों को नाकों चने चबाने पर विवश कर दिया था। रानी चेन्नम्मा पहली महिला थीं, जिन्होंने अपने छोटे से राज्य कित्तूर की सीमा से 2 बार अंग्रेजों को खदेड़ दिया था। चेन्नम्मा ने ये अद्भुत कार्य अपने नगर के निवासियों को एकत्र कर उन्हें एक सैनिक की भाँति युद्ध के मैदान में उतार कर किया और वे सफल भी रहीं। उनकी प्रजा ने अपने प्राणों की आहूति देकर रानी का साथ निभाया। आज रानी चेन्नम्मा की 241वीं जयंती पर आइए जानते हैं उनकी वीरगाथा।

‘सुंदर कन्या’ कन्या से बनीं रानी

‘चेन्नम्मा’ का अर्थ होता है- ‘सुंदर कन्या’। चेन्नम्मा एक सुंदर नारी तो थीं ही, परंतु साथ ही वह एक वीगांगना भी सिद्ध हुईं। चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर, 1778 को ब्रिटिश भारत में कर्नाटक के वर्तमान बेलागवी जिले के एक छोटे से गाँव ककाती में हुआ था। ककाती काकतीय राजवंशों को राज्य था, जिनके रक्त में ही वीरता विद्यमान थी। चेन्नम्मा के पिता का नाम घुलप्पा देसाई और माता का नाम पद्मावती था। पिता घुलप्पा ने अपनी पुत्री चेन्नम्मा को एक राजकुमार की भाँति शिक्षित किया था। चेन्नम्मा ने बचपन से ही घुड़सवारी, शस्त्रास्त्रों का प्रशिक्षण, आखेट (शिकार) और युद्ध की कलाएँ सीखीं। इसके अतिरिक्त चेन्नम्मा ने कई भाषाओं का भी अध्ययन किया। चेन्नम्मा कन्नड़, उर्दू, मराठी और संस्कृत भाषा सहजता से पढ़-लिख लेती थीं। चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज के साथ हुआ, जो कित्तूर के 11वें शासक थे। राजा से विवाह के चलते चेन्नम्मा अब रानी चेन्नम्मा बन चुकी थीं। यद्यपि मल्लसर्ज का विवाह पहले से ही रानी रुद्रम्मा से हुआ था। रानी चेन्नम्मा उनकी दूसरी पत्नी थीं, परंतु रूप और गुण में चेन्नम्मा अधिक सुन्दर थीं।

वैभवशाली कित्तूर पर थी अंग्रेजों की कुदृष्टि

कित्तूर उन दिनों मैसूर के उत्तर में एक छोटा स्वतंत्र, परंतु अत्यंत ही संपन्न राज्य था। पूना से बंगलौर जाने वाले मार्ग से कित्तूर बेलगाँव से 5 किमी की दूरी पर स्थित था। कित्तूर राज्य में 72 दुर्ग और 358 गाँव थे। उस समय कित्तूर व्यापारियों का केन्द्र था, जहाँ हीरे-ज़वाहरात के बाज़ार लगा करते थे और दूर-दूर के व्यापारी खरीददारी करने आते थे। सुख-समृद्धि से भरपूर कित्तूर के राजा मल्लसर्ज अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे। प्रजा भी राजा की आज्ञाकारिणी औक स्वामिभक्त थी। कित्तूर का वैभव जहाँ एक ओर आस-पास के राजाओं की आँखों में चुभता था, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार ने भी इस राज्य पर कब्ज़ा करने की कुदृष्टि डाली। बस वह अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी। इसी दौरान पूना के राजा पटवर्धन ने छल और कपट से राजा मल्लसर्ज को बंदी बना लिया। कुछ समय बाद बंदी के रूप मे ही मल्लसर्ज की मृत्यु हो गई। राजा की मृत्यु से पहले ही चेन्नम्मा ने एक पुत्र को जन्म दिया था, परंतु उसकी भी अकाल मृत्यु हो गई थी। राजा मल्लसर्ज के बाद बड़ी रानी रुद्रम्मा का पुत्र शिवलिंग रुद्रसर्ज गद्दी पर बैठा और रानी चेन्नम्मा के सहयोग से राजकाज चलाने लगा। शिवलिंग के भी कोई संतान नहीं हुई। इसलिए उसने अपने एक संबंधी गुरुलिंग को गोद लिया और वसीयत लिखी कि राज्य का काम-काज रानी चेन्नम्मा देखेंगी। कुछ समय पश्चात शिवलिंग की भी मृत्यु हो गई।

रक्त की अंतिम बूंद तक कित्तूर की रक्षा का संकल्प

वर्ष 1824 का समय था। कित्तूर राज्य का सारा उत्तरदायित्व अब रानी चेन्नम्मा पर के कंधों पर आ चुका था। उन्होंने शिवलिंग के गोद लिए हुए बेटे गुरुलिंग को कित्तूर का उत्तराधिकारी घोषित किया, परंतु पहले से ही कित्तूर राज्य पर अधिकार करने का मंसूबा बने रही ब्रिटिश सरकार ने चेन्नम्मा के इस फ़ैसले को मानने से इनकार कर दिया। कित्तूर जैसे छोटे से राज्य का स्वतंत्र रहना अंग्रेजों को कत़ई मंज़ूर नहीं था। रानी चेन्नम्मा ने ब्रिटिश शासन और देशद्रोहियों को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि राज्य का उत्तराधिकारी कौन बनेगा यह हमारा निजी मामला है। इसमें सरकार का कोई लेना-देना नहीं है, साथ ही रानी चेन्नम्मा ने अपनी जनता से कहा, ‘जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूँद है, कित्तूर को कोई नहीं ले सकता।’ रानी ने अपने सहयोगी दीवान गुरू सिद्दप्पा, बालण्णा, रायण्णा, गजवीर और चेन्नवालप्पा जैसे योद्धाओं की एक सेना तैयार करना शुरू कर दी। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने कित्तूर के लालची और देशद्रोही यल्लप शेट्टूी और वेंकटराव को राज्य का कुछ भाग देने का लालच देकर अपने पक्ष में कर लिया। कित्तूर राज्य धारवाड़ कलेक्ट्रैट में पड़ता था और धारवाड़ के कलेक्टर थे सेंट जॉन ठाकरे (St. John Thackeray-1778-1824), जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (British East India Company) राजनीतिक एजेंट के रूप में भी काम कर रहे थे। रानी चेन्नम्मा ने जब अंग्रेज सरकार की न सुनते हुए गुरुलिंग को ही उत्तराधिकारी बनाए रखने की घोषणा की, तो देशद्रोही यल्लप शेट्टी ने ठाकरे तक उनका यह संदेश पहुँचाया। रानी का विद्रोही उत्तर सुन कर ठाकरे भड़क उठे। रानी के विद्राह का उत्तर देने के लिए 23 सितंबर, 1824 को ठाकरे ने अपने 500 सिपाहियों के साथ कित्तूर किले को घेर लिया और रानी चेन्नम्मा को 10 मिनट के अंदर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी।

चेतावनी को ‘शुभ समाचार’ बता कर बरसीं चेन्नम्मा

कलेक्टर की चेतावनी पर रानी चेन्नम्मा ने कहा, ‘ये तो शुभ समाचार है’, गुरुद्दप्पा किले का फाटक बंद कर दो और आग उगलने वाली तोपें बुर्ज़ुों पर तैयार करो। रानी ने ललकारते हुए अपने सिपाहियों से कहा, ‘कन्नड़ माता के सपूतों ! अपने प्राणों की आहूति देकर भी जन्मभूमि की रक्षा करेंगे।’ इसके साथ ही अचानक किले के फाटक खुले और 2 हजार देशभक्तों की अपनी सेना के साथ रानी चेन्नम्मा अंग्रेज़ों की सेना पर टूट पड़ीं। रानी मौत बन कर ठाकरे पर टूट पड़ी और वह युद्ध में मारा गया। रानी ने दोनों देशद्रोहियों को अपनी तलवार से मौत के घाट उतार दिया। अंग्रजों ने ठाकरे की हार का प्रतिशोध लेने के लिए एक बार फिर 3 दिसंबर, 1824 को कित्तूर का किला घेर लिया, परंतु इस बार भी अंग्रेजों को युद्ध में मुँह की खानी पड़ी।

तीसरे युद्ध में हारीं और जेल में हुईं वीरगति को प्राप्त

दूसरी बार पराजित होने के बाद बौखलाए अंग्रेजों ने 2 दिन बाद यानी 5 दिसंबर, 1824 को को एक बार फिर कित्तूर के किले पर डीकन के नेतृत्व में 20,797 सिपाहियों और 437 बंदूकों वाली मद्रास नेटिव हॉर्स आर्टिलरी (Madras Native Horse Artillery) की तीसरी टुकड़ी से हमला किया। पहले 2 बार युद्ध में कित्तूर के सैकड़ों सिपाही मारे जा चुके थे। इस कारण रानी और उनकी सेना कमज़ोर हो गई थी। चेन्नम्मा के नेतृत्व में बचे हुए सिपाहियों ने अंग्रेजी सेना का सामना तो किया, परंतु इस बार वे टिक नहीं सके। रानी चेन्नम्मा को अंग्रेज़ों ने बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। उनके अनेक सहयोगियों को फाँसी दे दी गई और कित्तूर पर कब्ज़ा करके उसके वैभव और विरातित को मनमाने ढंग से अंग्रेजों ने ख़ूब लूटा। 21 फरवरी, 1829 को जेल में ही देशभक्त, स्वतंत्रता सेनानी और वीरांगना रानी चेन्नम्मा का निधन हो गया।

178 वर्ष बाद मिला शासकीय सम्मान

11 सितंबर, 2007 को भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भारतीय संसद परिसर में रानी चेन्नम्मा की एक प्रतिमा का अनावरण किया, इस अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री शिवराज पाटिल, लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी और अन्य उपस्थित थे, जिन्होंने समारोह के महत्व को चिह्नित किया। कित्तूर रानी चेन्नम्मा मेमोरियल बंगलौर, बेलगाम और कित्तूर में बनवाए गए हैं।

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